पद्मावती विवाद के जनक- कल्पना के

Posted by Amritanshu Yadav
November 21, 2017

Self-Published

‘पद्मावती’ के नाम पर ये जो कर्णी सेना’ और स्वघोषित राष्ट्रवादियों के रगों में उबल रहा है. ये खून नही है, मवाद है. ऐसा मवाद जो साहित्य में कल्पना को मारना चाहता है. साहित्य के केंद्रीय एवं मूल भाव को मारना चाहते हैं अतएव साहित्य को ही धराशायी करना चाहते हैं.

पद्मावती की कहानी का जो रूप हमको पता है, साहित्य के लोगों को पता है, संजय लीला भंसाली को पता है. वो महज कल्पना के सिवा कुछ नही है. मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ईसा के इर्दगिर्द कल्पनाओं के लब्बोलुआब को चढ़ाते हुये 13वीं सदी की प्रेम और वियोग की एक बहुप्रसंशित कृति ‘पद्मावत’ की रचना की थी. ‘पद्मावत’ को पढ़ने वाले लोग जानते हैं कि इस कृति का सबसे रोचक अध्याय राजा रतन सिंह और उनकी पहली पत्नी नागमती के वियोग और पद्मनी के आने में मिलता है नाकि ख़िलजी के युद्ध से. जायसी ने प्रेम में लीन होकर जिस प्रकार सामाजिक सौहार्द की कृतियों का निर्माण किया है वो स्वयं में एक दर्शन है.  ‘पद्मावत’ के इतर भी उन्होंने कल्पनाओं के आधार पर ‘चित्ररेखा’ का निर्माण किया जो ये बताने को पर्याप्त है कि जायसी कल्पनाओं पर आधारित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली रचनाएं करने के उस्ताद थे. एक इस्लामिक सूफी होने के बावजूद जायसी ने सदैव उदारवादी हिन्दू भावनाओं का ख्याल रखा है. उन्होंने क़ुरान को केवल क़ुरान नही कहा है. उसको पुराण कहकर भी संबोधित किया है. उन्होंने स्वर्ग या बिहिश्त के लिये सदैव ‘सर्वत्र कैलाश’ का इस्तेमाल किया है. पद्मावत के आरंभ में ही उन्होंने लिखा है कि ये सुनी सुनाई कथाओं में नया रस लगा कर प्रस्तुत की जा रही है. पद्मावत का एक आरंभिक श्लोक है –
“कवि वियास कंवला रसपूरी।
दूरि सो निया नियर सो दूरी।।
नियरे दूर फूल जस कांटा।
दूरि सो नियारे जस गुरु चांटा।।
भंवर आई बन खण्ड सन लई कंवल के बास।
दादूर बास न पावई भलहि जो आछै पास।।”
जिसका अर्थ है कि संसार मे बहुत कवि हुये हैं जिन्होंने रस से परिपूर्ण कविताये लिखी है. इस कविता को भी रसपूर्ण समझा जाना चाहिये. आज जिस प्रकार पद्मावत को प्रस्तुत किया जा रहा है उसे देख कर जायसी सिर पीट लेते.

इतिहास में कल्पना के संयोग से न जाने कितनी महान रचनाओं का निर्माण किया गया है. प्रेमचंद के आरंभिक साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं को रस के साथ प्रस्तुत करने को प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. हिंदू कायस्थ होने के बावजूद ‘प्रेमचंद’ ने ‘कर्बला’ जैसे महान नाटक को रचा जो इस्लाम के आरंभकाल में ही कर्बला युद्ध पर आधारित था. आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने कुल 30 वर्षों की मेहनत से ‘वैशाली की नगरवधू’ की रचना की. आम्रपाली की कहानी लिखने में उन्होंने कल्पनाओं के नये क्षितिज को भेदा है किंतु बड़े ही अफ़सोस से कहना पड़ रहा है कि साहित्य में कल्पना करना रोक दिया गया है. नंगी हक़ीक़त भी लिख देने पर ‘बैन’ हो जाने का खतरा होने लगा है जैसे कि हांसदा सौवेंद्र शेखर की कृति ‘आदिवासी नही नाचेंगे’ के साथ हुआ.

सबसे ज्यादा दुःख की बात ये है कि हमारे राजनेताओं का एक धड़ा ध्रुवीकरण के नाम पर कुछ भी बोलता जा रहा है. ध्रुवीकरण के नाम पर ‘पद्मावती’ की अस्मिता को फ़िल्म में देखने वाले लोगों को उस वक़्त हिन्दू महिला अस्मिता की बात समझ नही आई जब 1994 में आई शेखर कपूर की फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में दस्यु सुंदरी फूलन देवी कि शक़्ल में ‘सीमा बिस्वास’ नंगी कुएं में पानी भरने जाती है. अजीब बात है कि नंगी सच्चाई पर उफ़्फ़ न करने वाले आज कल्पनाओं के आधार पर आग लगाने, नाक काटने-कटाने की बात करते फिर रहे हैं.

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