तलाश

Posted by Nikhil Gandhi
November 25, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

दूर दूर तक पानी पानी और पानी पर चलता हुआ में , पता नहीं में कहाँ  आ गया था. ऐसा लगता था शायद आज तक वहां कोई ना आया हो. पर तभी अचानक किसी ने मेरे सर पर जोर से हाथ मारा और भाग गया, मेने उसका पीछा किया तो मेरे पैर पानी में धंसने लगे धीरे धीरे पानी गले तक पहुँच गया, तो किसी के हसने की आवाज सुने दी और पानी ने मुझे पूरा डुबो दिया, मेरा दम घुटने लगा मेरी सांस बंद होने लगी और दिल भी शायद साथ छोड़ने ही वाला था पर तभी मेरी आँख खुल गयी.

आज फिर एक डरावना सपना देखा था, पिछले तीन साल से मेरे सपनो में कोई मेरी जान के पीछे पड़ा था पर हर सपने में में उसका चेहरा देखने से चूक जाता था. कौन था वोह चेहरा  क्या रिश्ता था उसका और मेरा जो हर शाम ढलने के बाद वोह मुझे मिलने मेरे सपनो में आ ही जाता था. फिर भी जब वोह मुझे सपनो में भी छूता था तो उसका स्पर्श जाना पहचाना लगता था. दुबारा सोने की कोशिश की पर सो नहीं पाया. बहार जलती हुई स्ट्रीट लाइट की रोशनी खिड़की के सहारे कमरे के दूर उस छोड़ तक जा रही थी, जहाँ घड़ी टंगी थी. घड़ी की टिक टिक भी किसी को डराने के लिए काफी होती है यह आज पता चला. खैर रात भर तोह सो नहीं पाया पर तडके सुबह आँख लग गयी.

ठक ठक…….. दरवाजा खोलो……

कोई सुबह सुबह दरवाजा खटखटाए तो कितना बुरा लगता है. पर दरवाजे के पीछे की आवाज कुछ सुनी हुई सी लगी.खोला तो पता चला ये तो नितिन था, आज कितने दिनों बाद उसे देखा था , जी करा दौड़ कर उसे गले से लगा लूँ , पर कुछ सोच कर मेरे पाँव ठिठक गये.

“क्यूँ आये हो यहाँ ’’ मेने कहा

“ बात तो सुन यार ’’

“कुछ सुनने को अब भी बाकी है क्या ,चले जाओ यहाँ से’’

मेने फटाक से दरवाजा बंद कर दिया उसकी नाक पर लगा था शायद, मुझे मालूम था वो मुझसे बिना मिले यहाँ से जाने वाला तो नहीं था. मेरी और उसके बीच यह जो फासला बन गया था, यह ऐसे मिटने वाला नहीं था. नितिन की तो शायद कोई गलती भी नहीं थी पर उसने बिना गलती किये ही ना जाने कितनी बार मुझसे माफ़ी मांगी थी. में उससे अपना दर्द बांटना छठा था पर पता नहीं क्यों अपने उस दर्द का नितिन को ही जिम्मेदार समझने लगा.

ट्रिन ट्रिन फ़ोन की घंटी न जाने कितनी देर से बज कर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रही थी. ऋषभ का फ़ोन था. बोला ,“नितिन आया तेरे पास क्या’’

‘‘हाँ क्यूँ’’

‘‘उससे मिल लियो यार प्लीज उसे अनु के बारे में कुछ पता है.’’

“क्या!! अनुराधा के बारे में’’

में चौक गया पता नहीं क्या था अनु यानि अनुराधा के नाम में उसका नाम सुनकर पता नहीं क्यूँ कुछ हो सा जाता था इस बार भी ऐसा ही हुआ, में उसका नाम सुनकर सुधबुध खो बैंठा, मोबाइल तो न जाने कितनी देर पहले ही जमीन पर गिर चुका था. अनुराधा मेरे कॉलेज की शायद सबसे हसीं चेहरा थी. उस चेहरे के हज़ार आशिकों में से में भी एक था. अनुराधा आज मेरे साथ ही होती, मगर वोह नहीं है इसका गुनहगार में नितिन को ही मानता हूँ और शायद इसीलिए आज इतने सालों के बाद जब नितिन मिला भी तो में उससे मिल न पाया.

जब मेने कॉलेज ज्वाइन किया तब मेरा कॉलेज में पहला दोस्त नितिन था, और दूसरी अनु. कॉलेज रजिस्ट्रेशन के फॉर्म में कितनी गलतियाँ की थी मेने, तब नितिन ही था जिसने मेरा फॉर्म सही करवाया. मेरी तरह बो भी छोटे सेहर से आया था हिंदी मीडियम से ही था पर मुझसे कुछ ज्यादा ही अकलमंद. तभी न मेरी क्लास की लगभग सारी लड़कियां उस पर मरती थी बीएस अनु को छोड़कर वो तो मेरे लिए ही बनी थी और वोह किसी और पर मर भी कैसे सकती थी उसे में समय ही कब देता था किसी और के बारे में सोचने का. उससे मेरी पहली मुलाक़ात भी कुछ कम मजेदार नही थी. हुआ यूँ भईया की फिजिक्स वाली मैडम जी ने दिया था assigment और हम तो कोई काम समय पर करते नही the. हमने पड़ोस वाली सीट से उठा कर अपना नाम लिखकर मैडम को सबमिट करा दिया.

“अनुराधा…………..” मैडम जी जोर से चिल्लाई

“कहाँ है तुम्हारा assigment”

“… मेम अभी तो यहीं था पता नहीं कहीं खो गया”

“खो गया की तुमने बनाया ही नहीं”

“नहीं…. मेम बनाया था मेने”

“चलो चुपचाप खड़ी रहो अपनी डेस्क पर”

लो भईया हो गयी गंगा जमुना शुरू. लड़की का रोना और खासकर खुबसूरत लड़की का रोना हमे कतई पसंद न था और फिर लड़की को इम्प्रेस भी तो करना था तो हम होए गए  अपनी सीट पर खड़े.

“मैडम यह सही कह रही है इसका assigment हमने ही चुराया था” अनु और मैडम दोनों ने मुझे ऐसे देखा जैसे में एक mudrer हूँ और वोह एक जज . लो भईया होए गया मौत का फरमान जारी

“गेट आउट फ्रॉम my क्लास, how dare you to do this”

होए गयी पनोती.

“यार आज तो मतलब बेइज्जती ही हो गयी क्लास में” मेने क्लास के बाद हॉस्टल जाते हुए नितिन को कहा.

“वो तो होए गी ही, हम मना किये the मत कर ऐसा, और हाँ उस लड़की को सॉरी जरुर बोल दियो” नितिन सीधा अपने हॉस्टल की तरफ निकल लिया और हम गर्ल्स होटल की तरफ.

अभी हॉस्टल गेट पर पहुंचे ही थे की वो दूर कॉलेज गेट की ओर से आती हुई दिखी. ओई साला क्या दिख रही थी. गज़ब इस नज़र से तो हमने क्लास में भी नहीं देखा था, अब तो मतलब बस पसंद सी आ गयी थी, वोह.

“excuse me….. अरे सुनिए तो”

“क्या……? अब क्या चाहिए तुम्हें…, क्लास में तो डांट पड़ा दी मेरी अब क्या वार्डन से भी  पड़वाओगे.”

“नहीं हम तो तुम से सॉरी बोलने के लिए आये थे, हमें नहीं पता था वोह तुम्हारी notebook है, देखो मेम के सामने भी अपनी मिस्टेक accept की थी ना”

“अच्छा चलो जाओ माफ़ किया”

इतनी जल्दी माफ़ी दिमाग में कुछ खटकी, हमने तो सुना था खुबसूरत लड़कियां जल्दी किसी को माफ़ी नहीं देती. छोड़ो इन बातों को हमे क्या करना.

कॉलेज के दिनों की पुरानी बातों का फ्लैशबैक धीरे धीरे दिमाग में घूमता चला गया. में यूँ ही न जाने कितनी देर तक पुरानी बातें सोचता रहता अगर अकरम ने दरवाजे के पीछे से आवाज न लगायी होती.

“अबे तू यहाँ बस बेठे ही रहियो कभी कुछ काम भी कर लिया कर” अकरम ने मुझे जैसे किसी गहरी सी नींद से जगा दिया.

“सरकारी नौकरी कोई काम करने के लिए थोड़ी करता है”

मेने जवाब दिया.

“चल यार वहां कोई ठेकेदार पेड़ कटवा रहा है”

“तू ही देख ले यार और हाँ यहाँ के लोग थोड़ी मोती चमड़ी के हैं, अपने साथ पुलिस को भी ले जइयो”

अकरम मेरा सहकर्मी था,उत्तराँचल के इन खुबसूरत जंगलो में एक शायद वोह ही मेरा दोस्त था. यह वन विभाग की नौकरी भी ना अलग ही होती है. कभी कुछ काम नहीं कभी ढेर सारा काम.

घड़ी की तरफ देखा तो अभी बस 11 ही बजे थे. खिड़की से झाँका तो दूर चाय के खोंचे की टूटी हुई बेंच पर नितिन बेठा हुआ दिखा. उसकी नज़र मेरे ही दरवाजे की तरफ थी. में अपनी गाडी लेकर उस दुकान तक पहुंचा, पुराने गिलेशिकवे भूलकर मेने नितिन से  में बैंठने को कहा.

“ऋषभ का फ़ोन आया था” मेने बेरुखी से कहा.

“निखिल….मुझे मालूम है तुमने मुझे उस गलती के लिए कभी माफ़ किया पर वो मेरी गलती नहीं थी,” नितिन के बोलने में ऐसा लगा जैसे उसका गला सालों से सूखा हो.

“बोलो क्या बात करने आये हो,”

“अनुराधा जिन्दा है, किसी ने उससे बरेली में देखा था…”

यह सुनकर मेरे तो पेरों तले से ज़मीन खिसक गयी, मेने अचानक ब्रेक लिए और गाडी एक सुनसान से पहाड़ी मोड़ पर रोक दी. कुछ देर तक तो में कुछ बोल ही नहीं पाया, एक दम खामोश कार के स्टारिंग को जोर से अपनी उँगलियों में भींचे हुए बस यूँ ही खायी की और देखता रहा, और बोला ,“तुम जानते हो न अगर तुम गलत हुए तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा” नितिन  ने सहमति में सर हिलाते हुए हाँ कहा.

में फ़ौरन गाड़ी को मोड़कर सरकारी गेस्ट हाउस जहाँ में रहता था ले गया. आज नितिन ने मुझे वो खबर दी जिसे में कभी सुनना नहीं चाहता था. अपने रूम पर पहुँचते ही मेने एक कॉल की,“ दो टिकेट बरेली के बुक करना प्लीज”.

मेने फ़ोन रखा ही था की नितिन बोला ,“ दो नहीं तीन टिकेट करवा”

“तीसरा कौन”

“मनीष”

“क्यूँ वो क्यूँ जायेगा मेरे संग”

“क्यूंकि यह सब उसी की गलती से हुआ है”

“क्या”

में चौक गया और पता नहीं कहाँ से मेरी आँखों से आसूं बहने लगे में नितिन के गले लग गया.

मनीष से मेरी मुलाकात सेकंड इयर में हुई थी| वो अनु का एक्स था| तो उसकी मुझसे बनती नहीं थी| हमेशा बस वोह मुझे फसाने की सोचता रहता था| और आज जब अनुराधा मेरे पास नहीं थी तो इसका कारण भी मनीष ही था|

“मनीष के गलती लेकिन कैसे,“ मैं नितिन से जबाब चाहता था

“जब तू उसे हॉस्टल छोड़ के गया था तब मनीष ही ने वार्डन को बताया था,“ नितिन ने दोहराया|

उस रात हम मूवी देखने गए थे, और उसी रात के बाद से अनु का कुछ पता नहीं चला| वाद में पता चला था की अनु को उस रात वार्डन ने बहुत दांटा था उसी के वाद वो पता नहीं किसी रहस्मयी ढंग से गायब हो गयी थी|

अभी हमारी मुलाक़ात को बस एक महिना ही हुआ होगा शायद| और बिना इजहार किये हुए ही हमारी प्रेम कहानी का अंत हो गया था,इस छोटी सी बात का दोषी में नितिन को मान रहा था बस मेरे लिए मूवी प्लान करने के कारण|

एक उम्मीद की किरण जो आज मुझे नितिन ने दिखाई थी उसी किरण के पीछे में बरेली को चल दिया नितिन के साथ मनीष को साथ ले जाना मेने अभी भी मुनासिब नहीं समझा|

कुछ सवाल थे जो शायद अनु को छोड़ कर शायद ही कोई बता सके| मेरी जिंदिगी जो पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही रेंग के चल रही थी अब उसके रफ़्तार पकड़ने की उम्मीद दिख रही थी| अनु के साथ कुछ तो हुआ था जो उसको पड़ी छोड़ देने पर मंजूर कर दे और यहाँ तक की उसके द्वारा कॉलेज में दिया गया पता भी गलत निकले| कुछ तो था जो उस रात गलत हुआ था, जिसकी खबर मुझको नहीं थी| सुबह सुबह जब हम बरेली स्टेशन पर पहुंचे तो पहला सवाल यही था इतने बड़े शहर में उसे ढूंढे कैसे| यह तलाश कैसे पूरी हो, यह सफ़र लम्बा होने वाला था, उन सवालों से झुझना था मुझको अपे पहले प्यर को ढूंढना था मुजको

कैसी अजब थी मेरी तलाश

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