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आख़री दिन / लघुकथा

Posted by Nitesh SR Kushwah
November 27, 2017

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दीवारों का मुँह नहीं था, वो केवल मेरी बातें सुन सकती थी जवाब नहीं दे सकती थी । जवाब शायद वो जानती भी ना हो।

रह-रह कर मन के भीतर किसी परत में एक टीस उठती है , दिल के दराज़ में बंद कई बरसों का सफ़र और उस सफ़र में कुछ धुंधली ,कुछ उजली और कई गहरी काली यादें है… किसी की आवाज़ सुने हुए एक उम्र बीत गयी है और लबों पर  अरसे से ख़ामोशी की कभी न छटनें वाली धुंध है।

“आख़री मुलाक़ात” के जख़्म अब तक हरे है, खरोंच दो तो लहू निकलने लगे।

हाथ सिर्फ़ स्याह लकीरों से भरे थे, जिनमें अरसे से एक ख़ालीपन था और बाकि थी तो बस उस छुअन की ख़ुशबू जो कोई दे गया था ।

मन को सम्भाले रखना आसान नहीं था, ना किसी लिखने-पढ़ने का लालच उसे बांध सकता था; वो बार-बार उस  आख़री मुलाक़ात के लम्हों की और दौड़ लगा देता।

 

वो एक हल्की सफ़ेद रंग की चूने से पुती सपाट बेंच जैसी जगह थी , जिस पर कुछ घण्टों हमने बैठ कर बीते हुए अच्छे-बुरे पलों की “बरसी” मनाई ।

 

कुछ शिकायतें लबों तक आकर रुक गयी और कुछ झूटी मुस्कुराहट ये बताने के लिए की सबकुछ बहुत अच्छे से  चल  रहा है। उसकी आँखों में अब वह पहले-सा दर्द नहीं था , शायद वो आँखों में भी नक़ाब चढ़ा कर आई थी ख़ैर एक पछतावे की गंध ज़रूर आ रही थी । बातें कुछ औपचारिक ही रही होगी और ऐसा भाव कि ये सब कुछ नॉर्मल है .. मैंने भी चेहरे पर कई नक़ाब पहन रखें थे पर वे सब भी कही-न-कहीं एक पारदर्शिता लिए हुए थे।

होंठ बहुत कुछ कह देने की ज़िद में सुर्ख हुए जा रहे थे , आँखें हमेशा की तरह थोड़ी भींगी हुई..

 

“शायद सब कुछ कह देना चाहिए..?? सबकुछ..??

हाँ कह दो।”

“चुप करों तुम”

 

मैंने फिर से भिखारी मन को चुप करा दिया, मन मुझसे नाराज़ होकर बहुत दूर जाता रहा ; हफ्तों तक बस में ना रहा।

मुलाक़ात इक  झिझक में कटती गयी ।

जाते-जाते मैंने उसका हाथ पकडा ,,नहीं ज़ोर से हाथ खिंचकर धीमे से कहा “अब हम कभी नहीं मिलेंगे…कभी नहीं”

जवाब में उसने भी कहा “हाँ..जानती हूँ”

आँखें बुरी तरह भींगने लगी थी, मैंने जल्दी से बहुत दूर निकल जाना ठीक समझा।

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कभी-कभी  बातों का कह देना अच्छा होता है ताकि मन को एक उम्र तक उनका बोझ ढोनें से बचाया जा सके।

 

-नितेश कुशवाह “निशु”

 

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