तूँ अब उसके पीर में रह

Posted by Vivek Kumar Shukla
November 16, 2017

Self-Published

चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर
वो कभी अब तो आयेगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर में रह।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

वो जो बन के घटा लहरायी थी,
जो बैशाख की गर्मी में,
सावन की शीतलता लायी थी,
वो जुल्फें अब लहराएगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर में रह।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

वो नजरें जो नजरों में बन के नजारा छायीं थी,
उठते ही जो सुबह कर के,
झुक कर के शाम करायी थी,
वो कभी अब तो आयेगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर में रह।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

वो लव जो लव से लग के लव की प्यास बुझायी थी,
भीगे मौसम का क्या कहना,
रूखे मौसम में भी अमृत बुंद पिलायी थी,
वो कभी अब तो आयेगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर में रह।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

वो चेहरा जो तेरे चेहरे का रंगत बदलकर रख दी थी,
जिस चेहरे के आगे चांदनी  फिकी-फिकी लगती थी,
वो जिसके आने से मौसम हरा-हरा होता था,
और जिसके जाने से पल भी भरा-भरा होता था।
वो कभी अब तो आयेगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर में रह।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर,
वो कभी अब तो आयेगी नहीं,
और याद कभी उसकी जाएगी नहीं।
तूँ अब उसके पीर में रह, तूँ अब उसके पीर।
चल रे मन मेरे धीर तूँ धर, धीर तूँ धर।।

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