गली आगे मुड़ती है

Posted by Amitesh Kumar Singh
November 13, 2017

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दोराहे पर खड़ा था
सबसे पूछ रहा था उसका पता
कोई कहता इधर जाओ
कोई कहता उधर जाओ
समझ नहीं आया किधर जाऊं
दुविधा में वहीं अड़ा था
यूँ लगा जैसे, शरीर हो यहीं
पर आत्मा,
किसी अज्ञात में विलीन हो गयी हो
ढूंढ लाऊंगा उसे और पूछूंगा,
कहाँ खो गए थे
किस चिर-निद्रा में सो रहे थे
अब खोजुं उसे
ढूँढना है उसका पता
इन्ही ख्यालों में खोया
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा जड़ा था
तभी,
वह निकली किसी मकान से
गयी किसी दूकान पे
कुछ सामान लिया, और
चल दिया एक तरफ
मैंने बगल से गुजरते आदमी से पूछा
“वह कहाँ जा रही है,
कोई रास्ता है उस तरफ”
उसने कहा,
गली आगे मुड़ती है।

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