क्या हम वाकई विकास की और जा रहें हैं |

Posted by Kamlesh Bohra
November 16, 2017

Self-Published

हमें यह जानना बेहद जरूरी है कि क्यों आज हम अमरिका और इंग्लेण्ड जैसे देशों में जाना पसंद करतें है | इन सबका एक ही उत्तर है , क्योंकि वह देश हम से कई ज्यादा विकसीत हैं |

लेकिन एक वक्त ऐसा था 16-18 वी शदाब्दि में यूरोप से लोग भारत आये क्येंकि उस वक्त हमारा देश उन देशों के मुकाबले काफी समर्ध था | चीनी यात्री ह्वेन-सांग जैसे विद्वान ने भारत में रूककर नालन्दा विश्वविद्यालय मे शिक्षा ग्रहण की | यूरोपिय , अरबी लोगों ने भारत को और यहाँ की संस्कि्रति को समझने के लिये संस्क्रत भाषा सीखी तथा इस भाषा को सभी भाषाओं की जननी कहा | और आज हम उन ही लोगों की पाश्चात्य संस्किर्ति का गुणगान करते नहीं थकतें जो कभी हमसे यह सीख कर गये कि जीवन कैसे जीया जाता है | एक बार भारतवासियों को समझाने के लिये स्वामी – विवेकानन्द जैसे महापुरूष ने जन्म लिया , और देश – विदेश में ख्याती प्राप्त की , लेकिन उनके जाने के बाद हम अपनी गुलामी मानसिकता में जकडते चले गये |

पता है हमारी सबसे बडी कमजोरी क्या है , कि हम हर बदलाव के लिये एक नायक की तलाश करतें हैं , और सोचतें हैं कि यह हमारा काम नहीं या अकेले मुझसे थोडी बदलाव आयेगा | नायक जन्म नहीं लेते वह बनतें है , हमारे बीच शायद हम से कोई एक या हम सब , स्वामी- विवेकानन्द जी भी एक सामान्य पुरूष थे , लेकिन जब उन्होंने दूसरों के दुखों को अपना समझा और सेवा-भाव में लगकर देशवासियों की सेवा करने का निर्णय लिया तो देखते – देखते वह कब युग-पुरूष बन गये शायद उन्हें भी इस बाद का पता ना चला होगा | आज 21वी सदी में हम भारतीय एक झूठे अभिमान के साथ जी रहें है कि हम विकीस की और तत्पर हैं | लेकिन भला कौन सा ऐसा देश होगा जो अपनी संस्कि्रति को भुला कर उसका त्याग कर अपना वजूद कायम रख सकेगा | हम पाश्चात्य देशों को देखकर उनके जैसा बनने की चाह रख कहीं न कहीं अपने विनाश का कारण खुद ही बन रहें हैं |

याद रहें आज भी अगर कोई भारत में आता है तो यहाँ कि पुरानी विरासतों और मंदिरों में उकेरी गई कलाओं को देखने के लिये आता है , न कि इस लिये कि भारत में चल क्या रहा है | मतलब अब भी साफ है , अगर हम आज भी दुनिया वालों की नजर में कहीं न कहीं महान हैं तो सिर्फ अपनी संस्कि्रति की वजह से वरना आज हमारे देश में हमने कुछ ऐसी नही किया कि वह हमें पूछने आये , और इसी संस्किर्ति को हम पुराना और डकोसला बता कर निरन्तर उससे पीछा छुटाना चाह रहें | क्या हम विकास की और जा रहें हैं |

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.