अब तो लौट आ!

Posted by Shubhangi Baranwal
November 19, 2017

Self-Published

जाने अनजाने वों आईं मेरे पास और बोलीं “बेटा, यह कुछ यादें हैं, दे देना उसे”…

बात उन दिनों की है जब मैं दसवीं में थी। अपने विद्यालय से मुझे और मेरे दोस्तों को  दिल्ली मैं हर साल होने वाली २६ जनवरी की परेड देखने के लिए चुना गया था।

आखिरी दिन था, जब हम सब वापस अपने शहर  लौटने के लिए रेलवे स्टेशन पर थे, मेरी बड़ी बहन मुझसे मिलने आई थी । इसी बीच एक अधेड़ उम्र कि महिला , उदास मन से ..कहती है-” बेटा यह उसे दे देना..” उन्हें देखकर लग रहा था जैसे उनके मन मे बहुत दुःख भरा हुआ हो,लेकिन छुपा रही हो…

उनके हाथ रूखे, बेजान से थे जिसमे उन्होंने वो यादे लिए हुए थी । असल बताउ तो वह महज कागज थे कयोंकि वे कागज किसी तस्वीर कि फोटो कापी थीं। जिस पर लिखा था-  “Manisha ojha, I want to talk with you … Contact – 98******0″

उस फोटोज में वह महिला, और एक छोटी सी बच्ची थी। उन्होंने मुझसे कहा कि” यह मेरी बेटी मनीशा को दे देना वह तुम्हारे विद्यालय के बारहवीं कक्षा मे पढ़ती हैं”। मैंने बोला ठीक है , मैं बिल्कुल दे दूगीं ।

इतना कह कर वो चली गई।

मैं वापस जब अपने विद्यालय गई तो , मैंने बारहवीं के हर कक्षा मे जाकर देखा लेकिन कोई ‘मनीशा ओझा’ नाम कि लड़की के बारे नहीं पता चला.. इस नाम कि कोई लड़की थी ही नहीं हमारे विद्यालय में।

वो कागज़ आज भी मेरे पास है, और उस दिन का इंतजार कर रहे के कब वो मिले और मैं उसे बता सकूं के कोई हैं तुम्हे याद करता है,. गुस्सा छोड़ और अब लौट जा…..।

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