आज़ाद

Posted by Vini Sharma
November 15, 2017

Self-Published

अहसासों में क़ैद हैं
जज़्बातों में क़ैद हैं
कहने को तो आज़ाद हैं हम
फिर भी अपनी ही हदों में क़ैद हैं।

रुसवाइयों में क़ैद हैं
तो कभी तन्हाइयों में क़ैद हैं
कहने को तो आज़ाद हैं हम
फिर भी अपनी सच्चाइयों में क़ैद हैं।

किस्से कहानियों में क़ैद हैं
मनमानियों में क़ैद हैं
कहने को तो आज़ाद हैं हम
पर लहरें तो आज भी जनाब,
उनके किनारों में क़ैद हैं।

 

बस कहने ही को आज़ाद हुए हम,
लेक़िन ज़िन्दगी तो आज भी घड़ी की चंद सुइयों में कैद है!

-विनी

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