गंगाजल

Posted by Ritik Mourya
November 26, 2017

Self-Published

http://मैं खूबसूरत नहीं, मेरी आँखों में अब वो नजाकत नहीँ, नहीँ है वो मुस्कराहट और ना ही मेरा चेहरा अब आकषर्क है। क्योंकि अब मैं अपना चेहरा नहीं ढकती, मैं दिखाना चाहती हूं सबको देखो कोई मेरे ऊपर अपनी मानसिकता अपनी नाकामी उडे़ल गया है, उडे़ल गया है गंगाजल जो समझता है कि उसने नेक काम कर दिया।मगर मैं कहती हूं कि तुम दुनिया के निहायती घटिया और कायर इंसान हो। मैं भी और लड़कियों की तरह PIzza का स्वाद ले सकती हूँ, मैं भी college campus में बैठ करके ठहाके लगा सकती हूँ, मैं भी fair&lovely लगा के 4 हफ्तों में निखार ला सकती हूँ मगर ये सब तो मैं सोच भी नहीँ सकती आखिर क्यूँ? नहीं ना! मैं ये सब अब नहीँ कर सकती।मगर मेरा जबाब है हाँ, मैं कर सकती हूँ। मैं आपकी सोच बदलने के कदम का जरिया बन सकती हूँ मैं नहीँ चाहती कि आप मुझे गले लगाओ बस आप मुझे हीनभावना से ना देखो, बस आप मुझे देखकर हल्का सा मुस्करा दो, दो बातें करो मुझसे, हाथ मिलाओ कभी मेरे जैसे लोगों से जो अब जिंदगी को बोझ की तरह ढो रहे हैं। आपकी सोच शंकुधारी पेडों की तरह है जिस पर पानी नहीं ठहरता, थोड़ा पानी लाइये अपनी सोच में पत्थर दिल खुद पिघलने लगेगा आपको कोई हक नहीं है अपनी मां, बहन, प्रेमिका से गले मिलने का अगर आप थोड़ा मुस्करा नहीं सकते क्योंकि मैं भी किसी की बेटी हूँ जिस पर कभी तेजाब फेंका गया था……. मैं चाहती हूँ कि खूब रोया जाय, किसी से बात न करूं और कहीं गुमनाम होकर खुदखुशी कर लूं मगर ना…… मैं ऐसा नहीं करूंगी। मैं चाहती हूँ कि सब मुझे देखे मेरी खिल्ली उडा़ये, मुझसे दूर भागे, कोई मेरे साथ मेरी बगल वाली सीट पे बस में मेरे पास ना बैठे।कोई फ़र्क नहीं पड़ता, उन्हें एहसास होने दो कि मेरे उपर गंगाजल डाला गया है; हैसियत क्या है देखकर ही पता चलती है। अगर आप इस बारे में गौर से नहीं सोचते तो यकीन मानिये जनाब आपकी सोच में कहीं न कहीं मोच है जो आपको लंगडा़ने पे मजबूर करती है और रही बात अपनी तो हम तो बैसे भी जी रहें उसी गंगाजल के चेहरे के साथ जो मुझे समाज में अपनी या औरत की असल पहचान से रूबरू कराता है आपकी सोच तो महज एक जरिया है जिसे साथ लेकर चलना और बदलना जरूरी है। कीजिए गौर कभी……… धन्यवाद। ऋतिक मौर्य।

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