एक शाम का इंन्तजार

Posted by Manish Kannaujiya
November 23, 2017

Self-Published

आज फिर मैं अपने सही समय पर दुर्गाकुंड तालाब पहुच चूका था, वही अपने सालोसाल चल रहे परम्परा दुहराने को माने की तालाब किनारे मछलियों से खेलने । एक पल भी देर न करते हुए अपनी जेब से आटा का गोला निकाला और किनारे फेकने लगा।
गोले को पानी से संपर्क होते देर न लगी की मछलियां तुरन्त आ गयी, उसको लीलने ऐसा लग रहा था बहुत समय से मेरा इंतजार कर रही हो ।
मेरा और उनका एक अलग ही तालमेल हो गया था, ऐसा लगता था हम दोनो एक दूसरे को कितना समझते है । ये मेरा रोज का काम था और उनका भी दोनों लोग लगभग सही समय पर आ जाते थे।

जिंदगी के भागदौड़ में हम बहुत ब्यस्त थे ।मगर इतना भी ब्यस्त न हो सके की उनके लिए वक़्त न निकाल पाये । दिन न जाने कौन से चिंता में गुजरता था। हर तरफ एक अजब सा माहौल था, लोग अपने में ही ब्यस्त थे, कोई किसी को वक़्त नही दे पाता था। व्यस्तता का आलम यह था कि दोस्त भी अब हाल चाल फेसबुक से ले लेते थे, माने की किसी को एक कदम चलना भी भारी हो गया था। यही हाल था हमारा इसलिए हम भी दिन गुजरने शाम होने का बेशब्री से इंतजार करते थे । ताकि अपने परम् मित्र से जाकर मिल सके। और अपने मन का बोझ हल्का कर सके।
उनके पास पहुचते ही लगता था वो हमारी बहुत अदब के साथ स्वागत करती हो। मुझसे बाते करती हो । ऐसा लगता था वो मुझसे कह रही हो यार तू इतना चिंता में क्यों डूबा रहता है । सब कुछ ठीक हो जायेगा एक दिन बस उस वक़्त का इंतजार करो ।यही सब सोचकर हस्ते हुए मैं अपने रूम की तरफ उनसे विदा लेकर चल देता।
धीरे धीरे यही क्रियाकलाप चलता रहा । फिर एकदिन मेरा इंजीनियरिंग एंट्रेंस का परिणाम आया । मुझे मेरिट के हिसाब से अच्छा कॉलेज मिल रहा था । मैं आज पहली बार दिन में इतना खुश था । न जाने क्यों खुद पर यकीन नही हो रहा था, क्या ये मेरी अकेले की मेहनत है या किसी और का साथ । मैं शाम को उस तालाब के किनारे पहुँचा तो कुछ अजीब देखा कुछ ऐसा जिससे मेरी आँखों को भरोसा नही हुआ कुछ ऐसा जिसपर यकीन करना शायद मेरे बस के बाहर था ,मगर हक़ीक़त यही था । सब की सब मछलियां उल्टा पानी पर तैर रही थी काफी भीड़ जमा हुई थी ।

सब लोग अपनी अपनी दिमाग से तर्क लगा रहे थे ऐसे हुआ होगा वैसे हुआ होगा । मगर क्यों? इनको क्यों मार दिया गया। इनकी क्या गलती थी । इनसे किसकी दुश्मनी हो सकती है । मगर हक़ीक़त यही था आज मैंने कुछ पाकर बहुत कुछ खो दिया था । मेरे मुश्किल समय में जो मेरे साथ था आज वो मेरे सबसे सही समय में साथ नही है । शायद मेरे लिए यही सबसे अजीब दिन था । मैं आज फिर विदा ले रहा था उनसे मगर हमेशा के लिए। ये मुलाकात हमारी आखिरी थी ।

मनीष ‘काजू’

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