पद्मावती की भावना

Posted by Syed Faizan Ali
November 13, 2017

Self-Published

आजकल लोगों की भावनाएं बहुत जल्दी आहत हो जाती हैं। शायद पहले के लोग हमसे ज़्यादा सहिष्णु थे। मिसाल के तौर पर ताज़ा घटनाक्रम ही देख लीजिये।
एक फिल्म है-पद्मावती। 1 दिसम्बर को सनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली है।पता नहीं होगी या नहीं क्योंकि इसने भावनाएं आहत कर दी हैं। राजपूतों के मुताबिक़ ये उनके गौरवमय इतिहास से छेड़छाड़ है। उनका कहना है कि रानी पद्मावती ने अपनी 16000 दासियों के साथ जौहर कर लिया था,माने आग में जल कर आत्महत्या कर ली थीं।
हालांकि इतिहासकार इरफ़ान हबीब की माने तो रानी पद्मावती का असलियत से कोई वास्ता ही नहीं। ये तो मालिक मुहम्मद जायसी साहब थे जिन्होंने सन 1540 ईस्वी में ‘पद्मावत’ की रचना की थी। रानी पद्मावती उनकी एक परिकल्पना भर थीं बस। करनी सेना,जिनका दावा है कि वो राजपूतों के संगठन हैं,उनको इस कहानी पर ज़रा भी विश्वास नहीं। ये दीगर बात है कि इंडिया टुडे की स्टिंग में करनी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगमेड़ी कहते हैं कि वो पैसे लेकर फिल्मों को प्रोटेक्शन दे सकते हैं।
सच्चाई जो कुछ भी हो लेकिन किसी की आत्महत्या से आप गौरवान्वित कैसे महसूस कर सकते हैं? बहादुर महारानी ने अपने आपको कितना बेबस महसूस किया होगा जब उन्होंने अपने दासियों के साथ जौहर किया होगा। क्या उनको अपने राजपूत सिपाहियों पर ज़रा भी भरोसा नहीं था? उस वक़्त खुद से उठते भरोसे के बावुजूद उन राजपूतों की भावनाएं आहत नहीं हुईं। तब भी नहीं जब एक मुसलमान ‘आक्रमणकारी’ अकबर ने ‘खाड़ी देशों’ से पैसे लेकर भारत की पवित्र भूमि में लव जिहाद किया था।
हाँ,पहले के लोग हमसे ज़्यादा सहिष्णु थे।

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