पद्मावती विवाद की बहती गंगा में सबको अपने हाथ धोने हैं

Posted by SHUBHAM SANKRITYA in Art, Culture-Vulture, Hindi, Media, Society
November 17, 2017

पिछले कई दिनों से संजय लीला भंसाली की आगामी फिल्म पद्मावती को लेकर ज़ोर शोर से प्रदर्शन हो रहे हैं। कुछ समुदाय और उनसे जुड़े अनेको संगठन इस फिल्म पर बैन लगाने की मांग को लेकर मुखर हैं। हालांकि फिल्म को लेकर सभी तथ्यों से हम सब वाकिफ हैं इसलिए मैं यहां इसके दूसरे पहलू को कुरेदने की कोशिश करूंगा।

गौर करने वाली बात ये है कि इस फिल्म का विरोध शुरू हुआ था एक तथाकथित सीन को लेकर जिसके बारे में कहा गया कि इस सीन में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी को लेकर एक रोमान्टिक ड्रीम सीक्वेंस फिल्माया जा रहा है। इससे राजपूत समाज के लोगों को आपत्ति थी कि ये तथ्यों के साथ खिलवाड़ है, एक बहादुर रानी और एक बर्बर आक्रमणकारी के बीच काल्पनिक अन्तरंग पलों को दिखाकर हमारी प्रतिष्ठा धूमिल की जा रही है। इस विरोध का परिणाम ये हुआ कि जयपुर में भंसाली के साथ मारपीट की गई।

बाद में विरोध को लेकर विमर्श को कैसे बदला गया ये काफी रोचक है। इसे हिन्दू धर्म के मान-सम्मान से जोड़ दिया गया जिसके बाद कई शहरों में कई संगठन इस फिल्म के खिलाफ मोर्चा थामे निकल पड़े हैं। इसी बदले नैरेटिव का एक दृश्य तब दिखा जब फिल्म का घूमर वाला गाना रिलीज़ हुआ। लोगों ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एक राजपूत महारानी को लोगों के सामने नाचते हुए कैसे दिखाया जा सकता है, इसे महिलाओं का अपमान बताया गया।

ये बड़ा ही रोचक है क्योंकि जबतक राजपूत महिला घूंघट लिए रहे तभी तक उसका सम्मान बना हुआ है और अगर उसको नाचते हुए दिखाया गया तो उसकी मर्यादा भंग हो जायेगी।

ये बड़ा ही अजीब है जो घूमर नाच राजपूत संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है उसी पर नाचने से लोग बुरा मान रहे हैं, फिल्म में शामिल घूमर के स्टेप्स/उसके लिए इस्तेमाल गाने पर तो लोगों की आलोचना समझ में आती है लेकिन उस दृश्य को ही अपमानजनक बताना ये समझ से परे है। इसी क्रम में कुछ विरोधी लोग पद्मावती की मौजूदगी पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं, उनका तर्क है कि पद्मावती मलिक मुहम्मद जायसी के काव्यग्रंथ पद्मावत की एक काल्पनिक किरदार मात्र है जो अपनी अद्वितीय सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी और इसका वास्तविक इतिहास से कोई सम्बन्ध नहीं है,इस दावे में कितनी सच्चाई है इसकी पुष्टि होनी तो अभी बाकी है लेकिन इतना ज़रूर है कि इसको लेकर दोनों पक्षों के इतिहासकारों के दरम्यान तलवारें ज़रूर खिच गई हैं।

लेकिन मूल सवाल ये उठता है कि बिना फिल्म देखे ही लोग सिर्फ कही-सुनी बातों पर इसके विरोध पर क्यों उतारू हैं।अगर फिल्म देखकर इसके विरोध में तर्क दिए जाते तो बात और होती।अभी तो लोग सिर्फ भावनाओं के आधार पर हिंसक हुए जा रहे हैं, और अगर फिल्म रिलीज़ होने पर इनके दावे गलत साबित हुए तो ये कहां मुंह छिपाएंगे?

कहीं इस विरोध का कोई राजनितिक निहितार्थ तो नहीं? यह एक ऐसा सवाल है जो हम जैसे कई लोगों के मन में कौंध रहा है? क्या कमज़ोर माने जाने वाले फिल्म समुदाय को टारगेट कर कहीं इसके पीछे कुछ संगठन की राजनीति चमकाने का इरादा तो नहीं? फिल्मी समुदाय को कमज़ोर इसलिए कह रहा हूं क्यूंकि वो लोग विसुद्ध व्यापारी हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना है, इसलिए आमतौर पर वो इस तरह के विवादों से बचने की कोशिश करते हैं, और पब्लिसिटी की खातिर अगर किसी विवाद को हवा देते भी हैं तो तबतक ही जहां तक उनका फायदा हो रहा हो।

राजनितिक गंध इसलिए आ रही है क्योंकि इसमें हासिये पर पड़े राजपूत संगठनों को अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने का मौका दिख रहा है।इस तर्क को पुष्टि इससे भी मिल रही है कि गुजरात चुनाव में इससे फायदा होने की उम्मीद देख बीजेपी और काँग्रेस भी इसमें कूद पड़े हैं। कई शहरों में नई-नई राजपूत/हिन्दू सेना बनाकर मोर्चा निकाला जा रहा है क्यूंकि इसमें उनको मौका मिलता दिख रहा है कि अगर कुछ न भी हुआ तो संगठन के नाम पर वो कुछ चंदा तो जुटा ही लेंगे। नहीं तो आप खुद देखिये हर आए दिन नैरेटिव बदला जा रहा है, आपको खबर भी नहीं होगी कि इन संगठनों और फिल्म वालों के बीच अंदरखाने की डील हो गई और आप सड़क पर झंडा लेकर घूमते ही रह गए।

मैं ये इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मेरा मानना है कि हम भारतीय आमतौर पर काफी भावुक होते हैं जाति/संप्रदाय के सम्मान के नाम पर कुछ लोग हमारी भावनाओं का दोहन कर उसका राजनितिक इस्तेमाल कर लेते हैं और हम-आप ठगा सा मुंह लेकर बस पछताते रहते हैं।

इसीलिए पहले फिल्म सेंसर बोर्ड को देखने दीजिये उनपर विश्वास रखिये और तब भी आपको कुछ आपत्तिजनक लगे तब अपनी सोच-समझ या भावना के आधार पर लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध दर्ज कीजिये। नहीं तो हर बार आपका राजनितिक इस्तेमाल होता रहेगा और आप हांके गए भेड़ों की तरह उधार के ज़ुबान से मिमियाते रहेंगे।

उम्मीद है हम और आप अपनी बौद्धिकता का परिचय देंगे इस बार।

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