ठगी (कविता)

Posted by BIPINKR009
November 12, 2017

Self-Published

 

*ठगी*

ठगी बहुत बढ़िया धंधा है ,
खुद को समस्या से बाहर निकालने का,
बस थोड़े बड़े बोल बोल बोलने होते हैं,
सच-झूठ के खट्टे-मीठे जहर घोलने होते हैं….

 

वक्त पर सच सामने आ जाता है,
सहयोग और मदद करने वाला कठोर सजा पा जाता है,
बहुत दर्द होता है ठगे जाने पर,
कसक उस समय और भी बढ़ जाता है,
ठगने वाला जब हो अपना कोई…,

वक्त का मरहम हर दवा का ईलाज है….
पश्चाताप की बीमारी लेकिन लाईलाज है …
यह एहसास ही बहुत पीड़ादायक है…
इस दर्द को झेलना आसान नहीं,
अक्सर लोग इसे भूल जाते हैं,
शायद यही इसका समाधान है,
अन्यथा डिप्रेशन, मानसिक असंतुलन, आत्महत्या कई व्यवधान हैं ….
हर कुछ आपके मनमुताबिक नहीं हो सकता …
ये कोई जन्नत नहीं,
ये दुनियाँ जहाँन है …

 

फिर भी एक बात है …
ठगी उतनी बड़ी समस्या नहीं,
जितना कि इसका एहसास है,
आप ठगी की समस्या से उबर सकते हो …
लेकिन अगर कोई हर पल आपको इसका एहसास दिलाये …
भूली बातों को भी याद दिलाये …
समस्या ये बहुत बड़ी होती है …
इसके कारण कई जिंदगी खत्म होती है ……! ! ! !

✍🏻✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.