छुआछूत से परे भी है एक गहरा जातिवाद

Posted by Harender Singh Happy
November 12, 2017

Self-Published

“अछूतता” जातिवाद की अंतिम सजा है, सामान्य तौर पर सामाजिक विज्ञान के संस्थानों एवं मीडिया में इस बारे में बहस होती है , यह उतना ही संवेदनशील विषय है जितना डॉ आंबेडकर छोड़ कर गए थे. हर दलित के साथ नहीं परन्तु कुछ स्थान विशेष में यह प्रथा आज भी महान संस्कृति और सभ्यता का अंग है जिसे निचली जाति के लोग स्वीकार करने को बाध्य है. जहा एक मानव को दूसरे मानव के स्पर्श करना मात्र ही घिनोना अपराध है. उनके घर भी गांव के एक अलग हिस्से में होते है व रोटी-बेटी के व्यवहार पर भी पूर्णतया पाबंधी है. परन्तु भारत जैसे विशाल देश में विविधताओं के वितरण में एक दृश्य यह भी सामने आता है की अस्पर्शयता से परे भी एक बहुत बड़ा जातिवाद है जो आर्थिक और सामाजिक उन्नति हेतु एक विशेष समुदाय को उसकी तथाकथित औकात में ही सिमित कर देता है. इस नव-ब्राह्मणवाद में रोटी-बेटी के व्यवहार से लेकर छुआछूत तक की कुप्रथा का तो उच्च वर्ग विरोध करता है परन्तु दलितों आदिवासियों के सामाजिक और राजनैतिक प्रतिनिधित्व पर पीछे हट जाता है. 

समाजशास्त्री MN  श्रीनिवास के “विसंस्कृतिकरण” विचार के अनुसार जब उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगो की प्रथाएं एवं कार्यकलाप अपनाने लग जाते है तब यह स्थिति पनपती है, चूँकि भारतीय संविधान में सामाजिक और शिक्षा के पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है जो कि काफी हद तक दलितों के उथ्थान में सहायक है . देश में 17-18 प्रतिशत दलित वोट होने से राजनैतिक पार्टिया तो इस पर अपनी राय रखने तक से मुकरती रहती है परन्तु ब्राह्मणवादी ताक़तों द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न संगठन सरेआम आरक्षण का विरोध करते है .वे लोग केवल अछूतता को ही जातिवाद का पैरामीटर मानते है एवं अन्य सभी कार्यो में दलितों के पिछड़ेपन को उनकी व्यक्तिगत कमज़ोरी मानते है . सामान्य दैनिक व्यवहार में आज भी दलित पर जन्म का कलंक लगा रहता है व मुख्य समाज का हिस्सा बनने में ब्राह्मणवाद के साथ समझौता करता है . अनेक विचारक इस तर्क पर बहुत जोर लगाते है कि आज़ादी के 70 साल बाद के दलितों की स्थिति उनकी इच्छा के अनुसार है परन्तु अगर धरातल पर जनसँख्या के आंकड़ों गौर किया जाये तो यह साबित होगा की न केवल दलित वर्ग की जनसँख्या बढ़ी है बल्कि उनका शोषण करने वाले ब्रह्मवादियों की संख्या भी बढ़ी है. पहले जहा गांव में दो ब्राह्मण दो दलितों के साथ जाति का भेद करते थे वही आज 15 ब्राह्मण 15 दलितों के साथ दुर्वव्हार करते है. एक दलित छात्र को यह कहकर हतोस्ताहित किया जाता है कि आरक्षण है तेरा चयन तो आरक्षण से हो ही जायेगा या फिर किसी परिणाम के पश्चात् उसकी योग्यता न देखते हुए आरक्षण को चयन का कारण माना जाता है . दलित के मंदिर में पुजारी बनाये जाने की खबर अख़बार में इस क़द्र आती है कि मानो दलितों पर ब्राह्मण ने कितना ही बड़ा एहसान किया हो. राजस्थान में एक तरफ जहा राजपूतो  द्वारा अंधाधुंध जातिवाद खेला जा रहा है वही पंजाब में सिख धर्म में जाट ब्राह्मणो का किरदार निभा रहे है . अब तो यह कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है कि अब तो राष्ट्रपति भी इनका है. अत: दलित को किसी न किसी बहाने उसकी ‘पहचान’ बता ही दी जाती है जिससे वह शर्मिंदा हो जाये. 
 
आज हर आदर्शवादी नेता और आदमी आरक्षण को तो हटाना चाहता है पर जाति को नहीं , आज सासंद में 60 से ज्यादा सासंद दलित है परन्तु एक भी दलितों की आवाज़ नहीं है क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणवाद स्वीकार किया है. यह जातिवाद का छिपा हुआ हिस्सा है जिसे सम्भवता किसी ने नहीं छूआ होगा कि ग्रामीण छेत्रो के दलितों के मध्य यह विचार डाला जाता है तुम्हारे इतने MP है राष्ट्रपति है फिर भी तुम्हारा कुछ नहीं हो सका तो फिर तुम पढ़ लिख क्र तो क्या ही कर लोगे . आज शराब का सेवन हर जाति-वर्ग का आदमी करता है लेकिन जब एक दलित शराब पीकर आता है तो कहा जाता है की इनका तो यही काम है , इस परिदृश्य के चलते दलित राजनीति में सभी दलितों की भागीदारी नहीं दिख रही , एक अन्य पहलु पर गौर किया जाये तो यह सवाल मन में होगा की क्या मायावती ने दलितों के उत्थान में इसलिए कमी रखी ताकि वे उसका वोट बना रहे क्योंकि सामान्य तौर पर आर्थिक सम्पन्नता से परिपूर्ण दलित ब्राह्मणवादी बना दिया जाता है व उसके अंदर भी छोटे-बड़े की भावना डाल दी जाती है . 
Gujrat के Una कांड और रोहित वेमुला की घटना के बाद दलित खास तौर पर छात्र एवं युवा बहुत सक्रिय हुए है इन्ही का परिणाम है की आज वामपंथी और अन्य दल दलित विचारो में दिलचस्पी दिखा रहे है. गुजरात में जिग्नेश मेवानी और भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद इन्ही घटनाओ से उभरे गैर-राजनैतिक पृष्ठभूमि से आते है जो अब तक के संघर्षो में सफल रहे है. हालंकि बुद्धिमत्ता और सक्रियता का साथ आना अभी बाकी है
 
 यह केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि दलित व्यक्ति नेता को चुनते तो सभी लोग है ,यह कहकर कि मै दलित हु , दलित वोट तो आ ही जायेगा अब मुझे अन्य जाति के वोट लेने है , इस विचार से वह दलित प्रतिनिधि ब्राह्मणवाद का शिकार होता है , डॉ आंबेडकर का दलितों हेतु पृथक निर्वाचन इसका पुरजोर विरोध करते हुए ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहता था  जिसमे एक दलित नेता को सिर्फ दलित ही चुने . यह समझना आवश्यक है कि केवल छुआछूत या पानी न मिलना ही जातिवाद नहीं है . जिस प्रकार एक किसान के पास आत्महत्या एक अंतिम विकल्प  है उससे पहले उसके बच्चो की पढाई ,शादी, भोजन, सामजिक न्याय व आगामी फसल नियोजन आदि मुद्दे भी इसी का एक-एक चरण है. इसी तरह एक दलित हर धर्म और हर स्थान पर शोषित किया जा रहा है इसका रूप अलग अलग हो सकता है परन्तु जातिवाद और पितृसत्ता के ज़हर में अभी तक उतना ही प्रभाव है .

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