सरकारी बैंक में काम करना बोरिंग नहीं लेकिन चुनौतीपूर्ण ज़रूर है

Posted by Saurabh Agarwal in Hindi
October 5, 2017

‘सरकारी बैंक’ ये सोचते ही क्या छवि उभर के आती है? कुछ अड़ियल से लोग जिन्हें ना बात करने का लहज़ा आता है और काम की स्पीड तो पूछो ही मत। जब तक सरकारी क्षेत्र के बैंक में मेरी नौकरी नहीं लगी थी, मैं भी कुछ इसी तरह से सोचता था। मैं ना तो बैंक के महत्व को समझ पाया था और ना ही इसके किसी तकनीकी पहलुओं को समझता था। मैंने सुना था बैंकिंग का वक्त 10 से 5 होता है, लेकिन इसमें कितना सच था, इसका पता बैंक में काम करने के बाद ही लगा।

हर रोज़ की छोटी-बड़ी चुनौतियां एक बैंककर्मी को हताश कर देती हैं और उसे एड़ी चोटी का जोर लगाने पर मज़बूर कर देती हैं। बैंक का ज़्यादातर काम कस्टमर डीलिंग से संबंधित होता है। हमें विभिन्न ग्राहकों की अलग-अलग डिमांड सुननी, समझनी और पूरी करनी पड़ती है। फिर ग्राहक की डिमांड को कम से कम समय में पूरा करने का दबाव होता है। लेकिन सबसे ज़रूरी है सतर्कता, सतर्कता के लिए ही बैंक में ‘मेकर-चेकर’ सिस्टम होता है। मतलब एक आदमी के किए हुए काम को दूसरा आदमी जांचेगा तभी वह काम पूरा हो सकता है। कम संसाधनों में ही हम बैंक कर्मियों पर अच्छी सुविधाएं देने का दबाव होता है, जो हमारे काम को और चुनौतीपूर्ण बना देता है।

ग्रामीण इलाकों में काम करने की चुनौतियां

अब RBI ने तो कह दिया ग्रामीण इलाकों में शाखाएं खोलने को और राष्ट्रीयकृत बैंकों ने ऐसा किया भी, लेकिन वहां संसाधनों और सुविधाओं की कमी से जूझते हुए, कस्टमर सर्विस के मानकों पर खरा उतर पाना काफी कठिन है। ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखाओं की अब भी काफी कमी है। जो शाखाएं हैं उनमें ग्राहकों की लंबी कतार, काम का भंडार और ऊपर से स्टाफ की कमी होना आम बात है। काम के दौरान तो बस कुर्सी से चिपक जाना भर होता है, क्योंकि काम के बोझ से उठने का तो मौका ही नहीं मिलता। सामने ग्राहकों की लंबी लाइन होती है ऐसे में किसी से फोन पर बात करने की भी फुर्सत नहीं होती। घर से भी फोन आ जाए तो बस इतना पूछ लेता हूं कि सब ठीक है ना, तो रात में बात करते हैं।

तकनीकी कमियां

वैसे एक सच तो ये भी है कि मैं workaholic हूं इसलिए काम के ज़्यादा होने से फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है तो मशीनों और तकनीक की कमी के कारण। अब चूंकि बैंक का सब काम ऑनलाइन हो चुका है, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में खस्ताहाल नेटवर्क सबसे बड़ी समस्या है। आमतौर पर VSAT (Very Small Aperture Terminal) के माध्यम से धीमा वायरलेस कनेक्शन होता है और इसी से सारे काम करने होते हैं।

ये सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग अन्य माध्यमों की बजाय नकद लेन-देन को ही ज़्यादा तरजीह देते हैं। ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और मोबाइल उपलब्धता की कमी भी अन्य माध्यमों पर जाने में अवरोध पैदा करती है। अन्य माध्यमों में चेक से लेन-देन भी प्रचलित है, लेकिन यहां भी आधुनिक मशीन और तकनीक की कमी के कारण पुराने तरीकों से मसलन डाक के माध्यम से काम करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में डाक की सुविधा भी अन्य सरकारी सुविधाओं की ही तरह बेहद सुस्त है, इसलिए अब सरकार ने आधार से जुड़े खातों में उंगली के निशान के माध्यम से नकद लेन-देन की सुविधा देनी शुरू कर दी है, जो एक अच्छा कदम है। इस काम को अंजाम देने वाले ‘बैंक मित्र’ गांव में किसी छोटे चलते-फिरते एटीएम का रोल अदा करते हैं, जहां लोग उंगली के निशान से पैसे अपने खाते में निकाल और जमा कर सकते हैं।

नोटबंदी का अनुभव

बैंकिंग क्षेत्र में काम के दौरान नोटबंदी हमारे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण अनुभव था। मैं बैंकिंग क्षेत्र में नया ही था जब नोटबंदी लागू हुई थी, नोटबंदी के इस समय ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया। सर्दियों के दिन और सर्दियों की रातों में देर रात तक काम करते रहने का दर्द बैंक कर्मियों से लेकर लाइनों में लगे ग्राहकों तक, सभी ने झेला है। नोटबंदी और उसके प्रभाव को पांच महीनों तक, मैंने खुले बाज़ार में नहीं देखा, लेकिन हमारे लिए नोटबन्दी से बुरा कुछ भी नहीं हो सकता। हालांकि नोटबंदी सबके लिए इतनी बुरी नहीं रही, इस दौरान कुछ बैंककर्मियों की मिलीभगत से कई दलालों ने अपनी कोठियां तक खड़ी कर ली।

यूं तो किसी को लग सकता है कि बैंक की नौकरी तो बोरिंग होती है। लेकिन अपने काम को जल्दी करवाने को शोर मचाते लोग, बिना कायदे-कानून से अपने काम को करवाने के लिए अपने रसूख से धमकाते-झगड़ते लोग, वृद्धावस्था पेंशन के पैसे निकालने के लिए खड़ी महिलाएं, स्कॉलरशिप के लिए खाता खुलवाने की दरख्वास्त करते स्कूली बच्चे और साथ ही ऊपर से मिलने वाले टारगेट और व्यवस्था को सुधारने की ललक इस काम को कभी नीरस नहीं होने देती।


फोटो आभार: getty images 

सौरभ Youth Ki Awaaz Hindi सितंबर-अक्टूबर, 2017 ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं।

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