YKA टॉप यूज़र्स की सितंबर की 10 स्टोरीज़ जो आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए

Posted by Prashant Jha in Hindi, Staff Picks
October 2, 2017

Youth Ki Awaaz पर हर दिन हमें आपकी लिखी कई स्टोरिज़ मिलती हैं। आपमें से कुछ YKA पर अपनी निजी कहानियां साझा करते हैं, कुछ इसलिए लिखते हैं क्योंकि YKA उन्हें एक मंच देता है लगातार लिखने का और एक बेहतर राइटर बनने का, कुछ इसलिए लिखते हैं कि आसपास के मुद्दों और असंख्य स्टिरियोटाइप्स को तोड़ने के लिए सिर्फ YKA ही आपका अपना मंच है।

YKA पर लिखने का आप सबका मोटिवेशन भले ही अलग अलग हो सकता है लेकिन लिखने का उद्देश्य सबका एक ही है अपने लेखों से ज़रूरी सवाल उठाते हुए एक ऐसा प्रगतिशील समाज बनाना जहां अंधविश्वासों और नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। YKA पर लिखने वाले राइटर्स की सबसे इंस्पायरिंग बात है कि आप सब बदलाव के लिए किसी का इंतज़ार नहीं करते बल्कि खुद अपनी बातों से अपनी राइटिंग से बदलाव में भरोसा रखते हैं।

हम लेकर आए हैं सितंबर के ऐसे हीं 10 मुद्दे जिसे आपने अपनी स्टोरिज़ से उठाया YKA पर

1.पुलिस-नक्सलियों और सरकार के बीच पिसते छत्तीसगढ़ के आदिवासी

छत्तीसगढ़ का नाम सुनते ही जो नाम सबसे पहले ज़हन में आता है वो है नक्सली फिर सुरक्षाबल और फिर सरकार, आखिरी में शायद ही हममें से किसी को आदिवासियों की याद आती है। पिछले 10 सालों में अलग अलग सुरक्षाबलों के लगभग 200 सुरक्षाकर्मियों की हत्या हो चुकी है और जाने कितने आदिवासियों का घर उजाड़ दिया गया। सुरक्षाबलों के साथ हुए ज़्यादतियों के लिए फिर भी कानून व्यवस्था है और सरकार का साथ है लेकिन आदिवासियों के साथ लगातार हो रहे अत्याचारों का एक सटीक लेखा-जोखा तक मिल पाना मुश्किल है क्योंकि वो तो सरकार और नक्सलियों की दोहरी मार झेलते हैं।

स्थानीय आदिवासी किस तरह से अपना जीवन जी रहे हैं और कैसे वो सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं इसकी रिपोर्टिंंग शायद ही मेनस्ट्रीम मीडिया में दिखती है। 3 महीने छत्तीसगढ़ में बिताकर और आदिवासियों से मिलकर हमारे सौरव राज ने वहां की असल तस्वीर सामने लाने की कोशिश की है। सौरव की रिपोर्ट पढ़ने से आपको ये बात समझने में आसानी होगी कि गोली किसी ओर से चले मरते स्थानीय ही हैं।

4 महीने छत्तीसगढ़ में रहकर मैंने जाना, गोली नक्सलियों की हो या सरकार की मरता आदिवासी ही है

‘छत्तीसगढ़’ ये शब्द सुनते ही आपके ज़हन में सबसे पहले क्या आता है? जल, जंगल और ज़मीन, आदिवासी, स्मार्ट सिटी या नक्सली हिंसा और बस्तर में फैला आतंक?

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2. भारत में रह रहे रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की कहानी

भारत में सरकार से लेकर मानवाधिकार संगठनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों के बारे में बहुत कुछ कहा है लेकिन शायद ही किसी ने कोई कदम उठाया है।
म्यांमार से कूटनीतिक रिश्ते बेहतर बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने रोहिंग्या मुस्लिमों पर काफी सख्त रुख अख्तियार किया है। सरकार जब लगभग 40 हज़ार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस निर्वासित करने का मन बना चुकी है तब मानवीय आधार पर सवाल उठाना तो लाज़मी है।

जब रोहिंग्या के भविष्य पर लगातार डिबेट चल रही है तब सच्चाई यही है कि ये तमाम रोहिंग्या मुस्लिम अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। अपनी फोटो स्टोरी में प्रेरणा कालिंदी कुंज के एक ऐसे ही रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप से असल स्थिति को दिखाने वाली तस्वीरें सामने लेकर आई है।

फोटो स्टोरी: उन रोहिंग्या मुसलमानों की कहानी जिनके लिए म्यांमार अब जहन्नुम से भी बुरा है

शाम के पांच बजे हैं और सूरज ढलने को है। नुक्कड़ पर कुछ सफेद कुर्ते और टोपी में चाय पी रहे लोगों से हमने पूछा- म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या समुदाय के लोग इधर ही रहते हैं? उन्होंने जवाब में पूछा- बर्मा वाले?

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3. भारत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति की हत्या

5 सितंबर को मशहूर पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। गौरी को सरकार और देश में बढ़ रहे हिंसक हिंदुत्व की आलोचना के लिए जाना जाता था। गौरी की हत्या के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एकबार फिर से बहस छिड़ गई। गौरी की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन अभी थमें भी नहीं थे कि त्रिपुरा के एक पत्रकार की एक विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते हुए हत्या कर दी गई। क्या असहमती अब संवैधानिक अधिकार नहीं रहा? क्या सरकारों कि आलोचना या नेताओं को ज़िम्मेदार ठहराने पर जेल जाना ही एक रास्ता है और क्या अपनी बात को मुखरता से कहने पर इस देश में अब लोगों को मार दिया जाएगा??

प्रधानमंत्री को एक खुले खत में बिजस्मिता देबनाथ इन मुद्दों को गंभीरता से उठाती हैं और बताती हैं कि भारत कैसे पत्रकारों के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे युद्ध से परेशान देशों से भी असुरक्षित हो चुका है।

Dear PM Modi, You Have Failed India’s Journalists

The Prime Minister, Respected Sir, You have failed journalism. I hope you’re aware that it was Santanu this time. I’m writing this letter today because writing is my passion and to speak up against crucial instances is my intent. We’ve all come across the phrase, ‘a pen is mightier than a sword’.

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4. क्लाइमेट चेंज का हमारे शहरों पर असर

अगस्त में मुंबई में बने बाढ़ जैसे हालात प्रकृति और क्लाइमेट चेंज की तरफ हमारी उदासीनता का ही नतीजा था। 2005 में ऐसे ही हालात का सामना करने के बाद भी जिसमें लगभग 500 लोगों की मौत हो चुकी थी मुंबई ऐसी हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं था। इस साल भी मॉनसून में 14 लोगों की मौत हो गई।
किसी शहर पर बाढ़ जैसी आफत आए तो वो सभी के लिए बुरा होता है लेकिन जो लोग न्यूनतम सुविधाओं के साथ अपना जीवन बसर करते हैं उनके लिए ये किसी जंग से कम नहीं। दीपक जॉन अपनी एक विस्तार से की गई विश्लेषण में मुंबई में बाढ़ जैसे हालातों के कारण पैदा होने वाली स्वास्थ्य परेशानियों के बारे में बता रहे हैं खासकर निम्न आय वाले वर्गों को होने वाली परेशानियों के बारे में।

Who Suffers The Most When A City Gets Flooded?

OnAugust 29, the monsoon fury unleashed on Mumbai and brought the city to a grinding halt. Two toddlers were among 14 people killed in the floods. It received nearly a month’s average rainfall in a single day -halting the transit lifeline of train services and leading to several flight cancellations.

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5. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाशिये पर रहे लोगों के प्रति उदासीनता

डिजिटल इंडिया का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया साइट्स पर लोकप्रियता हर दिन बढ़ रही है। ट्विटर पर विश्व भर में सबसे ज़्यादा फॉलो किए जाने वाले नेताओं में से एक मोदी को भारत में सोशल मीडिया को राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने के हिसाब से मार्ग प्रदर्शक कहा जा सकता है।

लेकिन प्रधानमंत्री खुद किन लोगों को फॉलो करते हैं उसपर गौर करना भी बेहद ज़रूरी है। ये रिपोर्ट लिखे जाने तक प्रधानमंत्री जिन 1845 लोगों को फॉलो करते हैं उनमें से कई BJP समर्थक और स्थानीय नेता हैं जो कि अच्छी बात है लेकिन जो बुरी बात है वो यह है कि इन 1845 लोगों में से बहुत से ऐसे लोग हैं जो ऑनलाइन ट्रोलिंग और हैरसमेंट को बढ़ावा देते हैं, जिसमें गाली देना और अभद्र भाषा का प्रयोग सर्वोपरी है।

सवाल ये उठ सकता है कि इससे प्रधानमंत्री का क्या लेना देना और उनके काम को कैसे प्रभावित करता है ये तो जवाब ये है कि इन ट्रोलिंग वाले पोस्ट्स से अगर प्रधानमंत्री का फीड भरा रहे तो शायद ही कोई ज़रूरी और महत्वपूर्ण मुद्दा उनतक इस डिजिटल माध्यम से पहुंच पाए जिसे बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अलग से एक कैंपेन चलाया है।

इन बातों की पड़ताल करते हुए हमारे यूज़र धीरज मिश्रा ने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखते हुए उन्हें भारत के उन आम लोगों को फॉलो करने की नसीहत दी है जिनके मुद्दे सुने जाने पर शायद विकास की आधारशिला मज़बूत की जा सकती है या कम से कम लोकतंत्र के मतलब को तो मज़बूती दी ही जा सकती है।

पीएम सर काश आप करोड़ों महिलाओं, दलितों या किसानों में से किसी को फॉलो करते

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पत्रकार गौरी लंकेश जी की निर्मम हत्या के बाद निखिल दधीच नाम के एक शख्स नें ट्विटर पर उन्हें कुतिया कहा और उनका समर्थन करने वालों को पिल्ला कहा। पता चला कि आप इस शख्स को ट्विटर पर फॉलो करते हैं। मुझे नहीं पता कि किसी

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6.बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में यौन हिंसा और लिंगभेद को लड़कियों की चुनौती

21 सितंबर को BHU कि एक छात्रा के साथ कैंपस के अंदर ही भारत कला भवन चौराहे के पास दो लोगों ने यौन हिंसा की। छात्रा वहां से भागने के क्रम में अंतरराष्ट्रीय हॉस्टल के पास बेहोश हो गई और जब वॉर्डन को ये बात बताई गई तो उनका जवाब था कि लड़कियों को इतनी रात गए हॉस्टल से बाहर निकलना ही नहीं चाहिए।

प्रशासन की उदासीनता से क्षुब्ध लड़कियों ने यूनिवर्सिटी के लंका गेट पर प्रदर्शन किया जिसे देश भर से समर्थन मिला। इस प्रदर्शन के बदले पुलिस ने स्टूडेंट्स पर लाठीचार्ज किया और समय से पहले ही उन्हें हॉस्टल खाली करने को कह दिया गया।

हमारे यूज़र प्रशांत प्रत्युष ने BHU की छात्राओं के द्वारा किये गए विरोध और उनकी हिम्मत पर अपने विचार लिखे हैं।

BHU के रावणों को जलाने के लिए लंका पर डटी लड़कियां

देश के दो महान विश्वविद्यालय, JNU और BHU इस हफ्ते दोनों ही ख़बरों की सुर्खियों में हैं। JNU अपने परिसर में छात्राओं और महिलाओं के शोषण के मामले देखने वाली संस्था जीएस-कैश के जगह नई थोपी गई संस्था आईसीसी को लेकर बनी अनिश्चतता के लिए खबरों में है। वहीं BHU

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7.जंतर मंतर के गुमनाम प्रदर्शनकारी

जंतर-मंतर शायद अब प्रदर्शन और अपनी मांग को लेकर रैली निकालने का पर्याय बन चुका है। आप किसी भी दिन वहां जाएं और वहां अपनी अपनी मांगों के लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे कम से कम 10-15 संगठन मिल जाएंगे। अन्ना हज़ारे द्वारा शुरू किए गए जनलोकपाल जैसे कुछ विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय मुद्दे बन जाते हैं तो तमिल किसानों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन बिना किसी अंजाम के महीनो चलते रहते हैं।

इनके इतर यहां कई ऐसे प्रदर्शन होते हैं जो अदृश्य होते हैं। कई संगठन और लोग ऐसे हैं जो सालों से यहां धरना दे रहे हैं लेकिन उनकी सुनवाई ना तो सरकार करती है ना ही मीडिया। सुमंत्र कुमार ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के ऐसे ही एक प्रदर्शनकारी की कहानी सामने लेकर आए हैं जिसे 2003 में ही मृत घोषित कर दिया गया था और वो तबसे खुद को ज़िंदा बताने की कोशिश में जुटा है।

A Man Declared Dead In 2003 Is Alive And Protesting At Jantar Mantar

Walking down the street of the Jantar Mantar road, in the middle of protests ranging from the farmers’ agitation, army veterans demanding OROP, the disciples of Rampal and the Asha workers, a man stands with a placard tied around his neck saying ‘Dead Man Alive’.

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8. दम तोड़ रही है पत्रिका द इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली

1966 में शुरू की गई द इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली(EPW) हमेशा से विकास और राजनीति के कठिन मुद्दों पर बुद्धिजिवियों द्वारा सवाल उठाए जाने और उसपर वाद-विवाद करने का एक मुखर मंच माना जाता रहा है। EPW कभी भी नए और कठिन मुद्दों को उठाने में झिझका नहीं। हर मुद्दे पर एक आलोचनात्मक विश्वेषण ही इस पत्रिका की पहचान थी।

51 साल के बाद यह पत्रिका अब इस नए जेनरेशन में पाठक जुटा पाने में असमर्थ है। पिछले कुछ साल में संपादकों के इस्तीफे से लेकर लगातार घटते पाठकों की संख्या से पत्रिका को भारी नुकसान पहुंचा है।

एक लेखक और पत्रिका के संपादक कृष्ण राज के मित्र के तौर EPW से 1979 से ही काफी नज़दीकी से जुड़े प्रोफेसर पी.राधाकृष्णन बता रहे हैं कि क्यों EPW अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है।

The Economic And Political Weekly Is Dying

I began my association with the Economic and Political Weekly (EPW) in early 1979, when I sent a hand-written book review to Krishna Raj – my first contribution to EPW, from the field where I was collecting data for my PhD thesis.

पी राधाकृष्णन को YKA पर फॉलो करें

9. हाशिये पर रह रहे लोगों तक कैसे पहुंच रहा है तकनीक

आज सभी चीज़ों के लिए एक ऐप है, नींद से जगाने के लिए, पानी पीने के लिए याद दिलाने के लिए। तकनीक ने हमारे जीवन को वाकई काफी आसान बना दिया है। लेकिन जो एक सवाल हमेशा से बना हुआ है वो ये कि क्या ये बराबर रूप में सभी तक पहुंच रहा है?

इंटरनेट के विकास का एक ही मकसद था पूरे विश्व को आपस में जोड़ना। लेकिन तकनीक के बंटवारे में ऊंचे और नीचे का भेदभाव साफ दिखता है। पेरिस में हुए आतंकी घटनाएं तुरंत एक हैशटैग के साथ शेयर होने लगती है जबकी अफगानिस्तान में हो रही घटनाओं का पता भी शायद ही हमें लग पाता है। मुंबई बाढ़ पर पूरा देश हाय तौबा करता है लेकिन असम में भी बाढ़ है ये बहुतों को पता भी नहीं होता।

तकनीक के इस भेदभाव को मिटाने के लिए बीरज स्वाइन ने अपनी टीम के साथ मिलकर एक स्वास्थ्य देखभाल संबंधी एक ऐसा ऐप बनाया है जो दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में भी काम कर सकता है बिना किसी इंटरनेट या सिग्नल के झंझट के। बीरज ने अपनी कहानी YKA पर साझा की है।

How We Made A Health App That Works In Remote Rural Areas Without Internet

Over half a century ago, communications guru and public intellectual Marshall McLuhan predicted that electronic interdependence will make the world a global village. But last month, Simon Tisdall of The Guardian called out the international media for creating a hierarchy of suffering by focusing on Hurricane Harvey more than on the devastating floods in South Asia and South East Asia.

बीरज को YKA पर फॉलो करें

10. भारत में वैज्ञानिक शोधों की हत्या

इस बार स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक न्यू इंडिया बनाने पर ज़ोर दिया था। इससे पहले से ही मेक इन इंडिया और डिजिटल जैसे महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही हैं। इन सभी योजनाओं के लिए इतना तो तय है कि देश में शोध और विज्ञान कार्यों में तेज़ी और नवीन तकनीक लाने पड़ेंगे।

लेकिन सच्चाई ये है कि ऐसा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। भारत अभी अपनी GDP का मात्र 0.8 प्रतिशत ही शोध पर खर्च कर रहा है। अपनी विस्तार से लिखी रिपोर्ट में विवेक कुमार ने भारत में शोध कार्यों की खस्ता हाल पर ध्यान खींचा है। वो अपनी रिपोर्ट में ये भी बताते हैं कि कैसे वैज्ञानिक शोधों पर फंड कम करके गौमूत्र पर शोध किया जा रहा है।

विज्ञान संस्थाओं के फंड कम करके गौमूत्र पर शोध क्यों कर रही है सरकार

विगत तीन वर्षों में बहुत सारे क्षेत्र हैं जिसमें होने वाले सरकारी खर्चों में कटौती की गई है, एक-एक करके सरकारी उपक्रमों को निजी हाथो में सौंपा जा रहा है। वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इस वर्ष 15 अगस्त को दिए गए अपने भाषण

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