उस घटना से मैंने सीखा कि मोलेस्टर से खुद लड़ना है, लोग बस तमाशा देखेंगे

Posted by Vinita Rav in Hindi, My Story, Sexism And Patriarchy
October 24, 2017

एक 27 साल की लड़की जो अविवाहित है, जिसे घूमना पसंद है, खाना पीना पसंद है, वो आवाज़ धीमे करके बोलना नहीं जानती है (न तो चाहती है) और न ही उसे फिक्र है कि कोई उसके बारे में क्या सोचता है।  क्या ये सब होना कुछ नया है? क्या यह सब होना अलग है? नहीं, बिलकुल नहीं। किसे ये सब नहीं पसंद? कौन अपने शौक और ज़िंदगी बिताने के तरीके में किसी की कोई खलल पसंद करेगा? शायद कोई नहीं। अगर ये होता तो माई लाइफ माई लाइफ का टैग लिए न घूम रहे होते सब।

फिर क्यों कुछ लोग बसों, ट्रेनों और सड़कों पर आंखें फाड़-फाड़ कर घूमने को, किसी को कहीं भी छू लेने को अपना हक मान लेते हैं?

यहां इस प्लैटफॉर्म पर (YKA) शायद कुछ और भी लिख सकती थी, पर क्या करूं, ज़िंदगी के एक बड़े हिस्से ने इतनी उम्र यह सोच कर गुज़ार दी (और बेशक़ आगे भी गुज़ारनी है ) कि क्यों हम अपने बटुए और रास्ते से ज़्यादा ध्यान अपने कपड़ों का रखें, क्यों गलियों से गुज़रते हुए अंधेरे से ज़्यादा लोगों के होने से डरें, क्यों बसों या बाज़ारों में नज़र झुका कर रहें, या फिर क्यों किसी की छींटाकसी का जवाब अपनी चुप्पी से दें? कभी कभी तो लगता है कि हम इंसान हैं ही नहीं, सिर्फ वो रोबोट हैं जिसमें जितनी चाबी भर दे वो उतना ही चले। वही करे जो समाज चाहता है, वही पहने जो लोग चाहते हैं और पूरी ज़िन्दगी समाज के इशारों पर चलते हुए गुज़ार दें।

घर में, अपने परिवार में से ही किसी की हवस का शिकार होने का डर, घर से बाहर निकल कर गलियों में मुहल्ले के लड़कों की ओछी बातें सुनने का डर, उन्हीं में से किसी पागल आशिक के एसिड फेंकने का डर, बस में किसी के छूने-चिपकने का डर, स्कूल-कॉलेज-ऑफिस पहुंच कर अपनी ही टीचर-सहपाठी-साथी एम्प्लॉई या बॉस के तथाकथित ‘प्यार-दुलार’ के शिकार होने का डर, वापस आते हुए इन सब डरों के दोहराने का डर! और जब कभी सोशल मीडिया पर यह सब लिख दिया तो ट्रोल हो जाने का डर। इतने सारे डरों के साथ रोज़ जीना और फिर इन्हीं के साथ मर जाने का डर, ऐसी ज़िन्दगी किसे चाहिए?

और क्या हल देंगे आप? कपड़े पूरे पहनू, फिर उस 2 महीने की बच्ची का क्या? उसके लिए किस तरह के कपड़े सिलवाए जाएं? घर जल्दी आऊं तो उनका क्या जिन्हें दिन दहाड़े सड़कों पर परेशान किया जाता है? घर में ही रहूं तो उनका क्या जिनका अपने ही रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने रेप किया? सवाल यह नहीं कि हल क्या है, सवाल यह है कि यह हल किसे निकालने हैं।

रोज़ का वहशीपन देख-देख कर आंखे पथरा गईं है और दिल लोहे का हो गया है।  हिंसा और क्रूरता को देखने की सहनशीलता बढ़ गई है।

दिल्ली के रानीबाग इलाके के एक बस स्टॉप पर खड़ी थी जब एक शराब पिए हुए इंसान ने मेरे आस-पास घूम कर बकवास करनी शुरू कर दी। मुझे चुप देख उसकी हिम्मत और बकवास दोनो बढ़ गई। जब मैंने जवाब दिया तो उसने गाली-गलौच शुरू कर दी। मुझे रोना आ गया लेकिन तब भी उससे लड़ती रही। वो दिन कभी नहीं भूल सकती, उस शाम बस स्टैंड पर दस से ज़्यादा लोग मौजूद थे, चाहते तो आगे आ सकते थे, पर मजाल कोई सामने आए। उसकी भद्दी बाते सुन मैंने भी अपना आपा खो दिया और पास पड़ी ईंट उठा कर दौड़ पड़ी उसके पीछे, वो भाग गया। इसी बीच वहां एक बूढ़े इंसान आएं, उन्होंने भांप लिया कि वो लड़का मुझे परेशान कर रहा था, उन्होंने बस स्टॉप पर मौजूद लोगों को बहुत सुनाया कि कैसे वो बुत बने ये तमाशा देख रहे थे, बल्कि कुछ तो हंस रहे थे, पर सब पत्थर बने बैठे रहे।

वो भाग के जिस शेयरिंग ऑटो में बैठा उन लोगों ने मुझे पत्थर उठाए उसके पीछे दौड़ते देखा था तब भी ना कुछ कहा ना किया।

तब मैं 18 साल की थी, उसके बाद ऐसी छोटी बड़ी घटनाएं होती ही रही पर मैंने उसी दिन मन बना लिया कि बस अब और नहीं। जो भी बदतमीज़ी करेगा उसे उसका जवाब मिलेगा। एक बार तो ट्रेन में कुछ लड़कों को लगातार 1 घंटे घूरते रहने के बाद पूछ ही लिया कि प्रॉब्लम क्या है? जानते हैं वापसी में क्या मिला? पूरे 6 घंटे के अप्रत्यक्ष कमेंट्स, जो वहां बैठे हर किसी को पता था कि मेरे लिए है पर किसी ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने तब भी प्रतिरोध करना नहीं छोड़ा फिर चाहे मैं हूं या मेरी जगह कोई और, समाज किसी के लिए नहीं बदलेगा, हमें ही उसे बदलना पड़ेगा।

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