जिंदगी की बनावट और देश का भूगोल

Posted by Amarjeet Bhargava
November 2, 2017

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साला बचपन एकदम ‘गोवा’ के खूबसूरत बीच (Beach) की तरह होता है । नग्न/अर्धनग्न होने पर भी हर इंसान ‘दिल्ली’ की भांति प्रेम करता है, यहाँ 90% फरमाइशें मात्र आपके राजधानी होने की हैसियत से ही पूरी हो जाती हैं ।

लेकिन “चाँद खूबसूरत नहीं है और दिल्ली के पास दिल नहीं है” इसका एहसास तो इक्कीस बरस की जवानी में होता है । झारखण्ड और ओडिसा होने के बाद हमें एहसास होता है कि, “चेहरे और मासूमियत दो एकदम विपरीत चीज़ें हैं” । हिमालय को चीरकर निकली सरयू और कोसी (नदी) की आपदा हमारे अंदर के उत्तर-प्रदेश और बिहार के विकास की संभावनाओं को ऐसे ख़त्म करती है, जैसे सच में तमिलनाडु में आए किसी चक्रवात ने केरल के मानसून को रोक दिया हो । इसी बीच पंजाब और हरियाणा में होती है हरितक्रांति और हमारे साथ खूनी राजनीती— एक मेनका, विश्वामित्र के उसके ऋषि होने का भ्रम तोड़ देती है । तब, जन्म होता है फ्रायड का और सीमोन दी बोउवा की दी सेकंड सेक्स (The Second Sex ) एक धर्मग्रन्थ की तरह सर्वकालिक स्वीकार्य हो जाती है । फिर अचानक, अनेकों मार्क्स उठाते हैं तलवार और गर्व करते हैं अपने छत्तीसगढ़ होने पर । पश्चिम बंगाल और गुजरात एकदम विपरीत होने के बावजूद प्रतियोगिता करते हैं ।

मैं यह नहीं कहूंगा कि शादी के बाद जिंदगी उत्तराखंड और हिमाचल जैसी खूबसूरत नहीं होती, लेकिन हर खूबसूरत कश्मीर के अंदर होती है विद्रोह की एक कसक । और तब हम आन्ध्रा बनने कि प्रक्रिया में त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल बनकर ऐसे उपेक्षित हो जाते हैं जैसे हारकर हमें खुद ही दबानी पड़ती हो अपने अंदर ही सिक्किम, मेघालय और असम की लज्ज़ा और मासूमियत ।

इन्हीं उलझनों के बीच अचानक एक दौर आता है जब कर्नाटक और मध्य-प्रदेश की धीमी चाल अधिक प्रिय लगती है । तब बुलातीं हैं हमें, महाराष्ट्र में अजंता और एलोरा की गुफाएं और हम कलिंग जीते अशोक की भांति चलते हैं अरब सागर की खोज में । किन्तु, अरे यह क्या !राजस्थान के पश्चिम में तो मात्र रेगिस्तान है……………………..।

कभी इक खता भी करो, यूँ
जैसे वो कोई खता न हो ।
मिलना, बिछड़ना, अपना बनाना
ये तो बस किस्मत है ।
तुम मुझसे जुदा भी होना, तो यूँ
जैसे कोई कभी हुआ न हो ।

© अमर

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