क्या सरकारों के लिए ‘बाल दिवस’ बस एक इवेंट है

Posted by vivekanand singh
November 13, 2017

Self-Published

आपके सामने जब भी बचपन शब्द का जिक्र आता होगा तो पलभर के लिए आप फ्लैश बैक में जरूर चले जाते होंगे. दादी-नानी की किस्से-कहानियों की धुंधली-सी याद आंखों के आगे तैरने लगती होंगी, मन रोमांचित हो उठता होगा. दरअसल, हम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन यानी कि बाल दिवस मना रहे हैं. आप भी चाहें तो खुद के अंदर के बच्चे को भी ढूंढ़ने की कोशिश कर सकते हैं. सही मायने में उम्र जितनी छोटी होती है, संभावनाएं और सपने उतने ही बड़े होते हैं. यही कारण है कि हमें बच्चों के लिए अलग से दिवस निर्धारित करने की जरूरत पड़ गयी, ताकि कुछ देर के लिए ही सही भूत और भविष्य को ध्यान में रख कर हम वर्तमान हालात पर चर्चा कर सकें. साथ ही बच्चों को इस बात का एहसास दिलाया जा सके कि वे कितने खास हैं.

कई बार यह भी विवाद का विषय बन जाता है कि हम बच्चा कहेंगे किसे? भारत की जनगनणा में 14 वर्ष से कम आयु के लड़के और लड़कियों को बच्चे की श्रेणी में रखा गया है. हालांकि, यूनाइटेड नेशंस कॉन्वेंशन ऑन द राइट ऑफ द चाइल्ड के मुताबिक, 18 वर्ष से कम उम्र की सभी लड़के-लड़कियां बच्चे की श्रेणी में आते हैं. अक्सर हमारे देश के नेता यह कहते नहीं थकते हैं कि बच्चे तो हमारे देश के भविष्य हैं. लेकिन वर्तमान आंकड़ों पर जब हम नजर डालते हैं, तो भविष्य का एहसास ही बड़ा डरावना-सा प्रतीत होता है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में 18 साल से कम उम्र के 44 करोड़ 40 लाख बच्चे हैं. यह देश की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हिस्सा है. 2011 की जनगणना रिपोर्ट बताती है कि 14 वर्ष से कम आयु के चार बच्चों में से एक स्कूल ड्रॉपआउट है. आंकड़ों के मुताबिक, स्कूल जानेवाले बच्चों में से 99 मिलियन यानी 9 करोड़ 90 लाख बच्चों ने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी. डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (डीआइएसइ) 2014-15 की रिपोर्ट के मुताबिक, हर 100 बच्चों में से केवल 32 बच्चे ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं. यह आंकड़ा उनका है, जो किसी तरह पढ़ने स्कूल तो पहुंच जाते हैं, लेकिन स्कूल स्तर की पढ़ाई के दौरान ही उसे भिन्न-भिन्न कारणों से पढ़ाई को डिसकंटिन्यू करना पड़ता है.

अब आप ही अंदाजा लगा लीजिए कि देश में प्राथमिक शिक्षा की क्या स्थिति है. इस मामले में अगर हम अपने देश की तुलना अन्य देशों से करें तो चीन, श्रीलंका, म्यांमार, ईरान आदि से भी पीछे हमारा नंबर है. हमारे देश में शिक्षा का जिम्मा राज्यों के ऊपर है, इसलिए सभी राज्यों के लिए इसकी चुनौतियां और समस्याएं अलग-अलग हैं. बिहार-झारखंड समेत अन्य राज्यों में ऐसे कई सरकारी स्कूल हैं, जहां बच्चों को पीने का साफ पानी भी मुहैया नहीं हो पाता है. स्कूल में शौचालयों तक की व्यवस्था नहीं है, उन्हें यूरिनल्स बाहर मैदानों में करना पड़ता है, जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(अ) में इस बात का प्रावधान है कि छह वर्ष से 14 वर्ष तक के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी. यह बच्चों का मौलिक अधिकार है, लेकिन तरक्की के तमाम दावों की हकीकत यही है कि भारत में बच्चों की स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है.

अब सवाल यह है कि बच्चों द्वारा पढ़ाई न कर पाने या बीच में छोड़ देने के लिए हम किसे जिम्मेवार मानें? अरस्तू का एक बड़ा ही चर्चित कथन है कि सात साल तक के किसी बच्चे को आप मुझे दें, सात साल बाद एक विद्वान या एक शैतान या फिर आप जैसा भी चाहेंगे, वैसा व्यक्ति मैं आपको लौटा कर दूंगा. यानी कि सात से 14 वर्ष की जो उम्र होती है, वह बनने या बिगड़ने की उम्र होती है. असल में बच्चे तो कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जो आकार दिया जाता है, वे वही रूप अख्तियार कर लेते हैं. देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को लेकर खासतौर से राज्य सरकारों को गंभीरता से सोचने और उस पर अमल करने की आवश्यकता है. भारत जैसे विविधतावाले देश में अगर किसी अभिभावक को लगता है कि प्राइवेट स्कूल में बच्चों का एडमिशन करवा भर देना, उनकी समस्या का हल है, तो वे भारी भूल कर रहे हैं. यह व्यवस्था शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के बीच एक नयी खाई पैदा कर रहा है.

असंतुलित पोषण से जूझता बचपन
आपको यह जान कर आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए कि भारत में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में छह साल से कम उम्र के 19.8 मिलियन यानी एक करोड़ 98 लाख बच्चे कुपोषित हैं. संविधान का अनुच्छेद 45 कहता कि छह साल से कम उम्र के बच्चों के चाइल्डहुड केयर और एजुकेशन की जिम्मेदारी स्टेट की बनती है. पिछले ही महीने झारखंड के सिमडेगा जिले में रहनेवाली कोयली देवी की बेटी भूख की वजह से मर गयी. उस दिन सिर्फ वह बच्ची नहीं मरी, बल्कि मरते-मरते उसने हमें एहसास दिलाया कि यह सिस्टम मर चुका है, समाज की संवेदना मर चुकी है.

राजनेताओं के लिए बाल दिवस अपनी-अपनी पार्टी-पॉलिटिक्स के प्रचार का दिवस तो बन जाता है, लेकिन कुपोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह, बाल यौन शोषण जैसी गंभीर समस्याओं की स्थिति जस-की-तस बनी रह जाती है. बच्चों से उनका बचपन छीननेवालों में दोषी सिर्फ सरकार ही नहीं है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 2015-16 की रिपोर्ट कहती है कि छह से 23 माह के मात्र 9.6 फीसदी बच्चों को ही संतुलित और परिपूर्ण आहार मिल पाता है. एनएफएचएस 2015-16 की इसी रिपोर्ट में जिक्र है कि छह माह से पांच वर्ष तक के 58 फीसदी बच्चे एनिमिया यानी रक्तहीनता के शिकार हैं. वहीं दूसरी तरफ खान-पान और बदलती जीवनशैली ने बचपन के एक बड़े तबके को मोटापे का शिकार बनाना शुरू कर दिया है. हम बस बातों में दोहराते रह जाते हैं कि हेल्थ इज वेल्थ. हकीकत यही है कि स्वस्थ और पोषित बचपन से ही सुरक्षित राष्ट्र तैयार हो सकता है. यहां सरकार को कामचलाऊ इवेंट से बाहर निकल कर ग्रासरूट लेवल पर पहल करने की जरूरत है. आंगनबाड़ी जैसी व्यवस्थाएं कब भ्रष्टतंत्र की भेंट चढ़ चढ़ जाती है, हमें पता भी नहीं चल पाता.

बाल मजदूरी के बोझ तले दबे बच्चे
देश में बाल मजदूरी की समस्या भी बहुत गंभीर है. वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, पांच से 14 साल तक के उम्र के बाल मजदूरों की संख्या एक करोड़ 13 लाख है. अब तक इस संख्या में और वृद्धि भी हो गयी होगी. जनगणना की रिपोर्ट कहती है कि देश में पांच से 18 साल तक की उम्र के 3.30 करोड़ बच्चे किसी-न-किसी प्रकार की मजदूरी करते हैं. वहीं, डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों से बच्चों के खिलाफ अपराध में पांच गुणा की वृद्धि हुई है. इसे रोकने के लिए देश में द चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एक्ट. 1986, द फैक्ट्रीज एक्ट. 1948 जैसे कड़े कानून तो मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन करने को न तो समाज बाध्य है और न ही व्यवस्था इस पर कड़ी नजर रखती है. बच्चों को उनका बचपन लौटाने की जिम्मेदारी कानून के साथ-साथ समाज की भी है. बच्चों के खिलाफ होनेवाले अपराध को समाजिक प्रयास से ही पूर्णतया समाप्त किया जा सकता है, बस जरूरत है तो अपने स्तर से पहल करने की. ऐसा डेनमार्क, फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे जैसे कई देशों ने करके दिखाया है.

तकनीक से सामंजस्य बनाने की जरूरत
तकनीक की मदद से तेजी से बदलती दुनिया में इन बुनियादी चुनौतियों से अलग हट कर भी बच्चों के लिए कई तरह की नयी-नयी समस्याएं सामने आ रही हैं. इन समस्याओं से बच्चों को बचाने की पहली जिम्मेदारी माता-पिता की ही बनती है. यहां बच्चों को बेहतर पैरेंटिंग की आवश्यकता होती है. शिक्षा भले ही महंगे फीसवाली स्कूलों में मिल जाये, लेकिन बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार को पुष्पित-पल्लवित करने की जिम्मेदारी परिवार के लोगों की है. आप अगर दिन-रात स्मार्टफोन से चिपके रहेंगे, तो बच्चे भी आपको देख कर वही आदत अपनाएंगे. परिवार के लोगों की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चे को अच्छे-बुरे में भेद करना सिखाएं. प्रद्युम्न हत्याकांड में हो रहे खुलासों से सीख लेने की जरूरत है. सही मायने में बच्चे तो इस बगिया के वे फूल हैं, जिसकी खुशबू से यह दुनिया गुलजार है, लेकिन ये इतने कोमल होते हैं कि जरा-सी ठेस पर भी मुरझा जाते हैं और यदि एक बार ये मुरझा गये, तो इनका फिर से खिलना नामुकिन हो जाता है. इसलिए, बच्चों को उनका सुरक्षित बचपन देने की जिम्मेदारी देश के हर नागरिक की बनती है. बाल दिवस पर बाल अधिकारों की सुरक्षा का संकल्प लेकर आप बच्चों को सबसे प्यारा गिफ्ट दे सकते हैं.

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