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खेलों से खेल

Posted by Safwan Zaheer
November 14, 2017

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‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब

खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब’

 

बचपन से यही सुनते हुए बड़े हुए हैं। खेलों को अन्यथा ही खलनायक बना रखा है। जब भी बचपन में मैदान की तरफ रुख करते थे तो ये ही बड़ों से सुनने में आता था कि थोड़ा पढ़ाई की तरफ भी ध्यान लगा लो हमेशा खेलने में समय बिताते रहते हो। अब वो ‘हमेशा’ कितनी देर तक होता था उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। आंकड़े बताते हैं कि :

 

  • केवल 0.06% भारत की कुल जन संख्या नियमित तौर पर व्यायाम करती है।
  • हमारे देश में ह्रदय संबधी बिमारियों की औसत आयु 25-30 वर्ष है।
  • केवल भारत का ही हर तीसरा बच्चा मोटापे का शिकार है।

 

यह आंकड़े थे सामाजिक स्तर पर जो इस बात के गवाह हैं कि हम सच में लोगो को खेल के मैदान या ऐसे किसी भी क्रिया में लिप्त होने से रोकने में कामयाब रहे हैं।

 

 

अब बात करते हैं कुछ और मुद्दों की जो हमारे संस्थागत सामाजिक ढांचे में अन्तर्निहित हो चुके हैं :

 

  • ज्ञात आंकड़ो से पता चलता है कि विद्यालय या कॉलेज भी खेल व शारीरिक शिक्षा को गंभीरता से नहीं ले रहे हैँ।
  • विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा का कोई शिक्षक या तो नहीं है और अगर है तो इतना सक्रिय नहीं है।
  • बजट में कमी और साथ ही साथ आधारभूत संरचना का अभाव दिखता है।
  • उत्तरदायित्व व जवाबदेही वाला स्तम्भ अनुपस्थित दिखता है।
  • बच्चों में स्वस्थता का स्तर भयप्रद है।

 

 

यह सोचने वाली बात है कि कार्य या क्रिया को करने में मज़ा आता है वह ही हमारे लिए खतरनाक बन गयी है। हमने पहले इसे द्वितीयक और अब ये हमारी दिनचर्या से गायब ही हो गयी है। हम खुद को रोकते हैं और अपने आस पास वालों को भी इस में पड़ने से रोकने में देर नहीं करते और तुरंत ही गैर-ज़रूरी सिद्ध कर देते हैं। जब भी सड़को पर चलते हुए लोगो को देखो तो आम तौर पर दो ही प्रजाति के लोग दिखते हैं एक तो वो जिनके आने से पहले उनका पेट आ जाता है और दूसरे वो जिनके गुज़र जाने के बाद भी उनका पेट नहीं आता। ये नौबत अचानक से नहीं आयी है वस्तुतः यह धीरे-धीरे इकठ्ठा हुई है।

 

आवश्यकता है कि तुरंत ही सजग हों और द्वितीयक को प्राथमिकता में लाएं और एक नयी परिभाषा को बढ़ावा दें।

‘ खेलते हुए पढ़ोगे तो होंगे कामयाब’

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