सदियों में पैदा होता है एक रॉकस्टार जॉर्डन जो कह सके साड्डा हक ऐत्थे रख

जॉर्डन, कहने को तो बॉलीवुड की मशहूर फिल्म रॉकस्टार का एक काल्पनिक पात्र है, जिसे इम्तियाज़ अली ने निर्देशित किया था। यह एक ऐसा पात्र है जो काल्पनिक होने के बाद भी सच के बेहद करीब नज़र आता है क्योंकि थोड़ा-थोड़ा वो हम सब में कहीं न कहीं दबा-कुचला उम्र के आखिरी कश तक भीतर ही भीतर कराहता रहता है।

कुछ किताबें और कुछ फिल्में ऐसी होती हैं कि उनका नशा दिल और दिमाग से उतरता ही नहीं है, बस बढ़ता ही जाता है। रॉकस्टार कुछ ऐसी ही फिल्म है जिसमें जनार्दन जाखड़ उर्फ जॉर्डन का किरदार निभाया था, रणबीर कपूर ने। मेरा मानना है कि रणबीर कपूर इस चरित्र के लिए ताउम्र जाने जायेंगे, चाहे वो एक हजार करोड़ की कमाई वाली फिल्म ही क्यों न कर लें। इस साल फिल्म को छः बरस हो गए हैं लेकिन फिल्म की लोकप्रियता और खुमार अब भी उतना ही है, बल्कि मैं तो कहूंगा की अब तो यह और ज़्यादा बढ़ रहा है, क्योंकि जॉर्डन सदियों-दशकों में एक-आध ही पैदा होते हैं।

इस तरह के किरदार एक ऐसी छवि बनाते हैं जिसमें हमारे व्यक्तित्व के अंदरूनी हिस्से का बहुत कुछ मेल खाता है, मगर हम सामाजिक ओरांग-उटांग के मकड़जाल में ऐसे जकड़े होते हैं कि ज़िंदगी में कभी जॉर्डन बनने की हिमाकत ही नहीं कर पाते हैं।

वो कहते है न “फिर पछताये होत क्या? जब चिड़िया चुग गई खेत” कुछ ऐसा ही नतीजा हमारे हिस्से के वक्त की दीवार पर लिखा मिलता है, क्योंकि असल ज़िंदगी में हम कुछ और ही बने घूमते है, जबकि बनना तो हम जॉर्डन ही चाहते हैं। फरेबी ज़िंदगी से मुक्त हो जाना ही असल में जॉर्डन हो जाना होता है और ये बनने के लिए आदमी जी-तोड़ प्रयास करता है लेकिन बन कुछ और ही जाता है।

इस फिल्म का ये किरदार भी बस ज़िंदगी की इसी सच्चाई को हमारे सामने रखता है कि हम जो हैं वो हम दिखते नहीं हैं और जो दिखते हैं असल में वो हैं नहीं। जॉर्डन, एक ऐसी छवि है जिसका ऊपरी तौर पर बन जाना या कहलाना तो आसान है पर असल में जॉर्डन होना उतना आसान नहीं, क्योंकि जॉर्डन हो जाना अपने आप से और सब चीजों से एक अलहदा तरीके से मुक्त हो जाना होता है।

अब आप सोचते होंगे कि होने को तो सब आसान है और सब चीजें मुश्किल हैं। लेकिन मैं कहूंगा मुश्किल और आसानी से भी ऊपर कुछ होता है जिसे हमारी भाषा में असंभव होना कहा जाता है, बस उसी को हासिल करना ही हमें जॉर्डन बना सकता है। घर-परिवार, समाज, धर्म, रिश्ते, ज़िम्मेदारियां और तरह-तरह की बातें जो हमारे चारों तरफ घट रही हैं, उन सब में ना होते हुए भी शरीक होना जॉर्डन होना होता है।

जो लोग इस पात्र को महज़ एक प्रेम कहानी का पात्र मानकर देखते हैं, उनसे मैं यही कहूंगा कि जॉर्डन असल में प्राकृत है। वो किसी परिभाषा में बांधा जा सके यह संभव नहीं है।

उसमें प्रेम पात्र बनने, विध्वंस का हौसला बनने, हक़ का नुमाइंदा बनने, बेलौस अल्हड़ता का पात्र बनने के सब गुण और अवगुण मौजूद रहते हैं। इसलिए जॉर्डन बनना तो कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन जॉर्डन हो जाना अपने आप में एक असंभव कारनामे को कर दिखाने जैसा है।

Youth Ki Awaaz के बेहतरीन लेख हर हफ्ते ईमेल के ज़रिए पाने के लिए रजिस्टर करें

Similar Posts

Youth Ki Awaaz के बेहतरीन लेख पाइये अपने इनबॉक्स में

फेसबुक मैसेंजर पर Awaaz बॉट को सब्सक्राइब करें और पाएं वो कहानियां जो लिखी हैं आप ही जैसे लोगों ने।

मैसेंजर पर भेजें

Sign up for the Youth Ki Awaaz Prime Ministerial Brief below