नोटबंदी और एक आम आदमी की कहानी

Posted by Mahmood Khan
November 10, 2017

Self-Published

एक आम आदमी जो एक छोटे शहर में किसी प्राईवेट कम्पनी में काम करता है और वह शाम को जब मै आफिस से लौट कर घर आया तो पत्नी ने कहा कि फ्रेश हो जाइये मैं चार लाती हूॅं । थोड़ी ही देर में मै फ्रेश होकर चाय का कप हाथ में लिये हुआ टीवी खोला कुछ देर इंटरटेंन्मेंट चैनल देखने के बाद करीब 8ः30 बजे मैने सोचा कि चलो थोड़ा न्यूज देखते है ।  माननीय प्रधानमंत्री जी का ’देश के नाम संदेश’ आधा निकल चुका था इसलिए शुरू मे मेरे कुछ समझ मे नही आया लेकिन कुछ देर सुनने के बाद मैं समझ गया कि 500 और 1000 की नोट बन्द हो रही है तो मैने घर के सदस्यो को इसके बारे में बताया और पूछा कि कितने रूपये है, बरहाल करीब 10000-12000 हजार के 500-1000 का नोट मेरे घर में भी था इसलिए टंेशन होने लगी । फिर मैने घर में पूछा कि इसके अलावा खर्च के लिये कितने रूपये है, क्योकि दूसरे दिन बैंक बन्द था तो पता चला कि करीब 300-400 रूपये ही 50-100 के नोट है तो मै जल्दी से बाहर निकला और सोचा कि जल्दी से 500 और 1000 वाली नोटों से कुछ सामान लेले अभी तो बहुत लोगों को मालूम भी नही होगां, लेकिन ये क्या बाहर जैसे कोई मेला लगा हो जिसको देखो इधर-उधर भागता हुआ नजर आ रहा है, कुछ लोग झुण्ड बनाकर नोटबन्दी के ही मैटर पर आपस में बात कर रहे है, मैने सोचा कि इन लोगो से बात करने से कोई फायदा नही, मै किसी दुकान मे जाता हू और फिर मुझे निराशा का ही सामना करना पड़ा क्योकि तबतक हर जगह नोटबन्दी की खबर पानी की तरह पहुच चुकी थी और सभी दुकानदारों ने मेरे पुराने 500-1000 के नोट लेने से मना कर दिया तभी मैने 1 चाउमीन वाले को देखा तो मैने सोचा कि यहा कोशिश करू तो तभी मुझे लगा कि ये गरीब इंसान है उसको बता देना चाहिये और मैने बता दिया कि 500-1000 की नोटबंदी हो गई है फिर भी उसने ले लिया और मैने उससे 2 पैकेट चाउमीन ले लिया । चलो 4 नोट 100 की मिली तो थोड़ा सुकून मिला कि अगर कंजूसी से रहेगें तो 3-4 दिन तक ये पैसा चल जाएगा । दूसरे दिन बैंक बन्द था तो रोज की तरह आफिस गया और दिन भर आफिस में भी नोटबन्दी की ही चर्चा रही । अब बारी अगले दिन की थी तो रात को ही मैने सोच लिया कि सुबह जल्दी उठकर बैंक पहुच कर अपने पुराने नोट बदल लूगां । लेकिन फिर भी उठते- उठते 6 बज गये और जल्दी-2 फे्रश होकर बैंक की ओर भागा । यहां पर पहुचां तो आश्र्चयचकित रह गया, वहां तो पहले से ही लम्बी-2 लाईन लग गई थी, हालांकि बैंक खुलने का समय 10 बजे था । कुछ देर तो लाईन में लगा परन्तु 10 बजे तक लगने लगा कि मेरी पारी आते-2 शाम हो जायेगी और मुझको आफिस भी जाना था फिर मैने सोचा कि कल आऊगां हो सकता हो कि कलतक लाईन भी कुछ कम हो जाये, मैने आफिस चला गया । तीसरे दिन तो मैने आफिस में बोल दिया था कि आज बैंक जाऊगां वहां से होकर आफिस फिर जाऊगां । सुबह 7 बजे ही कमर कस कर लाइन में लग गया । फिर 10 बजा और बैंक खुलते ही लोग एक दूसरे को धक्का देने लगें तभी बैंक वाले ने कहा कि जिनको नोट बदलना है उसकी अलग लाईन और जिनको पैसा जमा करना है उसकी अलग लाईन लगेगी तो मुझे राहत मिली क्योकि मुझे पैसा जमा करना था और मेरी लाईन भी अब कुछ छोटी हो गई और 1-2 घंटे मे मैने पैसा जमा भी कर दिया और सुकून की सांस लिया फिर अपनी आफिस की ओर चल दिया । बाद में एटीएम से पैसा निकलने लगा और पैसा भी निकाल लिया । आज 1 साल बाद भी नोटबन्दी की वो खट्टी-मीठी यादें दिमाग मे ताजा है ।

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