इंटरनेट और सोशल मीडिया के इतर धर्म का असल गणित

Posted by Himanshu Priyadarshi
November 13, 2017

Self-Published

आजकल एक नया लेकिन बहुत पुराना शिगूफा छिड़ा पड़ा है या यों कहें कि एक बार छेड़ा गया तो फिर कभी लोगों ने उसे सही करने और सहेजने की ज़हमत ही नहीं उठाई| वो शिगूफा है-धर्म| कोई भी बात हो रही हो, चाहे उस बात का विषय कित्ता भी अलग हो, कित्ता भी संजीदा हो चाहे बेहद जरुरी हो लेकिन कुछ लोग उस विषय का कीमा बनाने के लिए उसमें अपनी नाक और टांग दोनों घुसाने में यकीं रखते हैं वो भी हर दफ़ा| ऐसे लोगों से जब पूछा जाता है कि ‘धर्म बड़ा या मानवता’ तो उनका जबाब आता है-धर्म| ये वोही लोग होते हैं जिनसे ‘अकल बड़ी या भैंस पूछा जाये’ तो उनका जबाब आयेगा-भैंस| क्या भैंस ज्यादा बुरा लग रहा है तो प्रश्न बदल देते हैं इसमें कोई बड़ी बात नहीं है यार| अच्छा! अब प्रश्न पूछा जाता है कि ‘अकल बड़ी या बल’ तब भी उन लोगों का जबाब आयेगा-बल|
एक बात सोचो यार कि केवल बल की बात करने वाले क्या रक्षा करेंगे धर्म की| खालिस ताकत से केवल युद्ध लड़े जा सकते हैं गाँवों, शहरों और देशों को नेस्तनाबूत किया जा सकता है पर एक भी दिल नहीं जीता जा सकता है, यदि हम किसी की मुस्कान भी नहीं पा सकते तो अथाह ताकत किस काम की? दिल तो खालिस प्रेम से ही जीते जा सकते हैं और हमेशा से प्रेम का यही सिद्धांत रहा है| वो खालिस प्रेम की ताकत थी कि बुद्ध डाकू अंगुलिमाल का हृदय प्रेम और करुणा सहित विवेक से जीत पाए| वो भी प्रेम की ही ताकत थी कि बुद्ध ने अपने धुर विरोधियों को अपना अनुयायी बना लिया था बिना कोई जोर जबरदस्ती किये|
धर्म की साधारण सी परिभाषा इन बातों से समझ सकते हैं कि यदि धर्म लोगों को निकट लाये, लोग एक-दूसरे के धर्म की रीति-रिवाजों और परम्पराओं से सीखें, उनमें कुछ गलत लगने पर वैचारिक विरोध भी करें और इस तरह के शांतिपूर्ण-सहअस्तित्व वाले वैचारिक विरोध से किसी का भी धर्म विशेष खतरे में न पड़े, कोई भी रंग पहने-ओढें पर रंग से किसी को भी कोई दिक्कत न हो, सब एक-दूसरे की भाषा सीखें और भाषा तथा उसके शब्दों से अन्य भाषी को कोई दिक्कत न हो आदि बहुत सी मूलभूत बातें हैं मतलब धर्म के चलते या उसके बारे में अफवाह के चलते आपस में बैर पैदा न हो, छोटी-छोटी बातों से किसी का इस्लाम खतरे में न पड़े और किसी का हिंदुत्व विलोपन के कगार पर न पहुंचे तब तो धर्म का कुछ अर्थ उभर कर सामने आता है और यदि ऐसा नहीं है जो हकीक़त में ऐसा नहीं है तो धर्म के कोई मायने बचते नहीं|
जब शांति भंग करने वाले लोग जिनमें नेता से लेकर पण्डे-पुरोहित और मुल्ला-मौलवी और इनके अनुयायी/समर्थक तक सब शामिल होते हैं इनके अलावा इस अमानवीय कार्य को करने के मंसूबे रखते हैं आतंकवादी| इनका जिकर थोड़ी देर में करेंगे| हर धर्म में शुरू से ही पण्डे-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी और पादरी माने धर्मगुरु जन-साधारण में धर्म की चरस-अफ़ीम बो देते हैं जो हमारे बड़े होते-होते हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन जाता है और जब ऐसे में धर्म से सम्बन्धित मतलब धर्म के नाश से सम्बन्धित कोई झूठी खबर अथवा अफवाह आती है तो ऐसे में हम जैसे धर्म की चरस-अफ़ीम पिए हुओं को धर्म की रक्षा हेतु धर्म के ठेकेदारों और झंडावरदारों द्वारा उकसाया जाता है| ऐसे में हम अफ़ीम के नशे में जिसमे हम अपनी सोचने-समझने की शक्ति को नाश लगा चुके होते हैं, में ठस्स होकर जिस गली-कूचे से गुजरें तो मजाल क्या कि निर्जनान्दोलन में कहीं कोई कमी रह जाये| इसी धर्म की अफ़ीम के नशे का फायदा आतंकवादी तो अप्रत्याशित रूप से फायदा उठाते हैं और हम मजबूर होते हैं अपने धर्म को लेकर तो हम वो सब कर जाते हैं जो वे चाहते हैं|
अब हमें ये अच्छे से समझ लेना चाहिए कि ‘बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है’ मतलब जब क्रोध हृदय में स्थायी घर कर लेता है तो वह बैर बन जाता है, जैसे अचार या मुरब्बा बनाने कर लिए आम या आंवले को अन्य पदार्थों से मिलाकर कुछ दिनों के लिए बर्तन में रखा रहने दिया जाता है और कालान्तर में वह अचार या मुरब्बे में बदल जाता है और जब आवश्यकता होती है तो वह प्रयोग में लाया जाता है, यही स्थिति क्रोध की है, यदि वह तुरंत निकल जाये तो वह बैर नहीं बन पाता, परन्तु जब हृदय में किसी के प्रति क्रोध स्थायी रूप से घर कर लेता है, तब वह उसके प्रति बैर बन जाता है| यही स्थिति आज खासकर हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों की है इसे समझने के लिए नीचे बिहार के मधुबनी इलाके की एक घटना को जानिये/पढिये जो मनोज कुमार झा ने नवभारत टाइम्स के ‘खुद अपनी आँख से’ के कॉलम में लिखी| हिन्दू-मुस्लिम समाज का एक गणित ये भी है जिसकी हम ऊपर वाले गणित से तुलना कर ही नहीं सकते।
खुद अपनी आँख से
मनोज कुमार झा
तुझे कैसे मार सकता हूँ मैं?
बिहार के मधुबनी जिले के सुदूर इलाके में स्थित मेरे गाँव तक आते-आते दुनिया की बड़ी से बड़ी समस्या भी अपना रूप बदल लेती है| कुछ भीषण समस्याएं इतना सहज-सरल रूप अख्तियार कर लेती हैं कि आप हैरत से भर जाएँ| अब देखिये कि सितम्बर २००१ में अमेरिका के ट्विन टॉवर पर हुए आतंकी हमले से पूरी दुनिया विचलित थी, पर हमारे गाँव में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रह था| शुरू में तो उन्हें कुछ पता ही नहीं था| बाद में जब ‘ट्विन टॉवर हमला’ शब्द बार-बार सुनाई देने लगा तो जिज्ञासा हुई| कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने बताया कि ‘अनर्थ हो गया है| अमेरिका में बड़े टॉवर को ध्वस्त कर दिया|’ हमारे ठक्को झा को इस पर हंसी आ गयी| ‘इसी को अनर्थ कहते हो? अरे एक टॉवर गिर गया तो दूसरा बना लो| घर में सामान होगा तो उपद्रव करने के लिए बाहरी आयेगा ही|
देश में धार्मिक टकराव की बातें सुन-सुन कर कान पक जाते हैं, पर हमारे गाँव में आप इस्लाम मानने वाले किसी शख्स से भी पूछ दें कि ‘कौन जात हो’ तो वह बेहिचक कहता है, ‘मुसलमान’ और आगे बढ़ जाता है|
मगर ऐसे गाँव में भी कभी-कभी बाहरी हवा अपना असर दिखाने ही लगती है| गोरक्षकों द्वारा की जाने वाली मारपीट की खबरों ने हमारे गाँव के लोगों को भी बेचैन किया| मामला गम्भीर तब हुआ, जब पिछले दिनों ट्रेन में एक मुस्लिम नौजवान जुनैद को पीट-पीट कर मार डालने की खबर आई| उसी के बाद पड़ोस के मधेपुर कस्बे में दोनों समुदायों में किसी बात को लेकर मारपीट हो गयी और माहौल दंगे जैसा बन गया| इस आखिरी घटना ने गांववालों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था| ऐसे में एक दिन चौक पर किसी ने मुस्लिम समुदाय को लेकर कोई ऐसी टिप्पणी की कि इकराम मियां का खून खौल उठा| वह खड़े हुए और लाठी पटकते हुए कहा कि एक भी हिन्दू को नहीं छोड़ेंगे| इकराम मियां का यह रूप देख वह आदमी तो रफूचक्कर हो गया, पर इकराम मियां गुस्से में गरजे जा रहे थे, ‘आज तक इस इलाके में किसी ने भी हमारे बारे में ऐसा नहीं कहा था| अब पानी नाक तक आ गया है| अब इन लोगों को सबक सिखाना ही होगा…..|’ उनका एकालाप चल ही रहा था कि सामने से घनश्याम आया| उनसे पूछा, ‘काका क्या हुआ कि सभी हिन्दुओं को मारने पर उतर आये| ये बताओ मुझको भी मार डालोगे?’ बस इकराम मियां की आवाज ही बदल गयी, ‘ नहीं रे तू तो मेरा भतीजा है| मैं तेरी बात थोड़े ही कर रह था|’ पास खड़ा रघु बोल पड़ा, ‘जरुर मुझे मारने की बात कर रहे होंगे आप?’ ‘अरे तू भांजा है मेरा| तेरी माँ मुझे इकरू भैया तब कहती है जब उसे नाक साफ़ करना भी नहीं आता था| तुझे मारूंगा मैं?’
चौक पर खड़े लोग बारी-बारी से सामने आते रहे और इकराम मियां सबसे अपना रिश्ता बताते रहे| अंत में वहीं बगल की दुकान में पान खा रहे इकराम मियां के पक्के दोस्त राघव मुखिया से रहा नहीं गया| उन्होंने ठहाका लगाते हुए पूछा, ‘तब मारोगे किसको ये तो बताओ|’ अब इकराम मियां ने भी मुस्कुराते हुए कहा, ‘रग्घो तुम तो जानते हो, मारना-धारना हमसे होगा क्या?’ साफ़ है कि देश में आतंकवाद और हिन्दू-मुस्लिम विवादों ने हमारे गाँव की स्मृतियों में खरोंच तो लगाई, मगर अपना स्थायी कोना नहीं बना पाए हैं|

लोगों को माने आम जनता को हमेशा खुद को भारतीयता के संदर्भ में ही देखना चाहिए न कि किसी धर्म या वर्ग विशेष से जोड़कर। जनमानस का सोशल मीडिया पर धर्म तथा जाति को लेकर यूँ अतिसक्रियता दिखाना जान-बूझकर और अनजाने में किया गया समाज को तोड़ने वाला अवांछित कार्य होता है जो ट्रोलर्स और मॉब लिंचिंग करने वालों को दम देता है उन्हें उकसाता है। आईटी सेल वालों को तो इस काम के लिए उनके आका पैसे देते हैं उनका क्या, उनकी समझ तो उनके आका पैसे से निर्धारित करते हैं लेकिन आम जनता ट्रोलर्स और मॉब लिंचर्स से क्यों निर्धारित और निर्देशित हो रही है उसे इस बात को गहराई से समझना चाहिए क्योंकि ट्रोलर्स और मॉब लिंचर्स का समाज तो जाति और धर्म विशेष तक सीमित होता है जबकि आम जनमानस पूरे सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए उसे अपना सामाजिक गणित और उसके समीकरणों दोनों को दुरुस्त कर लेना चाहिए तभी हम एक समाज के रूप में तरक्की की राह पर पहला कदम रख पाएंगे।

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