ढोंगी ‘ईश्वर’ के पाखंडी भक्त हैं ‘हम’

Posted by KKumar Abhishek
November 20, 2017

Self-Published

आज भले ही कुछ लड़कियों के सपने में सलमान खान या विराट कोहली आते हो, हकीकत यही है कि सुबह मंदिर कि चौखट पर माथा टेकने वाली हर लड़की के सपनों में आज भी राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु जैसे देवता आते है । इन भगवानों के जैसा वर पाने कि ही कामना रखती है क्योंकि काल्पनिक कहानियों में उन्हे सर्वगुण सम्पन्न और सर्वाधिक खूबसूरत बताया गया है । वास्तव में हमारी महिलाओं को कहानियों में वर्णित ईश्वर से अथाह प्रेम है । एक बार ईश्वर कह दें, तो ये अपना सर्वस्व अर्पण कर दें । हमारी माताओं-बहनों कि ईश्वर के प्रति इसी आस्था और प्रेम का फायदा राम रहीम और आशाराम जैसे ढोंगी उठाते है । खुद को संत, महात्मा, महाज्ञानी, महाबलशाली बता कर….न सिर्फ स्व-घोषित ईश्वर बन जाते है, अपितु नाट्य मंडली का पोषाक धारण कर खुद को कभी राम, कभी कृष्ण तो कभी शिव भी बना लेते है । साथ ही चिकनी-चुपडी बातों कि ऐसी माया फैलाते हैं, जिससे सामने बैठी भीड़ को उस ढोंगी में ईश्वर नज़र आना लगते है । ईश्वर को पाने के लिये मंदिरों कि चौखट चाटने वाली हमारी मातायें-बहनों को लगता है, जैसे साक्षात प्रभु श्री राम, कृष्ण कन्हैया के ही दर्शन हो गये । उनके मन का सोया ख्याब जग उठता है । वो चाहती हैं,  काश एक बार सामने खड़े प्रभु मेरे माथे पर आशिष दे दें ।…लेकिन दूसरी तरफ़ धर्म के बिसात पर ईश्वर कि माया फैलाये वह राक्षस , भीड़ में खूबसूरत स्त्रियों कि नजरो से तलाशी ले रहा होता है । जब उसके आदमी खूबसूरत स्त्रियों को ‘ढोंगी प्रभु’ के विशेष दर्शन और प्रसाद दिलाने का लालच देते है …ईश्वर को पा लेने कि चाहत में भाव-विभोर हो वह सहर्ष ‘हाँ’ कर देती है । उसके मन मस्तिष्क में यह बात बैठ चुकी होती है कि, मंदिरों में विराजमान ईश्वर ने ही मुझे बुलावा भेजा है । वह खुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने को तैयार करने लगती है । उसे लगता है कि ईश्वर एक बार मेरे प्रेम को स्वीकार कर लें, उसका जीवन ही धन्य हो जायेगा । होता वही है ….वह ईश्वर का चोला पहने दरिंदे के सामने बिछ जाती है । एक तरफ़ भोग का आनंद होता है, तो एक तरफ़ भक्ति का आनंद होता हैं । एक तरफ छल-कपट की माया होती हैं तो एक तरफ सर्वस्व अर्पण को तैयार नारी काया होती हैं ।

क्यों ईश्वर प्रेम में लुटती हैं नारी ?

ईश्वर के प्रति इस अथाह प्रेमवश लूटी जा रही स्त्री के हालात को समझना ज्यादा मुश्किल भी नही है, क्योंकि हमने वह दृश्य भी देखा है, जब रामलीला के मंचन के दौरान जैसे ही मंच से प्रभु दर्शन कि घोषणा होती है, लोगों का हुजूम टूट पड़ता है उस राम के दर्शन के लिये जो सिर्फ राम का अभिनय अर्थात नाटक कर रहा होता है । उस भीड़ में भी महिलाओं और लड़कियों कि संख्या अधिक होता है । अपना पेट पालने के लिये मजबूरी में श्री राम का नाटक कर रहे कलाकार के लिये युवतियों का जो प्रेम उमड़ता है, उसका पैर छूकर आशीर्वाद लेने कि जो कामना जगती है ….यह वही कामना है जिसका फायदा आशाराम और राम रहीम जैसे ढोंगी उठाते है । मुझे तो इस बात का भी यकीं है कि, अगर नाटक मंडली के श्री कृष्ण भी गोपियों के चक्कर में पड़ जाये तो, उस भीड़ में से 10-20 गोपियों को निकालना ज्यादा मुश्किल नही होगा । यह स्थिति निश्चय ही हमारी बेहद विचलित मानसिक अवस्था का परिचायक है । अंधभक्ति का इससे बेहतर नमूना नही हो सकता है । हमें सोचना होगा, यह कैसी आस्था है, यह कैसा प्रेम है , जिसमे हम अपने ईश्वर को नही पहचानते है ? एक व्यक्ति चमकदार वस्त्र धारण कर खुद को ईश्वर कि अवतार कहता है और हम बिना सोचे-समझे उसे ईश्वर मान भी लेते हैं । वास्तविकता यह है कि, हम अपने ईश्वर को न तो जानते है और न ही पहचानते हैं  । ईश्वर के नाम पर हमारे पास हैं, सिर्फ कुछ कल्पनायें …जो धार्मिक कथा कहानियों में बुनी गयी है । अलावे इसके कथा-कथित ईश्वर कि कोई पहचान नहीं हैं । कहीं चार ईंट-पत्थर जोड़ कर ईश्वर बना दिया जाता है तो, कहीँ  सिनेमा कलाकार कि तस्वीरें ईश्वर बन अगरबती सूँघने लगती है । कहीँ नाटक का कलाकार ईश्वर बन…10-20 रुपये में आशीर्वाद बेचने लगता है तो कहीं राम रहीम और आसाराम जैसे ढोंगी …कृष्ण -कन्हैया बन गोपियों संंग रास रचाने लगते है ।

वास्तव में  ‘ईश्वर’ कि पहचान को लेकर हमारे अंदर जो अंतर्द्वंद है, जो कल्पनाओ कि धुंध है, उसकी प्रमुख वजह भी हमारा धर्म ही है । आज हमारे जीवन में ‘धर्म’ जिस प्रारूप, जिस अवस्था में मौजूद है, यह कहना बिल्कुल ही अतिशयोक्ति नही होगी कि, ‘धर्म हमारे मस्तिष्क में ठोके गये एक किल (खूँटा) के माफिक है, जिसने हमारे सोचने,समझने, सवाल पूछने एवं तर्क करने कि क्षमता को अपने में बाँध लेने का काम किया है । इंसान का  विचारशील होना तभी सम्भव है, जब उसका मस्तिष्क स्वतंत्र विचरण कि अवस्था में हो । जबकि हमारे धर्म में संदेह करने, सवाल पूछने और प्रमाण माँगने कि गुंजाइश ही नही है । यहाँ  सिर्फ हर बात को आँख मूंदकर मान लेने और हाथ जोड़कर स्वीकार कर लेने कि ही गुंजाइश प्राप्त है । सवाल उठाने को ईशनिंदा माना जाता है । यही कारण है कि धर्म कि बुनियाद पर जब भी कोई ढोंगी ईश्वर बनने का स्वांग रचता है, हम उस पर सवाल नही उठाते है, उससे प्रमाण नही माँगते है । हद तो ये कि …राम-रहीम जैसे ढोंगी सिनेमा के परदे पर स्टंट करते हैं, उसमे भी हमें ईश्वरीय चमत्कार ही दिखता है ।

पुराना हैं, धर्म की आड़ में लूटने का ‘कारोबार’

वास्तव में हम भारतीय सदियों से आस्था और विश्वास के नाम पर लूटते आये है । ‘धर्म’ कि काल्पनिक एवं भ्रामक कहानियों में उलझा हमारे मस्तिष्क को गुलाम बनाने का लगातार प्रयास किया गया है, जो आज भी बदस्तूर जारी है । हमारी महिलायें जो अपनी अशिक्षा के आवेश में प्रारम्भ से ही पुरुषों कि अपेक्षा कुछ ज्यादा ही धार्मिक रही है, उन्हें लगातर ठगने, नीचा दिखाने और समाज कि मुख्य धारा से वंचित करने के सभी प्रयास भी ‘धर्म’ और धार्मिक परम्पराओं कि आड़ में ही हुये है । जिसे कल कि अशिक्षित नारी न समझ पायी थी और न ही आज कि ‘महिला सशक्तिकरण’ का नारा लगाने वाली नारी समझ पायी है । आज आसाराम और राम रहीम जैसे बाबाओं के घिनौनी करतूतों का पर्दाफाश होना, यह साबित करने को पर्याप्त है कि …धर्म और धर्म कि आड़ में सिर्फ और सिर्फ महिलाओ को लूटने, उनकी आस्था और विश्वास का नाजायज फायदा उठाकर  …उनका शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शोषण करने का प्रयास किया गया है । शिक्षा के अभाव में अंधश्रद्धा में लीन महिलाओ और लड़कियों का फायदा उठाकर उनका शारीरिक दोहन किया गया है । सवाल पूछने का मन होता हैं इस देश के धार्मिक ठेकेदारों से, आखिर हमारे धर्म में ऐसी घिनौनी कृत्यों के लिये जगह कैसे बन रही है ? क्यों हमारा धर्म ढोंगी बाबाओं के लिये अपने काले कारनामों को छिपाने का साधन बन गया है? क्या हमारा ‘धर्म’ ‘अधर्म’ का ही प्रारूप बन गया हैं ?
सबसे अहम् तो यह कि बाबाओं के प्रसाद कि यह फैक्ट्री सिर्फ रामरहीम और आसाराम तक सिमित नहीं हैं, अपितु इस फैक्ट्री में हर वह ढोंगी हैं जो खुद को ईश्वर कि अवतार या ईश्वर का दूत कहता हैं, जिसके दरवाजे पर मजलसे लगते हैं । जो लोगों को कभी भूत-प्रेत, गृह- नक्षत्र, पाप-पुण्य का डर दिखा लुटता हैं, जो फूलों, हिरे-जवाहरात जड़े आसान पर बैठ लोगों को सबकुछ त्याग करने कि बात करता हैं, जो महलों में विराजमान हो आपको घर-द्वार छोड़ने कि बात करता हैं ।जब धर्म कि माया कम पड़ने लगती हैं तो ,…ये खुद को फिल्मस्टार, खिलाडी, गायक और डांसर भी बना लेता हैं…जिससे नई-नई लड़कियों और औरतों को भी अपनी मायाजाल में फंसाया जाय।

क्यों नहीं सुनाई दे रही ‘पीड़ितों’ की ‘पीड़ा’?

सही  हैं कि आज हम इन घटनाओं पर काफी मुखर हैं, लेकिन ऐसी चर्चाये सिर्फ और सिर्फ आरोपी बाबाओं को कोसने, उसे बुरा-भला कहने मात्र में सीमित है ।अर्थात कहीं न कहीं हम आज भी धर्म और धर्म कि आड़ में फैले काले साम्राज्य कि हकीकत से कोसों दुर है ।आज यह स्पष्ट हो चुका है कि संत का चोला पहने इन धार्मिक भेडियों ने लाखों महिलाओं कि इज्जत लूटी है, उनकी आस्था और विश्वास का नाजायज फायदा उठा शारीरिक शोषण करने का काम किया है । लेकिन सवाल अहम है, यह कैसे हुआ ? कैसे पढी-लिखी महिलायें भी इन बाबाओं के चंगुल में फँस गयी ? और सबसे बड़ी बात जब बिस्तर पर हर रोज़ किसी न किसी लड़की को विशेष आशीर्वाद के नाम पर लूटा गया, सिर्फ एक या दो ही क्यों विरोध कर सकीं ? क्या बाकियों में हिम्मत नही थी, या उन्हे भी इसका आनँद आने लगा ?  इन चुभते प्रश्नों से हम मुंह नहीं छुपा सकते
हैं, क्योंकि धर्म और धर्म में कल्पित ईश्वर के प्रति अपनी विकृत मानसिकता के लिए हम भी कम दोषी नहीं हैं ।

जब तक हम यूँ ही ईश्वर को लेकर ….अंधीभक्ति में लीन रहेंगे, जब तक हमारी माताएं-बहने पागलों कि तरह ईश्वर को ढूंढती रहेंगी…उन्हें ऐसे ही ढोंगी, पाखंडी, बहरूपिए ईश्वर मिलते रहेंगे । इसी प्रकार भक्ति कि आड़ में भोग का आनंद ईश्वर का ढोंग करने वाले भेड़ियें उठाते रहेंगे । फिर कभी- कभार जब नेताओं और बाबाओं के गठजोड़ में थोड़ी घर्षण पैदा होगी, यूँ ही ‘बाबाओं के प्रसाद के इक्के-दुक्के किस्से’ हवाओं में लहराते रहेंगे । हम और आप जबरदस्त गालियों कि गर्दिश उड़ाते रहेंगे ।

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