कश्मकश

Posted by Sagar Papneja
November 6, 2017

Self-Published

आज दिल में एक कश्मकश है, 

क्या हूँ मैं खुदा से, या खुदा है मुझसे 
आज दिल में एक कश्मकश है, 
 
असमंजस में इंसान है, थोड़ा डरा हुआ, थोड़ा फिरा हुआ, थोड़ा भड़का हुआ, जेब से कड़का हुआ, 
हर रात ये भूखे पेट बच्चों को सुला देता है, अपने हिस्से की रोटी कभी कालू को भी खिला देता है, 
चाहता है एक चौल हो, तलपटरि छत पर और बारिश बाहर हो, 
बस चाहता है की लक्ष्मी बेटी बुखार से दूर रहे, 
क्यू की डॉक्टर और रोटी में से चुन ना ना पड़े, 
लक्ष्मी, हर सवेरे बसता लिए इस्कूल की तरफ़ निकलती है, उसके पीछे ही तो काँक्रीट के इंसानों की वो बस्ती है, 
जहाँ लक्ष्मी रोज़ाना थोड़े बर्तन थोड़े सपने धोती है, अपने मैले आइने को मेहनत से पोंछती है, 
 
एक दिन सुलझे से मानुभाव ने, लक्ष्मी पर दया दिखाई, चाइल्ड लेबर नहीं चलेगा- कहके Mrs मानुभाव इतराई, 
नौकरी गई तो बापू की दवाई कौन लाएगा, कौन सब्ज़ी भाजी भीख में खिलाएगा। 
पूछा उसने नज़ाकत से, एक बात आप बतलाए, कितनी तालीम हुई है आपकी, मुझको ज़रा समझाए
मानुभावस को लगा ये क्या समझेगी, बोल दिया उसको हमने 18 तक है कि,
लक्ष्मी ने बड़े तहज़ीब से सवाल उनसे कुछ पूछा, मैं 5vi पास अकेले बीस भेड़ चराती हूँ, आप इतने पढ़े तो क्या १०० बकरी चरा लेंगे?
उसस मासूम से सवाल ने, जैसे दिलों में मशाल जला दी, समाज के रिवाज़ी की धज्जियाँ सी बना दी, 
क्या होती है तालीम, जो इंसानो में ये बैरक करे, 
मजबूरी को चाइल्ड लेबर और istehkak को चाइल्ड आर्टिस्ट कहे? 
अपाहिज बाप, सन्नाटे से सजी हुई तलपटरि के तले वो झोपड़ी, इस लक्ष्मी के क़दमों से जगमग थी, 
हाँथों की लकीरें शायद कठोर कहानियाँ बयान कर रही थी, 
 
ये कौन सा कर्मा है, सिर्फ़ दो चार नहीं ये किससे,
आज दिल में एक कश्मकश है, 

क्या हूँ मैं खुदा से, या खुदा है मुझसे 
आज दिल में एक कश्मकश है

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