क्या लाज़मी है मेरा डर जाना?

Posted by Kunwar Hari Om
November 14, 2017

Self-Published

भारतीय राजनीति के केंद्र बनारस के कैंट स्टेशन के आखिरी प्लैटफॉर्म पर बैठकर मै देश में सर्वाधिक बिकने वाले अख़बार का पहला पन्ना पढ़ रहा था, उसमें लिखा था कि देश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

तभी मेरी नज़र एक नौ साल की बच्ची पर पड़ी, बदन पर फटे मैल से भरे फ्रॉक के साथ उसने अपने पीठ पर एक बड़ी सी-गंदी सी प्लास्टिक की बोरी टाँग रखी थी, उसके आँखों को देख लग रहा था जैसे वो प्लैटफॉर्म और पटारियों के पास फ़ेके गए सारे बोतलों को अपने बोरी मे समेट लेना चाहती थी!

वो नौ साल की छोटी बच्ची जो पीठ पर थैला लिए भीड़ को चीरते, ढकेलते आगे बढ़े जा रही थी, उसे नहीं पता था कि वही भीड़ यूँकी उससे बहुत छोटी भीड़ भी उसके साथ क्या कर सकती है पर मै अनभिज्ञ  नहीं था!

मै अनभिज्ञ  नहीं था इस बात से की वैसी ही हिम्मती, निडर नौ साल की बच्ची कहीं और किसी सुदूर गांव में पीठ पर बस्ता लिए घर को लौट रही थी और एक बहुत छोटी भीड़ ने उसे नोच खाया था, शायद इसीलिए भीड़ के बीचों बीच इरादों से सुदृढ़ कंधों और आत्मविश्वास से लबरेज उसके बढ़ते कदमों को देख कर मै डर गया।

मेरा डर उसकी जीत थी या हार यह मुझे नहीं पता, पर यह जरूर कह सकता हूं कि वो किसी के डर से डरने वाली नहीं थी, ये साफ़ साफ़ उसकी आँखों में लिखा था,हाँ मैंने देखा था।

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