काशी गंदगी से मुक्ति पाने में असमर्थ क्यों?

Posted by Animesh Mishra
November 24, 2017

Self-Published

सिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।

वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है ।यह संसार का प्राचीनतम बसे शहरों में से एक है और पवित्र गंगा किनारे बसे होने के कारण इसका गंगा से भी अटूट सम्बन्ध है ।

आज बनारस अपने आदर्श के विपरीत जगह जगह कूड़े-कचड़े का अम्बार,टूटे सड़कों से बने गड्ढे में भड़े कीचड़,बदबूदार गलियां जिसकी कल्पना मात्र से इंसान अस्वस्थ हो जाए,नालियों से निकलने वाले मल का रोड पर जमाव,और प्रदुषण के उस सस्तर को छू लिया है जिसकी कल्पना तो लोगो ने की थी पर यतार्थ के चित्र से सब दुरी ही बनाना चाह रहे थे ।
कुछ मिनट सड़कों पर गुजारने पर लोगों को साँस लेने में तकलीफ और गंदगी से लोगो की मिजाज ख़राब हो जाती है।प्रसाशन आँख बंद किए हुए है तो लोग अपनी जिम्मेदारी से भागकर  दूसरों पर इलज़ाम गढ़ने का काम कर रहे है।गौ माता द्वारा चौराहों पर (लावारिश) पड़े कचरे ,प्लास्टिक खाने से स्तिथिया और भी भयावह रूप ले रही है ।

“काशी का स्थान हिंदुओं के हृदयस्तलि में है,हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार काशी की धरती यंहां आये हुए लोगों को मोक्ष प्रदान करती है है और जीवन चक्र से मुक्ति भी दिलाती है तथा विस्वास से भरे लोगो का मार्गदर्शन करने का भी काम करती है काशी की देवधरती,पर बिडम्बना इस बात की है की लाखों लोगो को मार्गदर्शन करने वाली काशी आज खुद के बच्चों का मार्गदर्शन करने में असमर्थ नजर आ रही है ।”

बनारस में इस गंदगी के किले बन्ने के चार प्रमुख वजह है,पहला आवश्यकता से अधिक निर्भरता-बनारस के लोग मृदुभाषी,अपनापन रखने वाले और मददगार लोग होते है ।पर अगर स्वछता के संदर्भ में बात की जाए तो यंहा के लोग पुरे गली,चौराहे और चौराहे से रोड यंहा तक की अपने घर के बाहर की सफाई का जिम्मा आदरणीय प्रधानमंत्री जी को दे दिया है ।ये निर्भरता इतनी है की चाय दुकान पर चाय की चुस्की लेते वक़्त 80 साल के बुजुर्ग  हो या 10 साल का छोटा सा स्कूल जाने वाला बालक ये कहते नहीं थकता की “अब मोदी जी तो विदेश रहे,तो काशी कँहा से स्वच्छ होई” ।आलम यह है की यही मृदुभाषी लोगों की आवाज़ आज सांसद महोदय को किसी करेले की जूस की तरह ही स्वीकार करना पड़ेगा,यही अपनापन रखने वाले लोग अपनी गलतियों का बोझ अपने प्रिय नेता पर डालकर उसे परया भी बनाना सुरु कर दिए है और यही मददगार लोग आज अपना घर -आँगन और शहर साफ़ नहीं रखना चाहते है ।मोदी को दोष देने की हवा ऐसी चली है की काशी विश्वनाथ के एक दिन के  दर्शन के लिए आये हुए श्रद्धालु और बाबा के भक्त मोदी के शहर और मोदी जी पर दोष मढ़े बिना अपने घर नहीं जाते है ।
बहरहाल ये निर्भरता कंही न कंही मोदी पर लोगो का विश्वास और अपने से जोड़े हुए है पर मोदी जी और उनकी पूरी टीम के लिए ये खतरे के रेड सिग्नल है ।

“कहा तो यही जा सकता है की  कन्ही काशी की सफाई का ये ज्वलंत समस्या अगले चुनाव में मोदी जी का सफाया न कर दे ।”

अत्यधिक जनसख्या दूसरी कारण है जिससे न सिर्फ प्रदुषण बढ़ा है बल्कि अत्यधिक गर्मी के होने का कारणों में भी ये एक है ।दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की सूचि में काशी भी सामिल है

आलम यही रहा तो काशी के लिए इतिहास के पन्नों में पग पग में तीर्थ होने जैसे सब्दों का तबादला कन्ही पग- पग पर गंदगी और कूड़ों का अम्बार से न हो जाए।

तीसरा कारण जो सबसे महत्वपूर्ण है वो है नगर निगम की निंद्राय रवैये और स्वछता पर ध्यान नहीं देने की है।स्तिथि ये है की चौराहों पर कचरे  जमा करने  वाले डम्पर तो अपने स्थान पर नहीं ही हैं साथ ही  जाम,कूड़ो से लबालब,हज़ारो बिमारियों की जननी नालियों से बेह रहे गंदगी जरूर रोड पे से बहना सुरु हो गए है ।जिस प्रशासन के भरोसे पर बनारस को क्योटो बनाने का सपना प्रधानमंत्री जी ने देखा है,वही प्रशासन अगर बेईमान और कामचोर हो,तो भविष्य के गर्भ में छिपे इस सपने को यथार्थ में परिभाषित करना संभव नजर नही आ रहा है क्योंकि जिस संसदीय क्षेत्र के जनता के आशीर्वाद प्राप्त कर मोदी जी ने स्वच्छ भारत जैसे महत्वाकांची योजना की सुरुआत करने का गौरव प्राप्त किआ है,वही बनारस अगर स्वच्छ भारत के रैंकिंग में देश के दस सबसे गंदे शहरों में अपना स्थान पाये तो सवाल तो उठना लाजमी है ।अगर प्रशासन अभी भी सचेत नही हुआ तो

 हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बनारस घराना को जन्म देने वाली काशी अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो जाएगी।

चौंथा कारण है जागरूकता की कमी,जागरूकता के आभाव में लोग गंदगी को इधर उधर फ़ेंक देतें है और लोगो को अपने शहर से प्यार या लगाव की भनक होने जैसीं बातें भी सामने नहीं आ रही है ।ऐसे में सामाजिक संस्थान, सरकार और समाज के जानकार लोगो को चाहिए की शिविर और संपर्क के माध्यम से लोगो को स्वछता के और स्वच्छ भारत के निकट ला खड़ा करे जिससे लोग अपनी जिम्मेदारी से भागने की कोशिस नहीं करे क्योंकि अगर लोग स्वच्छ होना नहीं चाहेंगे तो स्वंय प्रभु महादेव और दिल्ली के तख़्त पर काबिज प्रधानमंत्री जी भी निराश होने के अलावा कुछ नहीं कर सकते
हर हर महादेव
-अनिमेष मिश्र©

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