‘पद्मावती’ विवाद: आखिर इन लोगों को दिक्कत क्या है !

Posted by Nishant Kumar
November 13, 2017

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ऐसा प्रतीत होता है कि संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म ‘पद्मावती’ और विवादों का साथ इतनी जल्दी छूटनेवाला नहीं है। हरियाणा सरकार के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज भी इस विवाद में कूद पड़े हैं। ख़बरों के मुताबिक उन्होंने कहा है कि वे सेंसर बोर्ड से इस फिल्म के पुरे देश में प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग करेंगे। उन्होंने फिल्म के निर्माता व निर्देशक भंसाली पर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है। उन्होंने यह भी कहा कि इस फिल्म में पद्मावती की छवि को गलत तरीके से पेश किया गया है और इससे लाखों लोगों की भावनाएं आहत होंगी। और देखने वाली बात यह है कि ऐसा कहने वाले और ऐसी मांग करने वाले वो अकेले नहीं हैं। आए दिन किसी ना किसी नेता अथवा अन्य महानुभावों के ऐसे बयान हमें सुनने को मिल रहे हैं।

 

इन खबरों व बयानों को सुनते – पढ़ते मैं आजकल यही सोच रहा था कि जब अभी फिल्म प्रदर्शित भी नहीं हुई है, इन लोगों को आखिर ये पता कैसे चल रहा है कि फिल्म में क्या दिखाया गया है ! फिर अचानक से मेरा ध्यान इस विवाद की शुरुआत पर गयी जब राजस्थान में फिल्म की शूटिंग के दौरान राजपूतों के संगठन श्री करणी सेना ने फिल्म यूनिट पर हमला कर दिया था। उनका कहना था कि पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रणय संबन्धों के दृश्य फिल्माकर भंसाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और राजपूतों की गरिमा को आहत कर रहे हैं। अगर ऐसे दृश्य फिल्माए जा रहे थे तो सम्भावना थी कि फिल्म में भी ये दृश्य होंगे। उस समय लोगों का गुस्सा होना फिर भी कुछ हद तक मेरी समझ में आता है (गुस्सा होना ना कि भंसाली से मारपीट करना ) लेकिन बाद में जब भंसाली ने स्पष्ट शब्दों में फिल्म में ऐसे किसी भी दृश्य के होने से इंकार किया है तब लोगों के विरोध का कारण मेरी समझ से परे है।

 

बॉलीवुड सिनेमा पिछले कई दशकों से भारतीय जनमानस के लिए मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम रही है। और मेरा मानना है कि इन्हे इसी भूमिका तक सीमित रखा जाये तो बेहतर है। फिल्मों के वस्तुविषय को लेकर हमारा यूँ जज्बाती हो जाना हमारी नासमझी का परिचायक है, और कुछ नहीं। कई बार तथ्यों को दर्शाने के लिए फ़िल्मकार थोड़ी अतिरिक्त स्वतंत्रता ले लेते हैं और यह हमें स्वीकार्य होनी चाहिए। जहाँ तक पद्मावती के इतिहास का सवाल है तो हममें से कोई भी यह सटीक नहीं बता पायेगा कि वाकई में क्या हुआ था। और कहने की जरुरत नहीं कि ऐसे ही मौकों पे एक फ़िल्मकार की कल्पनाशीलता अपना काम करती है। मेरे ख्याल से तो हमें संजय लीला भंसाली का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाने की सोची। इन्होने पहले भी भारतीय सिनेप्रेमियों को ‘देवदास’ व ‘बाजिराव मस्तानी’ सरीखी फ़िल्में दी हैं और मुझे उम्मीद है कि वे इस बार भी दर्शकों को निराश नहीं करेंगे।

 

और रही बात उनकी जिन्हे इस फिल्म से ऐतराज है तो उनके लिए विरोध का सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम यही होगा कि वे इस फिल्म को देखने सिनेमाघरों में ना जाएँ। अपने विरोध को खुद तक ही सीमित रखें और कुछ ऐसा ना करें जिससे की बाकी लोग भी यह फिल्म देखने से वंचित हो जाएँ (जैसे पिछली बार बाजीराव मस्तानी के रिलीज़ के समय किया था )। वैसे भी ऐसी कोई भी फिल्म बनाना असंभव ही है जो सभी को पसंद आये। तो भइया, सीधा सा तरीका ये है कि जिन्हे फिल्म देखनी हो वो देखने जाएँ और जिन्हें ना देखनी हो वो ना जाएँ। वैसे जो यह फिल्म देखने के इच्छुक हैं उन्हें मैं ये बताते चलूँ कि फिल्म आगामी एक दिसंबर को रिलीज़ होने वाली है।

 

और हाँ, अनिल जी हरियाणा राज्य के स्वास्थ्य सम्बंधित मसलों पे अपना ध्यान केंद्रित करें तो शायद यह ज्यादा हितकर होगा – उनके लिए भी और वहां की जनता के लिए भी (हमारे लिए भी )।

 

 

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