Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

क्योंकि यहाँ एक राजनीतिक पार्टी अपने ही सेनापति की काबिलियत पर शक कर रही है…

Posted by Kundan Roy
November 20, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

राहुल की ताजपोशी और गुजरात के चुनाव की तारीख क्यों है खास 

1.गुजरात में चुनाव की तारीख 9 दिसम्बर और 14 दिसम्बर
2.राहुल गाँधी को कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की तारीख 19 दिसम्बर

लेख में ऊपर लिखे दो वाक्यों के सम्बन्ध पर रौशनी डाली गई है..
राहुल गाँधी बनेंगे कांग्रेस के अध्यक्ष…राहुल गाँधी का होगा राजतिलक…ये बयान पिछले कई सालों से सुनने को मिलता आ रहा है.. लेकिन अब जब इस बार राहुल गाँधी अध्यक्ष बनने के कगार पर हैं तो इसकी तय की गई तारीख भी गौर करने वाली है.आपको बता दें की गुजरात विधानसभा चुनाव होने में महज़ 20 दिन बचे हुए हैं. और इस बार प्रदेश में चुनावी प्रचार अपने चरम पर है. बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक ने इस बार अपनी एड़ी चोटी लगा दी है. बात करें राहुल गाँधी की, तो राहुल जी ने इस बार बाकि चुनावों से ज्यादा रैलियाँ और मेहनत की है. ये बात अलग है की उनकी आधी से ज्यादा मेहनत पर सोशल मीडिया ने पानी फेर दिया , लेकिन मेहनत तो उन्होंने की है इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है.

कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल ने प्रजा के समर्थन के लिए अपने ही सेनापति पर शक क्यों किया ?

अब मुद्दे पर आते हैं जो की है राहुल के राजतिलक की तारीख. इस तारीख में क्या खास है, और इस तारीख का गुजरात चुनाव से क्या संबंध है? गुजरात में विधानसभा चुनाव 9 दिसम्बर और 14 दिसम्बर को होने हैं, परिणाम 18 दिसम्बर को आने हैं. दूसरी ओर राहुल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की तारीख 19 दिसम्बर तय की गई है जो की गुजरात चुनाव और परिणाम के ठीक बाद है.क्या आप इन दो तरह के चुनावों में कोई सम्बन्ध देख पा रहें हैं? इस पर कई सवाल उठते दिखाई पड़ते हैं. अगर गुजरात चुनाव से पहले राहुल गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया जाता तो क्या इसका असर वोटरों पर पड़ सकता था? निष्पक्ष रूप से बोला जाए तो इसका असर सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकता था. लेकिन अगर असर सकारत्मक होता तो कोई पार्टी इस अवसर को क्यों गवाना चाहेगी. ऐसी मौकापरस्त नीति का ही तो नाम राजनीति है. अगर चुनाव से पहले राहुल को कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित करने से कांग्रेस को वोट बैंक और भी मजबूत होते या गुजराती कांग्रेस की ओर और आकर्षित हो जाते तो आपको लगता है की गुजरात में बैठे कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल इस मौके को हाथ से जाने देते. तो सवाल ये उठता है कि इस स्वर्णिम अवसर को कांग्रेस ने हाथ से जाने क्यों दिया?

लेकिन क्या वाकई में ये कांग्रेस के लिए ये स्वर्णिम अवसर था या ये जोखिम भरा अवसर था. जोखिम ये था की इधर कांग्रेस राहुल को पार्टी का अध्यक्ष बनाती और उधर इसका नकारात्मक असर गुजरात पर पड़ता. आइए इन सवालों का जवाब हम एक उदहारण से समझते हैं.आमतौर पर राजनीतिक पार्टीयां चुनाव से पहले अपने उम्मीदवार की घोषणा कर देती हैं, हालाँकि किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जाना और उस पार्टी का किसी राज्य में चुनाव लड़ना, दोनों अलग बातें हैं. लेकिन इस बात का वोटरों के मानसिकता पर असर पड़ता है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है. तो अगर गुजरात चुनाव से पहले राहुल गाँधी की अध्यक्षता की बात करें, और राजनीति में राहुल का जैसा ट्रैक रिकॉर्ड है. इन दोनों बातों को मिलाकर इसका जो असर गुजरातियों पर पड़ सकता था उस मानसिकता से कांग्रेस बचना चाहती थी क्योंकि इस मानसिकता का असर नकारात्मक होता और गुजरातियों को जरुर कांग्रेस के भविष्य के बारे में फिर एक बार सोचने को जरुर मजबूर करता.

इसका सबसे अच्छा उदहारण 2014 लोकसभा चुनाव हो सकता है. बीजेपी ने चुनाव प्रचार शुरू करने से पहले ही अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को घोषित कर दिया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, पार्टी को मोदी की लोकप्रियता और काबिलियत पर शक नहीं था. पार्टी को ये बात बखूबी पता था कि इस व्यक्ति को जितनी जल्दी से जल्दी पार्टी का सेनापति बना दिया जाए, चुनाव के लिहाजे से उतना ही बेहतर रहेगा. क्योंकि ये सेनापति उतनी ही तेजी और कुशलता से युद्ध पर विजय पाकर राजा बनने की छमता रखता था.

युद्ध का ब्रह्मास्त्र : चुनाव से पूर्व उम्मीदवार की घोषणा ( अगर उम्मीदवार लायक हो )

लेकिन कांग्रेस द्वारा राजनीति के इस ब्रह्मास्त्र का बहिस्कार करना पार्टी को एक ऐसे निष्कर्ष पर ले जाता हैं जिसपर कुछ नकारात्मकता के पहलू दिखाई पड़ते है. कहीं ये नकारात्मकता उनके समर्थकों का भरोसा खोने का डर तो नहीं? क्या कांग्रेस को ये लगने लगा है कि बतौर अध्यक्ष राहुल गाँधी का नाम कांग्रेस से जुड़ने से गुजरात में उनके समर्थक में इसका गलत असर पड़ेगा? क्या राहुल गाँधी की काबिलियत पर कांग्रेस इस हद्द तक शक करने लगी है, कि उन्हें लगने लगा है की ये घोषणा गुजरात चुनाव के बाद ही होनी चाहिए ताकि उनका समर्थन करने वाले लोग राहुल को पार्टी का नया अध्यक्ष देखकर मुख्यमंत्री चुनाव में असमंजस ना पड़ जाएँ और ये ना सोचने लगे की जिस संगठन का राजा ही काबिल नो हो उस संगठन के सेनापति यानी मुख्यमंत्री से कोई उम्मीद क्या रखना.

वोटिंग से पहले राहुल को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस अपने वोट बैंक से छेड़छाड़ नहीं करना चाहती, क्योंकि उन्हें पता है की राहुल के नाम से प्रदेश में कई वोटरों की मानसिकता बदलेगी, और ये मानसिकता नकारात्मक ही होगी, शायद ये बात भी कांग्रेस और उनके रणनीतिकारों को पता है. इस पूरे मामले से ये तो निष्कर्ष निकलता है कि कांग्रेस के रणनीतिकार ये बखूबी जानते हैं की गुजरात में राहुल की स्वीकृति का स्तर कितना गिर चुका है.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.