सुना है कुछ गरीब भी धुंए से परेशान हैं, कमबख्त मास्क भी नहीं खरीद पाते

Posted by Bagesh Kumar in Environment, Hindi
November 13, 2017

दिल्ली में छाई धुंध और प्रदूषण की चादर ने सरकार से आम नागरिक तक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कैसे इसे कम किया जाए। बहरहाल, यह इतना आसान काम नहीं है। इसके लिए लोगों को अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना पड़ेगा, जो एक दिन में संभव नहीं है। पूरी दिल्ली इस समस्या से परेशान है, तमाम सुख सुविधाओं से लैस लोग हवा साफ करने की मशीनें खरीद रहे हैं, यानि ‘एयर-प्यूरिफायर’ सरकार भी भीड-भाड़ वाली जगहों पर और भी मशीने लगा सकती है। वैसे कनॉट प्लेस इलाके में आप कुछ देख भी सकते हैं जो पहले से ही मौजूद है। लेकिन क्या मशीन खरीदने भर से आप इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं?

आज जब लोग अपने नाक-मुंह ढक कर चल रहे हैं ऐसे में ध्यान इस शहर से किसी दूसरी जगह चला जाता है। दिल्ली से ही सटे हुए और एनसीआर के हिस्से नॉएडा में कभी जाकर देखिए, सुबह मज़दूरों की भीड़ दिखाई देगी बिना किसी मास्क के। आपको शायद उनके चेहरे ढके हुए मिल जाएं पर जहां वो काम करते हैं वहां वो चेहरा ढक कर काम नहीं कर सकते।

जिस धुंध और धुंए से हमारी जान को खतरा है, उसी में लाखों लोग रोज़ अपनी जान को जोखिम में डाल कर अपने दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करते हैं।

उनकी हालत ऐसी है कि वो मास्क नहीं खरीद सकते और ना ही उन्हें उनके फैक्ट्री मालिकों द्वारा वो दिया जाता है। वैसे भी, अगर गौर से देखा जाए तो शायद आप महसूस करेंगे कि शायद ही किसी मज़दूर को किसी भी प्रकार का सुरक्षा कवच दिया जाता है। उदाहरण के लिए, सफाई कर्मचारी जो ‘मौत’ के गटर में बिना किसी सुरक्षा के उतरते हैं; बिजली विभाग के कर्मचारी जो नंगी तारों से फैक्ट्री के बॉयलर तक में जान गंवाते हैं, रेलवे के मज़दूर जो डीज़ल इंजन के धुंए से असमय जान गवांते है, इसके अलावा खदानों में काम करने वाले, रेत-बालू उठाने वाले दिहारी मज़दूर। संगठित क्षेत्र में भले ही महिलाओं की संख्या कम हो, मगर असंगठित क्षेत्र में महिलाएं और बच्चों का एक बड़ा हिस्सा इससे अपनी जिंदगी को दाव पर लगा के ज़िंदा हैं। और शायद, वो यह दाव वक्त से हार जाते हैं।

इन सब उदाहरण से मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि आप शायद भाग्यशाली हैं जो सरकार आपके बारे में सोच रही है, आप इस रूप से भी मज़बूत हैं कि मास्क खरीद कर पहन रहे हैं। शायद, एक एयर-प्यूरिफायर भी कुछ दिनों में आपके घर का हिस्सा बन सकता है। लेकिन इस समस्या से तबतक पूरी तरह से छुटकारा नहीं पाया सकता जबतक उनलोगों के बारे में ना सोचा जाए जो इन सब सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसा इसीलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यह न तो उन मज़दूरों की गलती है न ही उन किसानो की गलती है जो सदियों से अपने खेत में सूखी पुआली जला रहे हैं।

ये सरकार और सरकार जिनकी चिंता सबसे अधिक करती है उनकी कमी है कि वो इस प्रदूषण का एक सीधा हल चाहते हैं। बिना इस बात की चिंता किये हुए कि एक तबका ऐसा भी है जो इसी समस्या से सालों से जूझ रहा है, जिनकी तरफ न सरकार की नज़र जा रही है न ही सिविल सोसाइटी की। उन्हीं लोगों के बीच से एक आवाज़ हूं मैं जिसने यह महसूस किया है। इस समस्या को जिया है और दिल्ली में जब इस वक्त लोगों की बेचैनी और उनके मुद्दों को देखता हूं तो लगता है कि शायद बहुत सारी ऐसी बातें होंगी जो इस शहर के लोगों को परेशान करती होगी लेकिन वो भी इस प्रकृति की मार के बिना नहीं दिखाई देती है।

आज जब तमाम लोग प्रकृति और पर्यावरण के लिए चिंतित है और हर तरह की बात इस मंच पर उठाई जा रही है ऐसे में ऐसा लगा कि हाशिये पर ज़िन्दगी बीता रहे लोगों का भी मुद्दा इस मंच पर आना चाहिए।

इस समय यह ज़रूरी हो जाता है कि हम सबके बारे में सोचे क्योंकि अगर आप सोचेंगे तो सरकार भी सोचेगी, अगर आप आवाज़ उठाएंगे तो सरकार सुनेगी। बस इसी उम्मीद के साथ सोचता हूं कि यह मुद्दा भी किसी दिन राजनीतिक बहस का हिस्सा बनेगा, लेकिन इसमें ज़्यादा देरी भी उतना ही घातक सिद्ध होगी।

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