मेरे गांव का पवित्र लोकपर्व ‘छठ’ अब धार्मिक कर्मकांड में फंस रहा है

Posted by राजीव रंजन in Hindi, My Story, Society
October 23, 2017

कार्तिक की भोर, कुनकुनी ठंड और मीठी नींद के झोंको के बीच गाँव की गलियों में उठता मधुर संगीत— ‘काचहि बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय’। स्त्रियों के समवेत स्वर में उठती यह धुन धीरे-धीरे गाँव के एक घर से दूसरे घर, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे… पूरे गाँव की गलियां जांते (अनाज पीसने का घरेलू उपाय) की घरघराहट भरी धुन के साथ इस लय में डूब जाता। दिवाली के बीतते ही छठ की तैयारियां शुरू हो जाती। गाँव के उत्तर पोखर पर मिट्टी की बेदी बनाने के लिए बच्चों की आवाजाही बढ़ जाती।

छठ का त्योहार तब हमारे इलाके में नया ही था। बिहार की सीमा से कोई आठ कोस दूर यह छोटा सा गाँव अपनी राजनीतिक पहचान में भले उत्तरप्रदेश का इलाका हो, पर अपनी बोली-भाषा और आचार-व्यवहार में बहुत कुछ बिहार ही था। पर, बिहार के गाँवों की तरह छठ की पक्की घाटें अब भी नहीं हैं और ना ही छठ एक अनिवार्य व्रत के रूप में संस्कृति का हिस्सा बना है। फिर भी, गाँव के अधिकांश घरों में छठ  होने लगा थी। कुछ मन्नत के कारण और कुछ देखा-देखी।  लोग भोर में उठाकर अंगऊ (पूजा या प्रसाद का गेहूं ) पीसने लगतें। गाँव में चक्की आने के बावजूद जांतों का महत्त्व बरकारार था तो अंगऊ पीसने की अपनी योग्यता के कारण ही।

दिवाली से छठ के बीच यह छह दिन का समय हमारे लिए लंबे इंतज़ार का समय होता और घर के लोगों के लिए व्यस्तता का। वैसे, यह व्रत भी छठवें दिन नहीं होता, बल्कि पहले ही शुरू हो जाता। पहले दिन शाम को व्रत करने वाले लोग नए चावल का भात और लौकी की सब्ज़ी खा कर व्रत की शुरुआत करते हैं। यह नई फसल के तैयार होने का समय है। खेतों में खड़ी धान की फसल पक कर पीली हो जाती, लेकिन सभी घरों में अभी नए धान का चावल उपलब्ध नहीं होता। लोग एक घर से दूसरे घर और दूसरे घर और दूसरे से तीसरे आपस में बांट कर नए चावल का भात बनाते थे।

अब गावों तक बाज़ार की पहुंच बढ़ी है और गांवों में आपसी दूरियां भी, लेकिन तब व्रतियों (जो भी व्रत करे) के लिए एक ही लौकी के कई टुकड़े कर आपस में बांट लेना आम बात थी।

जिसके छानी-छप्पर पर लौकी पहले तैयार होती वह या तो खुद व्रती( के घर उसे पहुंचा जाता या फिर उन घरों के लड़के-बच्चे बड़े-बूढ़े उसके दरवाजे पर जा खुद मांग लाते। इसमें न कोई संकोच था और न बड़प्पन। सहज सहकारिता और परस्परता का यह भाव ही हमारे गांवों की पहचान थी, जिसे छठ जैसे त्यौहार और अधिक बढ़ते थे ।

अगले दिन व्रत करने वाले अन्न-जल त्यागकर उपवास करते हैं और शाम को प्रसाद में नए चावल का खीर खाकर उपवास भंग करते हैं। तीसरा दिन इस पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण दिन होता है। पूरे दिन उपवास के बाद शाम को अर्घ्य का दिन और बच्चों के लिए उत्सव का दिन। पिछले छह दिनों का इंतज़ार जितना लंबा नहीं होता उससे कहीं ज़्यादा लंबा होता है छठ के दिन का सुबह से शाम तक का छह-आठ घंटे का इंतज़ार। दिन भर में बच्चे छठ घाट तक एकाधा चक्कर लगा ही आते। शाम को बड़ी-बड़ी डालियों या पीतल की परातों (बर्तन) में रखे पकवान और फल सेब, संतरे, अनार, केला जैसे परंपरागत फल ही नहीं नारियल, कच्ची हल्दी, अदरक, मूली और न जाने क्या-क्या। फलों की पूरी बारात ही होती उस डाली में। तब इस छोटे से गांव में बहंगियों (कांवर) पर लदे हुए फल और पकवान किसी के कंधे पर नहीं होते, पर अब दिखते हैं, लेकिन गीत के बोल वही ‘कांचहि बांस के बहंगिया…’

रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे लोगों का हुजूम, आगे-आगे उछल-कूद करते बच्चों का हुजूम और उनके साथ रंगीन ओहार से ढंके बांस की डालियां और कंधे पर गन्ने लिए  युवाओं और किशोरों के समूह, अद्भुत उत्सव। जुलूस की तरह, जैसे कोई बारात अपने पूरे शबाब पर हो। गाँव से पोखर तक तांता ही तांता गलियों में न पैर रखने की जगह और न सिर गिनाने की संभावना। घर में बढ़े-बूढ़ों को छोड़ पूरा का पूरा गाँव पोखर पर आ जमाता। छठ गीत का एक बोल उठता तो तालाब का लगभग पूरा क्षेत्र उसी से गूंज उठता। बीच-बीच में अलग अलग गीतों की टेक और बोल की हदवानियों के टकराव से एक नया संगीत।

छठ पर्व की एक खास बात यह थी कि पुरोहित इससे से दूर ही रहते, उनके लिए वहाँ कोई स्थान नहीं था। यह धार्मिक पर्व होते हुए भी धर्म के उस कर्मकांडी पक्ष से पूर्णतः मुक्त था, जिसका मार्ग अनिवार्यतः ब्राहमन की ड्योढ़ी के रास्ते से जाता था। शाम की अर्घ्य के बाद अगली अर्घ्य सुबह होती। पहली डूबते सूर्य को और दूसरी उगते सूर्य को। रात का पूरा समय जागरण का होता, जिसमें रात भर घर की औरतें प्रसाद बनातीं छठ मैया के गीत और कलश पर रखे अखंड द्वीप का खयाल रखतीं। फिर अगली भोर उसी कच्चे बाँस की बहंगी के साथ पूजा की वेदी पर आ पहुंचतीं। फिर वही क्रम स्नान अर्घ्य पूजा और गीत।

पर, धीरे-धीरे पुरोहितों ने अपने लिए यहां भी जगह खोज ली थी। अवश्य ही यह बाद का चलन था, पर व्रती औरतों से दूर पोखर के घाट पर एक जगह आम की कुछ लकड़ियों के साथ आ विराजते थे पंडी जी। शरद ऋतु की हल्की ठंडी भोर में आग की लौ देख भीते पर बहंगी लौटा कर ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे पुरुष भी आ घेरेते और एक समानान्तर पूजा आरंभ हो जाती। मंत्र, संकल्प, हवन और दक्षिणा। सूर्य उपासना के लोक-पर्व का एक वैदिक संस्कार या इस लोकोत्सव को कर्मकांड का जामा पहनाकर उसकी मूल आत्मा को पुरोहिती जकड़बन्दियों में जकड़ देने की कोशिश।

यह कोशिश बाजार का रुख कर चुकी है। इधर छोटे-छोटे कस्बों, नगरों और महानगरों की दुकानों पर छठ की कथा और व्रत विधि की पुस्तकें भी दिखने लगी हैं । इन पुस्तकों के वाचक अनिवार्यतः पुरोहित होते हैं, जो धीरे-धीरे इस लोक पर्व को कर्मकांडीय जटिलताओं में धकेलने में लगे हैं। महानगरीय जीवन की आपाधापी में यह प्रक्रिया तेज़ हुई है और इस त्यौहार का स्वरूप तेज़ी से लोक-विरत हुआ है। संचार माध्यमों के विस्तार और लोगों के प्रवसन से इसका क्षेत्र-विस्तार भले ही हुआ हो, इसकी मूल आत्मा विरूपित हुई है। दिल्ली जैसे महानगरों में मैंने छठ पूजा के पंडाल और बाज़ार का हस्तक्षेप भी देखे हैं। यहां स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले लोग अर्घ्य के लिए दूध आदि भी सशुल्क उपलब्ध कराते हैं और पूजन संबंधी सेवाएं भी। कुछ ऐसी ही स्थिति छठ गीतों को लेकर भी है। बाज़ार में उपलब्ध तमाम कैसेटों, सीडियों और ऑनलाइन माध्यमों पर उपलब्ध छठ गीतों की भीड़ में वह लोक धुने कहीं खो गई है, जो अपने गाँव घर से कई योजन दूर इस नए शहर में भी कातिक की उनींदी भोर में मेरे कानों में अचानक गूंजने लगती है।

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