क्रांतिकारी कवि का गीतकार तक का सफ़र

Posted by Syedstauheed
November 12, 2017

Self-Published

झांसी,मध्य प्रदेश में जन्मे श्यामलाल राय उर्फ़ ‘इंदीवर’ की पहली पहचान युवा क्रांतिकारी की थी। आप दूसरे नाम ‘आज़ाद’ से ब्रिटिश हुक्मरानों के खिलाफ कविताएं लिखा करते थे। जेल भी गए। बाद में फिल्मों में आए।  पहले-पहल ‘डबल फ़ेस’ के लिए गीत लिखे,शुरू में काम की चाह में हर एक प्रोजेक्ट के लिए हामी भर दी । रोजगार व आमदनी के लिहाज़ से यह कदम ठीक था ,किंतु स्तरहीनता के गिरफ़्त में जाते हुए अनेक ‘बी’ व ‘सी’ ग्रेड फ़िल्में साईन कर लीं । हांलाकि ‘‘मल्हार’(1951) से इंदीवर को एक दमदार फ़िल्म मिली, फ़िर भी खराब अवसर उन्हें सताते रहे। ‘ मलहार’ का गाना ‘बड़े अरमानों से रखा है बलम, प्यार की दुनिया में पहला क़दम’ ने आपके लिए कई दरवाज़े खोल दिए। 

मल्हार’ के निर्माता मशहूर गायक मुकेश थे। इसलिए कहा जाना चाहिए कि इंदीवर को सही मायनों में ब्रेक मुकेश साहब ने दिया। शम्मी और मोती सागर के कैरियर का आगाज़ भी इसी से हुआ। फ़िल्म ‘निर्मोही’ का हिट गीत ‘दुखियारे नयना ढूंढे पिया मोहे निस दिन करे पुकार’ फिर ‘कैसे कोई जिए, जहर है जिंदगी उठा तूफान’ जैसे हॉन्टेड गाने लिखे। मशहूर कम्पोज़र लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इंदीवर के लिखे गीत (पारसमणि) से कैरियर की शुरुआत की थी। फ़िल्म ‘ ‘मदारी’ में लता मंगेशकर का गाया ‘प्यार मेरा मजबूर परदेसी पिया’ हिट था। फ़िल्म ‘दूल्हा दुल्हन’ में मुकेश के गाने ‘जो प्यार तूने मुझको दिया है’ और ‘हम ने तुमको प्यार किया है जितना’ भी बेहतरीन थे।

इंदीवर ने 300 से भी अधिक फिल्मों के लिए लिखा। यही नहीं आपने मशहूर पॉप सिंगर्स नाज़िया व ज़ोहेब हुसैन के लिए बहुत से गीत लिखे,जोकि काफी पॉपुलर हुए। इस जोड़ी के गाने ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए’ और ‘दिल बोले बूम बूम ‘एक ज़माने में युवा दिलों की धड़कन रहे। बाबूलाल मिस्त्री की फ़िल्म ‘पारसमणी’(1963) के साथ वह सबसे आगे की पंक्ति में दाखिल हो गए । फ़िल्म मशहूर संगीतकार जोडी ‘लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल’ की पहली फ़िल्म थी, साठ के दशक में इंदीवर ने कई बडे फ़िल्मकारो व बैनर के साथ काम किया । यह महज संयोग नहीं कि उनके सबसे यादगार रचनाएं इसी युग की उपज हैं । लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम कर लेने बाद इंदीवर को कल्याणजी-आनंदजी का सान्निध्य प्राप्त हुआ । इस दौर की स्वर्णिम उडान बाद फ़िर इंदीवर ने मुडकर नहीं देखा और सफ़ल गीतकार के रूप में आज भी याद किए जा सकते हैं ।

कल्याणजी –आनंदजी इंदीवर के कुछ बेहतरीन प्रशंसकों में रहे, सरस्वती चंद्र(गोविंद सराय) जानी मेरा नाम(विजय आनंद) के यादगार गीत ‘छोड दे सारी दुनिया किसी के लिए’ फ़िर ‘ चंदन सा बदन’ और ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’(सरस्वती चंद्र) तथा देव आनंद अभिनीत ‘जानी मेरा नाम’ के गाने ‘ नफ़रत करने वालों के’ और ‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’ गीत मूड में एक दूसरे के विपरीत हैं । कैरियर के हिसाब से इंदीवर की दो सबसे महत्त्वपूर्ण फ़िल्में ‘सच्चा झुठा’ (मनमोहन देसाई) और ‘सफ़र’(असित सेन) इसी के आस-पास रिलीज़ हुई । सच्चा झुठा का गीत ‘ मेरी प्यारी बहनिया, बनेगी दुल्हनिया’ बेहद लोकप्रिय रहा। यह इस कदर हिट हुआ कि शादी बैंड से जोडकर देखा जाने लगा, हर बैंड वाला यह नंबर जरूर बजाता था । इसी समय रिलीज फ़िल्म ‘सफ़र’ में श्रोताओं को सुंदर दार्शनिक  गीत ‘जीवन से भरी तेरी आंखे’ सुनने को मिला । इस प्रकार पूरे दशक में इंदीवर और कल्याणजी- आनंदजी का साथ रहे, जो कि अस्सी के आरंभिक दौर के गीत ‘हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे’ ‘कुरबानी’(1980) से फ़िर जीवंत हुआ ।

इंदीवर को देशभक्ति गीतों का शौक रहा, किंतु उन्हें इस तरह के गाने लिखने अवसर सिर्फ़ मनोज कुमार ‘पूरब और पश्चिम’ में दे पाए । मनोज कुमार देशप्रधान फ़िल्मो मे विशेष पहचान रखते थे, उन्होंने इंदीवर के दो सुंदर गीत ‘ दुल्हन चली’ और ‘ है प्रीत जहां की रीत सदा’ फ़िल्म में अपनाए । मनोज कुमार इंदीवर के लिए बहुत लक्की साबित हुए, फ़िल्म ‘उपकार’(1967) एवं ‘पूरब पश्चिम’(1970)के लिए इंदीवर को मनोज कुमार ने साईन किया । इन दो फ़िल्मों मे मनोज कुमार-इंदीवर के साथ कल्याणजी –आनंदजी की तीसरी कडी भी रही ।

वह व्यक्ति जिसने ‘जिंदगी का सफ़र,है यह कैसा सफ़र कोई समझा नहीं … कोई जाना नहीं…लिखा, वक्त की भीड़ में भूला दिया गया। दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे गीत लिखने को बार बार नहीं कहा गया। चार दशक का  सफ़र महज़ कुछ चुनिंदा लोकप्रिय गानों में सिमट कर रह गया । कहा जाता है कि वह अच्छे अवसरों की कमी व फ़िल्म जगत की उदासीन व्यवहार से पीडित थे । कैरियर में स्तरीय गीतों का मौका नहीं दिया गया, फ़िर निराश होकर चलताऊ गाने लिखने लगे ।

अस्सी के दशक में बप्पी लहरी के ‘डिस्को’ संगीत की धूम रही, प्रतियोगिता में बने रहने के लिए इंदीवर को स्वयं को वक्त के सांचे में ढाल लिया था । बप्पी दा के संगीत से सजी ‘हिम्मतवाला’ एवं ‘तोहफ़ा’ के लिए टाईमपास गीत ‘ नैनो में सपना’(हिम्मतवाला), ‘प्यार का तोहफ़ा तेरा’(तोहफ़ा) लिखें । इस तरह मन ही मन फ़िल्म संगीत के बदलते तर्ज को स्वीकार कर लिया था। कहा जाता है कि उन दिनों वह  कवि रुप में स्वयं को पुन:स्थापित करने के लिए प्रयासरत थे, अब जबकि वह रुकसत हो चुके हैं उनका गीत ‘मधुबन खुशबु देता है’ याद आता है।

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