क्या 2019 राहुल गांधी का होगा?

Posted by Mayank Pathak
November 17, 2017

Self-Published

क्या 2019 राहुल गांधी का होगा?
 

जब 2009 लोकसभा चुनाव के परिणाम आए, तब उसके बाद एक बड़े पत्रकार ने लेख लिखा था कि 2014 के चुनाव कांग्रेस बनाम छेत्रिय पार्टियों के बीच होंगे और भाजपा जनता पार्टी की तरह बिखर जायेगे,उस वक़्त के हिसाब से ये बाते सही लगी क्योंकि 2004 के मुक़ाबले भाजपा की सीट हर राज्य में घटी थी मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भी।लेकिन भारतीय राजनीति ने ऐसी करवट बदली की 2014 के परिणाम के बाद “कांग्रेस मुक्त भारत” की बात होने लगी,मोदी-शाह की जोड़ी अपराजिता लग रही थी, लेकिन कांग्रेस के लिए कुछ अच्छा हो रहा है जो 2012 कि याद दिलाता है जब भाजपा और संसदीय विपक्ष नही बल्कि दूसरे कारणों ने कांग्रेस की साख पर बट्टा लगाया,जैसे  कैग,सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी जिसे भाजपा ने लपका।युवाओं की उम्मीद इस सरकार से उस हद तक पूरी नही हो रही है, अर्थव्यवस्था ढलान पर है।परसेप्शन राजनीति में बहुत कुछ तय करती है,अर्थव्यवस्था का मंदा होना,नौकरियां का कम होना,और कहीं न कहीं कांग्रेस की वापसी। मध्य प्रदेश की झाबुआ-रतलाम लोकसभा सीट जिसे भाजपा ने 2014 में 1,37,000 वोट से जीता था,उसपर जब 2016 में उपचुनाव हुए तब कांग्रेस एक लाख वोट से जीती।।राजस्थान में भाजपा 2013 में 165 सीट जीती थी और लोकसभा में 25 में 25 लेकिन 2015-16 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस 4 में 3 सीट जीती और खास बात ये थी कि ये चुनाव भाजपा के विधायको के सांसद बनने पर खाली हुए थी,उसी तरह गुरुदासपुर के परिणाम आए।राहुल गांधी अमेरिका से आने के बाद एक नए तेवर में है,याद करिये की कांग्रेस के वक़्त में भी सिर्फ जनता का परसेप्शन विरोध में गया था,2012 के बाद कांग्रेस ने मोदी की हर बात का जबाब देने के लिए अपने मंत्रियों की बैटरी खरी कर देते थी जिसने मोदी को बड़ा राष्ट्रीय नेता बनाया 2013 आते आते,उसी तरह भाजपा भी जिस तरह से राहुल गांधी की बातों का जबाब देने के लिए अपने कैबिनेट मंत्रियों को खड़ी कर रही है ये राहुल गांधी की छवि में जमीन पर बदलाव ला रहा है।

राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को भाजपा के गढ़ थे वहाँ कुछ एन्टी-इंक्यूम्बनकई(anti-incumbency) तो आ रही है।2014 के चुनाव के बाद जिस तरह से राजस्थान की जिम्मेदारी सचिन पायलट को दी गई वो कांग्रेस को मदद कर रहा है,मध्य प्रदेश में अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया को शिवराज सिंह से लड़ने के लिए एक साल का मौका मिला तो परिणाम चौकानें वाले हो सकते है।उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 325 सीट लाकर विपक्ष को ये आभास दिला दिया कि बिना एक हुए भाजपा से लड़ना संभव नहीं है।उत्तर प्रदेश में 2017 में भाजपा को 39% वोट मिले थे और कांग्रेस-सपा-बसपा को मिलाकर 51%,अगर ये एक हुए तो उत्तर प्रदेश की 80 सीट भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है।महत्वपूर्ण बात ये भी है कि भाजपा की 16 से ज्यादा राज्यों में सरकार है और 2019 आते-आते वो सरकारें 3 साल से ज्यादा पुरानी हो जायेगी जो 21वी शताब्दी की राजनीति में एन्टी-इम्सीबनकी(anti-incumbency) की तरफ़ ले जाता है,सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी उस मौक़े को लपक पायंगे जिस तरह मोदी ने 2012 में लपक था।

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