चौथी सीट की आत्मकथा

Posted by रोशन सास्तिक
November 11, 2017

Self-Published

कहते है आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन मेरे आविष्कार के मामले में आवश्यकता की बजाय मजबूरी शब्द ज्यादा मज़बूती से अपनी दावेदारी पेश करते नजर आता है। इस दुनिया में मेरा आगमन आदमी की एडजस्ट करने की प्रवृति के चलते हुआ। जब आप अपनी जांघो के फ़ासलों के बीच की दुरी को समेटने का फैसला लेते है। तब मेरे पैदा होने की उम्मीद की किरण अपनी करामात दिखाती हैं।

मेरे जन्म के प्रसव पीड़ा का अंदाजा आप उन तीन लोगो से पूछ कर लगा सकते है। जो खुद सिर्फ दो लोगो के लिए बनाई बेंच पर बैठे होते है और शिष्टाचार के सिपाही की भूमिका निभाते हुए किसी चौथे के आग्रह पर उसे भी उस आसन पर आसीन होने के लिए अपना आशीष देने में आनाकानी नही करते। वैसे इनका यह दरियादिल सिर्फ और सिर्फ केवल और केवल दारा सिंह जैसे डीलडौल वालो के सामने ही दिखाई पड़ता है।

इन सबके बावजूद जिन्दा होकर भी मुझे जिन्दा होने का एहसास नही होता। अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किसी मरीज की भांति हर पल हर घडी मेरी जान सांसत में ही अटकी रहती हैं। जैसे वेंटिलेटर पर पड़े व्यक्ति को किसी भी पल अपनी सांसे छीन जाने का डर बना रहता है।ठीक वैसा ही खतरा मेरे आस्तित्व को लेकर बाकी के तीन सीटों पर बैठे लोगो के सब्र के टूटते बांध को लेकर मंडराता रहता है। इधर इनकी टांगों ने अंगड़ाइयां ली और उधर मैं सीबीएसई के इतिहास की किताब के किसी किनारे पर जा छपा।

मेरा होना कई लोगो के आँखों को अखरता है।सिर्फ उन्हें ही नही जिनके लिए मेरी वजह से अपने जांघो के दरम्यान की दुरी को मज़बूरी में समेटना जरूरी हो गया था। इसके साथ साथ वो खड़े बदनसीब या फिर कहे डरपोक या फिर कहे शर्मीले या फिर कहे दब्बू टाइप के लोग जो चाहकर भी अपने बैठने की चाहत को थोड़ी हिम्मत के साथ हमबिस्तर कर मुझे यानी चौथी सीट को पैदा न कर पाए।

हिंदी की भाषा में कहूँ तो मैं लोगो के बीच बढ़े आपसी प्रेम,स्नेह और समझ की मूर्तरूप हूँ। गणित की भाषा में कहूँ तो टांगो की बीच की दुरी को घटाकर एक अतिरिक्त तशरीफ़ के लिए निर्माण किया गया क्षेत्रफल हूँ। विज्ञान की भाषा में कहूँ तो तीन सीटों वाली प्राकृतिक संरचना के साथ छेड़छाड़ कर अपनी सुविधा के लिए निर्माण की गई एक कृतिम रचना हूँ। समाजिक शास्त्र की भाषा में कहूँ तो मैं बढ़ती हुई जनंसख्या का एक स्वाभाविक साईड प्रोडक्ट हूँ।

रोशन सास्तिक

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