भूख से मरना रामराज्य है साहब तो हमें कलयुग में ही रहने दो

Posted by Kamla Nand Jha in Hindi, Society
October 28, 2017

अन्न ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच
-कमलानंद झा

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफास।
(नागार्जुन)

रामराज्य का ख्वाब देखने वाली सरकार एक लड़की को भूख से नहीं बचा पायी। ‘सबका साथ सबका विकास’ का दम्भ भरने वाली सरकार एक मुट्ठी भात के लिए तरसती संतोषी कुमारी का साथ न दे सकी। सुशासन का डंका बजाने वाली सरकार एक भूखी बच्ची की मां की आह को नहीं सुन सकी। जिसने भी झारखंड की इस मातमी खबर को सुना सकते में आ गया। लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस ‘राष्ट्रीय’ मातमी सन्नाटे से बेपरवाह ‘पुष्पक यान’ से धरती पर अवतरित हो रहे राम की अगवानी में लगे रहे। लगभग दो लाख दीपों की झिलमिलाहट और कर्णभेदी पटाखों के निनाद में संतोषी की आह कहीं दब कर रह गई।

लेकिन जिनकी आगवानी में करोड़ों रुपये चाहे वे साधु संतों के रहे हों या सरकार के, पानी की तरह बहाये गए उन राम के राज्य में भूख से मरने की बात तो दूर, कोई न दरिद्र था, न दुखी और न ही दीन -‘नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना।’ वर्तमान सरकार जिस राम को अपना आदर्श मानती है,उनके राज्य में अल्पायु में तो कोई मरता ही नहीं था-‘अल्प मृत्यु नहि कवनिउ पीरा।’ संतोसी की भला उम्र ही क्या थी? महज़ 11 साल। इस खेलने धूपने की उम्र में भूख ने उसे तोड़ डाला।

यह समय भूख और तड़प पर जश्न मनाने का है। यह दौर अभाव, दरिद्रता और भूख से लड़ने और उससे मुक्ति पाने के लिए संघर्ष करने का नहीं बल्कि उसे शर्मसार करने का है। तभी तो खुले में शौच जा रही स्त्रियों (प्रतापगढ़, राजस्थान) की सरकारी तस्वीर उतारने का विरोध कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता ज़फर खान की हत्या कर दी जाती है। सोचने की बात है कि कोई स्त्री अपने को कितनी बार मारकर खुले में शौच जाने को मजबूर होती है, यौन शोषण का शिकार होती है, अपनी आवश्यकता को दिन भर रोककर रखती है, अंधेरे का इंतज़ार करती है, क्योंकि

शहर में किसी ने तुम्हें
थोड़ा सा झूँगा झाड़ी झंखाड़ नहीं दिया
एक सुनसान पोखर का
पिछवाड़ा नहीं दिया
थोड़ी सी ईंट की ढेरी नहीं दी
किसी ने गारा लाकर
हाथ भर की दीवार नहीं चिन दी।
(विजय)

आज का दौर गरीबी और गरीबों को सरेआम अपमानित करने का है। राजस्थान की ही एक और घटना मानवता को कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। सिकराई और बांडाकूई तहसील में गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों के मकान पर ‘स्वर्णाक्षरों’ में लिख दिया जाता है कि ‘ मैं गरीब हूँ और मुझे सस्ता अनाज दिया जाता है।’ ठीक वैसे ही जैसे फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन के हाथ पर लिख दिया जाता है कि ‘मेरा बाप चोर है।’
झारखंड ज़िले के जलडेगा प्रखंड में ताताय नायक की बेटी भात भात की रट लगाते हुए दम तोड़ देती है और हमारी सरकारी मिशनरी को चिंता राशन कार्ड को आधार से लिंक करने की है। एक ओर सर्वोच्च न्यायालय ने आधार के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए उसकी अनिवार्यता समाप्त करने को कहा है तो दूसरी ओर सरकारी अमले भारतीय न्याय व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हुए राशन इसलिए नहीं देते कि उनके राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं हैं। इसी वजह से झारखंड के झरिया में चालीस वर्षीय रिक्शाचालक वैद्यनाथ की भूख से मर जाने की खबर आई है।

ऐसा नहीं है कि भूख से अभी ही लोग मर रहे हैं, इससे पहले भी भूख से मृत्यु होती रही है। सरकार हमेशा इस पर लीपापोती करती रही है और इस तरह की मौत को बीमारी से मरने की बात कह रही है। किंतु जांच के बाद सचाई सामने आते ही सरकार की कलई खुल जाती है।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार बात तो रामराज्य की करती है किंतु ले आती है उसका विलोम ‘कलियुग राज्य’। मध्यकालीन कवियों ने कहा है कि कलियुग में लोग अन्न के अभाव में मरेंगे-‘बिनु अन्न दुखी सब लोग मरे’।

कदाचित मुगल काल में ऐसे हृदयहीन मुख्य सचिव नहीं रहे होंगे जिन्होंने राज्य के सभी उपायुक्तों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर ऐसे सभी राशन कार्ड को रद्द करने का आदेश दिया जो आधार कार्ड से जुड़े नहीं थे। इस (कु)व्यवस्था को अर्थशास्त्रियों ने ‘एक्सक्लूशन बाय डिज़ाइन ‘ कहा है। संतोसी जैसे लाखों परिवार ‘कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास’ की स्थिति में जीवन बिताते हैं। इसी डिज़ाइन के कारण मुख्य धारा से बहिष्कृत हो जाते हैं। संतोषी के घर भी आठ दिनों से चूल्हा नहीं जला था।

विगत कुछ वर्षों से जिस तरह किसानों की आत्महत्या बढ़ी हैं, बेरोज़गारों की फौ लंबी हुई हैं, बीमार बच्चों ने दम तोड़ा है, नोटबंदी और जीएसटी के कारण छोटे व्यापारियों की कमर टूटी है, ऐसे विषण्ण माहौल में लोगों को सूझ नहीं रहा वे क्या करें, किससे कहें, कहां जाएं-

खेती न किसान को भिखारी को न भीख भली
बनिक को बनिज़ न चाकर को चाकरी
जीविकाविहीन लोग सिद्दमान सोच बस
कहे एक एक सँ कहाँ जाई का करी।
(कवितावली, तुलसीदास)

देश में भूख से मरने वालों की संख्या बहुत है, लेकिन इसकी सूचना हम तक नहीं पहुंच पाती। भूख इंडेक्स के अनुसार भारत 119 देशों में से 100वे स्थान पर है। भूख के मामले में भारत की स्थिति बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी गई गुज़री है। प्रतिदिन के हिसाब से 35 किसान जो लाख दो लाख का कर्ज़ अदा न कर पाने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं, उनके परिवार के लोगों को क्या भरपेट भोजन नसीब होता होगा? ये अधपेट लोग न्यूनतम भोजन के अभाव में बीमार हो जाते हैं, रक्त की कमी हो जाती है और अंत में कमज़ोर होकर दम तोड़ देते हैं। इस तरह से मरने वाले लोगों का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

अन्न का महात्म्य देश के वे बारह पूंजीपति क्या जाने जिन्होंने न जाने कब से दो लाख करोड़ का ऋण पचाया हुआ है। अन्न की महिमा वे भी नहीं जान सकते जिन्होंने खरबो की राशि ऋण के रूप में गटक ली और जिनका नाम भी बताने से सरकार बच रही है। अन्न का महत्व तो वे बता सकते हैं जो भात भात की रट लगाते हुए, सोंधी टटका भात की आस लिये दम तोड़ देते हैं।

भूख को बहुत करीब से जानने वाले कवि नागार्जुन लिखते हैं-
‘अन्नब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच’

ऐसा नहीं है कि देश में अन्न की कमी है, बल्कि आवश्यकता से अधिक अनाज देश में है। हम उसे रख पाने में असमर्थ हैं। प्रत्येक साल भारी मात्रा में अनाज सड़ जाता है। यही वजह है कि कुछ साल पूर्व उच्चतम न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया था कि आप अनाज संग्रह नहीं कर सकते तो उसे गरीबों में मुफ्त बांट दें। जहां सबों को भोजन मुहैय्या कराने वाला किसान भूखा दूखा हो, देश को स्वच्छ, सुविधापूर्ण और सुंदर बनाने वाला श्रमिक भूखा हो, गरीब दलित मज़दूर भूखा हो, वहां विकास दिवास्वप्न ही हो सकता है। पेट की आग बड़ी भीषण होती है, समुद्र की आग से भी भयानक। तुलसी ने लिखा है-‘आगि बड़बागी ते बड़ी है आगि पेट की’।

जिस दिन यह भूखा जन सैलाब सड़क पर उतर आएगा, जिस दिन लाखों लाख संतोषी, लाखों लाख वैद्यनाथ दास और नत्थू की भूखी आंखों से अंगारे बरसने लगेंगे, उस दिन सरकार के सारे रक्षा कवच, सारे अमला खास उस भूखी चिंगारी में धू धू कर जलने लगेंगे-

कूच करेंगे भूखड़, थर्राएगी दुनिया सारी
काम न आएंगे रत्ती भर विधि निषेध सरकारी
(नागार्जुन)

भूखा नैतिकता- अनैतिकता नहीं जानता, नहीं जानता विवेक, क्योंकि उसकी सारी विवेक क्षमता अदम्य भूख में तिरोहित हो जाती है। बंगला कवि रफ़ीक आज़ाद ने अपनी कविता ‘भात दे हरामज़ादे’ में इस स्थिति की विलक्षण अभिव्यक्ति की है-

दोनों शाम/दो मुट्ठी मिले भात तो
और मांग नहीं है
लोग तो बहुत कुछ/ माँग रहे हैं
बॉडी, गाड़ी, पैसा
किसी को चाहिए यश
मेरी मांग बहुत छोटी है…
नहीं मिटा सकते यदि
मेरी यह छोटी माँग, तो
तुम्हारे सम्पूर्ण राज्य में
मचा दूंगा उथल पुथल
भूखों के लिए नहीं होते
हित अहित, न्याय , अन्याय
मेरी भूख की ज्वाला से
कोई नहीं बचेगा
चबा जाऊंगा तुम्हारा
समूचा मानचित्र ।

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