पीपल यू मे नो

Posted by Sandeep Dulhera
November 13, 2017

Self-Published

“पीपल यू मे नो”

रोजाना नए नए और कभी कभी पुराने चेहरों को सामने प्रकट करता फेसबुक का ये हिस्सा भी अपने आप में गजब है। क्योंकि इनमें से अधिकतर अनजान लोग ही होते हैं जिनको हम वास्तविक जीवन में शायद ही जानते हों, हो सकता है हमारी वर्चुअल दुनिया में वो कहीं ना कहीं हमसे बेशक जुड़े हों।
परन्तु जब उनके पास फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजो तो या तो भेज ही नही पाते या फिर अंग्रेजी में कुछ पंक्तियां लिखी आती है जिनका हिंदी रूपांतरण लगभग ये होता है कि हम आपको सुझाव देते हैं कि उन्ही लोगों को मित्रता के लिए अनुरोध भेजें जिनको आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। अगर ये सुझाव मानने लगे तो सबकी लिस्ट में केवल 70 80 लोग ही जुड़े मिलते 4 से 5 हजार नहीं।

खैर आज शाम को नित्य की दिनचर्या के कामों से निपट कर जब अर्पित ने अपना फ़ेसबुक खोला तो सामने थी ‘पीपल यू मे क्नोव’ की लिस्ट जिसमें से दो चार तो अरुचिकर तरह के लोग थे और 5 वें या छठे नम्बर पर थी एक सुंदर सी नवयुवती; वैसे समझ नही आता हम किसी की एक छायाचित्र मात्र से कैसे अंदाजा लगा लेते हैं कि सामने वाला रुचिकर है या अरुचिकर, खैर छोड़िये सबकी यहीं सोच होती है इस मामले में तो क्यों पीएचडी करनी। फोटो के नीचे नाम था ‘एन्की एंजेल’ , लड़की खूबसूरत थी तो अर्पित ने भी ऐड फ्रेंड के लिंक को टच कर दिया।फिर वहीं सुझाव लिखा आया जिसको हम सब ही अनदेखा करते हैं सो अर्पित कौनसा उस पर विचार करने वाला था, कन्फर्म का लिंक खुद ब खुद अंगूठे के नीचे आ टपका। फिर अपने न्यूज़ फीड में आये अनेकाएक मित्रों व उनके मित्रों या फिर अनजान लोगों के जोकि बिना सिर पैर का सम्बन्ध होते या ना होते हुए भी टैग कर देते हैं ,उन सबके चित्रों व लेखों को पढ़ते या निहारते हुए नीचे ऊपर टच करता रहा। 10 मिनट बाद नोटिफिकेशन बार पर लाल रंग में 1 लिखा दिखा तो खोला, अरे वाह ये तो ‘एन्की एंजेल’ का मित्रता स्वीकार करने का सुचना सन्देश था। 
जब कोई लड़की लड़के की मित्रता स्वीकार क मालूम नहीं उनके दिमाग में क्या आता है परंतु जब लड़की लड़के की मित्रता स्वीकार करती है तो बड़ी सकारात्मकता आती है लड़के के अंतर्मन में, शायद सभी जानते भी हैं इस बात को, सो अर्पित ने भी हाय लिखकर भेज दिया।
उधर से भी जवाब में हेल्लो आ गया।
अर्पित ने फिर अपना इंट्रोडक्शन भेजा, मैं अर्पित, मैं करनाल से हूँ ,और अभी यहाँ चंडीगढ़ में बैंक पीओ की जॉब लगी है, आप क्या करती हैं।
उधर से कोई जवाब नहीं आया। 
अर्पित ने फिर से सन्देश भेजा, आर यू देयर?
परन्तु तब तक वो ऑफलाइन जा चुकी थी। अर्पित भी कुछेक दोस्तों के चित्रों को लाइक कमेंट करके ऑफलाइन करके सो गया।
सुबह उठकर वहीँ बैंक जाना और बाकि सब काम आमतौर की तरह हुए, आज कुछ खाश घटित नही हुआ दिनभर। शाम को अर्चना दीदी का कॉल आ गया, जोकि पंचकूला में ही रहती थी। उन्होंने निमंत्रण भेजा था, बताया कि तेरे जीजाजी का प्रमोशन हुआ है सो आज शाम को छोटी सी पार्टी रखी है। अर्चना अर्पित की बुआ की लड़की थी औऱ उनके पति असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर राजीव रस्तोगी, जो अब सब इंस्पेक्टर बन गए थे वहीँ चंडीगढ़ पुलिस में थे और पंचकूला में ही सरकारी आवास में रहते थे। शाम को बैंक से निकलके मार्किट से एक गिफ्ट खरीदके अर्पित सीधा ही अर्चना के यहाँ पहुँच गया। अर्चना दीदी के दो बच्चे हैं सुभित और सुरभि, दोनों अर्पित के बड़े लाडले, उनके लिए अलग से चॉकलेट लेली। पार्टी में केवल 10 15 लोगों को ही बुलाया गया था। ड्रिंक और डिन्नर पार्टी थी। अर्पित ने भी जीजाजी की ख़ुशी में 3 पेग ब्लैक डॉग के लगा लिए। सबने खूब मस्ती की, डांस किया। 4 5 फोटोज अर्पित ने भी खींच लिए अपने गैलेक्सी s6 से, DSLR जितने अच्छे तो नही पर ठीक ठाक फोटोज आ जाते थे इस फोन से भी। 
वापस अपने अपार्टमेंट जाने के लिए उबेर से टैक्सी मंगवा ली और विदाई ली सब से। रास्ते में बैठे बैठे 2 फोटो अर्पित ने फेसबुक पर भी डाल दिए। अर्चना दीदी, अल्पना दीदी, अलीना, राजीव, आकाश , रीमा ,नीरू ,यशपाल और भी 4 5 दोस्तों को टैग भी कर दिया साथ में । घर जाकर फ्रेश होकर बिस्तर पर पहुंचा तो फिर से फेसबुक खोला। कई लोगों के लाइक और कमेंट आये थे। कुछ करीबी दोस्त टाँग खींच रहे थे तो कुछ तारीफ के पुल बांध रहे थे। उन सब कमेंट्स के बीच एक फूलों का इमोटिकॉन भी किसी ने भेजा था। किसी और का नही ‘एन्की एंजेल’ का ही कमेंट था। प्रोफाइल खोलके जाँच की तो देखा मोहतरमा ने केवल 4 फोटोज और कुछ पोस्ट्स डाली थी, फोटोज तो वास्तविक थे और पोस्ट्स वहीँ कट कॉपी पेस्ट वाली थी। एक बारगी तो सोचा कोई फेक आईडी होगी फिर ना जाने क्यों हाय का मेसज भेज दिया । 10 मिनट बाद रिप्लाई आया, अभी मैं बीजी हूँ 12 बजे के बाद चैट करते हैं। 
वैसे भी 11:20pm तो घड़ी दिखा ही रही थी, थोड़ी उत्सुकता हुई तो फेसबुक पर लगा रहा लाइक कमेंट्स की जदोजहद में । 12 बजकर 2 मिनट पर मेसज आया, आर यू स्टिल वेटिंग,
जवाब दिया, यस, आपने बोला था ना कि 12 बजे के बाद बात करते हैं। 
उधर से जवाब में एक स्माइलिंग फेस का आइकॉन ही आया। 
थोड़ी देर बात हुई तो पता चला मोहतरमा नैनीताल के किसी अर्धसरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं और नैनीताल में अपनी माँ और छोटी बहन के साथ रहती हैं। पुष्टि के लिए तस्वीरें माँगी तो इस शर्त पर की देखकर डिलीट कर देना, मैडम ने 5- 7 फोटो नैनीताल और विद्यालय के परिदृश्य के साथ भेज भी दिए। मालूम हुआ की मोहतरमा की उम्र 28 साल है, अर्पित से 2 साल भर ही ज्यादा थी बस। 
अर्पित भी स्कुल से लेकर कॉलेज तक थोड़ा शर्मीले स्वभाव का ही रहा था, लड़कियां दोस्त रह चुकी थी उसकी पर केवल असाइनमेंट बनवाने तक से लेकर पिज्जा खाने तक के लिए ही। वैसे भी अर्पित के पास बात करने को ज्यादा कुछ होता नही था लड़कियों के साथ तो हमेशा से थोड़ा रिज़र्व ही रहा था।
पर ना जाने क्यों इस ‘एन्की एंजेल’ में आजकल रूचि हो रही थी उसकी। खैर बात चैट से लेकर अब और आगे जा चुकी थी। कोई फोटो अच्छा नही लगता अगर ‘एन्की ‘ को तो अर्पित डिलीट कर देता था , ‘एन्की’ के पेज पर शेयर हर पोस्ट को दिल और दिमाग लगा कर पढता था। 
एक दिन बातों बातों में नाम भी बता दिया, अनुष्का अवस्थी, ये वास्तविक नाम था उसका। 
एक दूसरे की पोस्ट और फोटो को लाइक और शेयर करते करते कब अर्पित और अनुष्का बैंक और स्कूल से दूर पहाड़ो और साहित्यिक किताबों की शैर करने लगे ,दोनों खुद भी नही जानते थे। अर्पित को पहाड़ों से प्यार था और अनुष्का को किताबों से, किताबें बोलो तो सेक्सपियर से लेकर यशपाल तक, ग़ज़लों से लेकर निबंधों तक, धर्मवीर भारती से लेकर चेतन भगत तक, सब आदतों में शुमार था अनुष्का के, परन्तु अर्पित तो कभी शिमला या नैनिताल भी नही जा पाया था, केवल दोस्तों से और फेसबूक पर ही जाना था उसने इन अतुल्य स्थानों के बारे में। पर दिली मोहब्बत तो थी उसको ऊँचे स्थानों से, वैसे भी गोविन्द बल्लभ पन्त के बारे में बहुत पढ़ चुका था अब तो बस नैनिताल जाकर सब अपनी आँखों से देखना चाहता था अर्पित।
वैसे अनुष्का भी कम उतावली नही थी। वो भी कभी हल्द्वानी से नीचे नही गयी थी ना, बस किताबों में ही केरला और गुजरात, बंगाल और चेन्नई घूमी थी वो भी।
एक दूसरे से सबकुछ तो साँझा करने लगे थे वो दोनों, अर्पित के बैंक में हुई लड़ाई जोकि नोटबन्दी में मैनेजर की कारिस्तानी के खिलाफ अर्पित ने आवाज उठाई थी से लेकर प्राध्यापिका के बिना अवकाश लिए चार दिन स्कूल ना आने पर अनुष्का की शिकायत डीईओ तक पहुंच जाना, सब शामिल होता था बातों में ।
बातें जो पहले मैसेंजर से शुरू हुई थी, अब व्हात्सप्प पर पहुंचकर कॉल तक आ गयी थी। लेकिन दोनों अब भी केवल दोस्त तक ही थे। 
वैसे ना अर्पित सोच पा रहा था और ना अनुष्का कि क्यों उनको एक दूसरे के कॉल का इंतजार रहता था। क्यों एक दूसरे को दिन में सैकड़ों बार चैक करते थे कि कब ऑनलाइन आएंगे। पर कुछ तो था दोनों के बीच। 
बातों बातों में कब दिसम्बर जून हो गया पता ही नही चला। जून में चंडीगढ़ भी दिल्ली की तरह तपने लगता है। बैंक स्टाफ भी हर हफ्ते दो -दो तीन- तीन दिन की छुट्टी लेकर या तो मोरनी हिल जो कि चंडीगढ़ से 1 घण्टे ही दूर था या फिर शिमला घूम के आ जा रहा था या फिर अपने घर में मजे कर रहा था। परंतु अर्पित के पास तो कुछ था ही नही घुमने फिरने के लिए। घर में एक विधवा माँ जो दिनभर हरि जाप करती रहती थी और दूसरी छोटी बहन जो अभी 11 वीं कक्षा में हुई थी, उन दोनों को या तो व्रन्दावन पसंद था या फिर खाटू श्याम जहां दोनों जगह अर्पित अभी तो बिलकुल नही जाना चाहता था। 
एक दिन बातों बातों में अनुष्का ने मजाक मजाक में कहा कि नैनिताल आ जाओ अगर चंडीगढ़ रास नही आ रहा इस गर्मी में तो। वैसे भी इस साल उसने कोई भी लीव नहीं ली थी तो मन में नैनिताल जाने का विचार बना ही लिया। 4 दिन की लीव अप्रूव करवाके अर्पित चंडीगढ़ से दिल्ली तो शताब्दी एक्सप्रेस से पहुँच गया पर आगे उसने बस से जाने का विचार बना लिया। 
कश्मीरी गेट से रात 10 से 12 बजे तक नैनिताल के लिए 10 -12 बसें जाती हैं। वहीँ जाकर एक स्लीपर बस में स्लीपिंग सीट बुक करवा ली। एक तो नैनिताल की यात्रा दूसरा अनुष्का से मुलाकात दोनों की खुशी हजम नहीं कर पा रहा था सो वोडका के एक क्वार्टर में आधा लीटर स्प्राइट मिलाकर पी गया और बूक की हुई बस की सीट पे चुपचाप जाकर सो गया। रात भर बस कहाँ कहाँ रुकी ये तो भगवान जाने पर सुबह 6 बजे जब बस हल्द्वानी बस स्टॉप जाकर रुकी तब जनाब की आँखे खुली। देखा तो सब लोग चाय पी रहे थे खुद भी नीचे उतरकर चाय मंगवा ली। अरे बाप रे, यहां तो जून में भी सुबह सुबह नवम्बर जैसा मौसम था। हॉफ स्लीव शर्ट में रोंगटे खड़े हो गए थे। चाय पी और बची हुई नींद पूरी करने के लिए वापस जाकर चद्दर ओढ़कर स्लीपर सीट पे सो गया। लगभग डेढ़ घण्टे बाद बस नैनिताल पहुँच गयी। शोर शराबा और कंडेक्टर की आवाज सुनकर आँख खुली। बेग को संभाला और जुते पहनकर नीचे उतर गये जनाब। 
नैनिताल जैसा सुना था उस से तो बिलकुल अलग ही था। छोटी सी सड़क ,उसी के दोनों और दुकानें, भीड़ भाड़, ऊपर से होटल बुकिंग एजेंट्स , मानो आपको गोद में ही उठा ले जायेंगे। एक चाय वाले से पता किया तो मालूम पड़ा की मॉल रॉड 2 मिनट की दुरी पर ही है पीछे, ये बस वाले कमिशन के चक्कर में यहाँ आकर बस रोक देते हैं, असली बस स्टैंड तो मॉल रोड़ के पास ही है। ज्यादा कुछ तो था नही अर्पित के पास एक छोटा सा बेग ही तो था सो चाय पीकर वापस चढ़ाई चढ़ता हुआ मॉल रोड़ की तरफ चल दिया। 
चलते चलते रास्ते में अनुष्का को कॉल लगाया तो फोन बंद मिला। मेसज कर दिया, फेसबुक और व्हाट्सएप्प दोनों जगह, कि मैं नैनिताल पहुँच गया हूं, समय मिलते ही बात करो। वैसे भी दोनों के बीच कोई कमिटमेंट तो थी ही नही औऱ ना मिलने का वादा था सो अर्पित भी ज्यादा सोच नही रहा था।
मॉल रोड पहुंचा तो देखा नैनिताल तो अदभुत है। यहाँ एशिया का एकमात्र पोस्ट ऑफिस और बस स्टैंड भी देखे जो कि एक पुल पर बने हुए हैं। मॉल रोड़ अंग्रेजी साम्राज्य की बड़ी देन है। असल में हर पहाड़ी शहर पर उन्होंने मॉल रोड़ बनाया था। क्योंकि उन लोगो को गर्मी तो बर्दास्त होती नही थी तो हर पहाड़ी क्षेत्र में अपना जमावड़ा बना लिया था। तभी तो गर्मियों के समय कलकत्ता या दिल्ली को छोड़कर शिमला को राजधानी बना दिया था। और उसी तर्ज पर साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होने पर उत्तरांचल की राजधानी देहरादून रखते हुए उच्च न्यायालय नैनिताल में रखा गया था। 
अर्पित ने भी मॉल रोड पर ही एक कमरा किराये पर ले लिया। 10 बजे के करीब तैयार होकर घूमने निकलने की सोची और फोन उठाकर फेसबुक चेक किया, अनुष्का ने मेसज पढ़ तो लिया था पर जवाब नही दिया था। सोचा कि वो स्कूल में व्यस्त होगी तब तक नैनीताल के नजारे लिए जाएं। 2 आलू के परांठे खाकर निकल दिए जनाब शहर देखने।
नैनीताल का मॉल रोड नैनी झील के साथ साथ फैला हुआ है। नैनी झील के दोनों तरफ के इलाके के अलग अलग नाम है एक का मल्लीताल और दूसरे का तल्लीताल । तल्लीताल किनारे पर बस स्टैंड, पोस्ट ऑफिस और आर्मी का एक कैंप है वहीँ से वल्लभ पन्त के नाम से बने चिड़ियाघर जाने का रास्ता है और दूसरा छोर जिसको मल्लीताल कहते हैं उस पर नैना देवी मंदिर, एक खेल का मैदान, सामने बड़ी सी मस्जिद और एक बड़ा सा बाजार है। इसके साथ वाली सड़क को ही ठंडी सड़क के नाम से भी जानते हैं क्योंकि उस सड़क पर झील के ऊपर से आती हुई ठंडी हवा जब पहुंचती है तो एक शीतल सा एहसास कराती है। वहीँ सड़क आगे जाकर आपको उच्च न्यायालय और गवर्नर हाऊस की तरफ ले जाती है। 
अब अर्पित का अकेले कहीं घूमने का मन नहीं था तो नैना देवी मंदिर के दर्शन करके वहीँ ठंडी सड़क के किनारे खेल के मैदान में क्रिकेट खेलते बच्चो को देखने लगा। बैठे बैठे अनुष्का को कॉल लगाया तो तो रिंग होने के बाद उसने कॉल काट दिया। तब तक अर्पित पास के एक खोमचे से भुट्टा ले आया। भुट्टा खा ही रहा था के अनुष्का का कॉल आ गया।
क्या तुम सच में नैनीताल आये हो अर्पित?
तो क्या तुम मजाक समझ रही हो, मैं नैना देवी मन्दिर के किनारे बैठकर भुट्टा खा रहा हूँ और यहाँ क्रिकेट मैच का लुत्फ़ उठा रहा हूं। अर्पित ने चिर परिचित अंदाज में बताया।
चलो मैं आधे घण्टे में वहां पहुँचती हूँ तुम तब तक वहीं इंतजार करो। कहते हुए अनुष्का ने फोन काट दिया।
अब अर्पित के मन में एक अजीब सी बेचैनी सी शुरू हो गयी।
क्या सच में आज मैं ‘एन्की एंजेल’ यानि की अनुष्का से मिलूंगा। वहीँ अनुष्का जो बात बात पर मुझे डांटती रहती थी। मेरी हर पोस्ट की सीबीआई की तरह जांच पड़ताल करती रहती थी, मेरे हर फ़ोटो पर कमेंट ना करके इनबॉक्स में स्माइली भेजकर प्रसंशा करती थी। सोचते सोचते कब आधा घण्टा बीत गया पता ही नही चला। 
आधे घण्टे बाद अनुष्का का कॉल आया— वहां बंदरो की तरह लाल शर्ट पहन कर ही बैठे रहोगे या कहीं घूमना भी है।
तुम कहाँ हो?
पहचान लो ,तुम्हारे आस पास ही हूँ।।

अरे बताओ भी यार।।।।।
ठीक है पहचानो काले टॉप और ग्रीन डेनिम मे कोई लड़की आपको निहार रही होगी।।

नजरें दौड़ाई तो तुरंत पहचान लिया।
दौड़के उस तरफ गया और हाथ मिलाया।। 
तो मिस अवस्थी, हाऊ आर यू।
आई ऍम फाइन, एज ऑलवेज।
जितनी खूबसूरत अनुष्का फोटोज में दिखती थी, उससे कहीं ज्यादा वास्तव में थी। गोल गोल सेब से भी लाल चेहरा, जैसा कि लगभग सभी पहाड़नों का होता है, मृग जैसी आँखे, सुर्ख गुलाब जैसे होंठ, लम्बाई लगभग 5’2″ ही थी। कद काठी सब मनमोहक।
तो जनाब आप आ ही पहुंचे नैनीताल। कहाँ रुके हैं?
यहीं मॉल रोड पर एक होटल में। शर्माते हुए अर्पित ने जवाब दिया।

तो अब मंदिर प्रांगण में ही दिन बिताना है या नैनीताल भी देखना है।।।।
आपकी नैनी झील और मल्लीताल,तल्लीताल तो देख चुके, और क्या दिखाओगे बताओ।
चलो हम आपको वो जगहें दिखाते हैं जो समूचे जग से लगभग अछूती है अभी।

पाताल लोक चलने का इरादा है क्या। थोड़ा कैजुअली होकर अर्पित ने कहा।

आप कहो तो पाताल ही चल पड़ें।। खिलखिलाकर अनुष्का चहुँकी।।।
अनुष्का अपनी होंडा सिटी कार लेकर आई थी। अर्पित को भी उसी में बैठाकर शहर से बाहर की तरफ रुख कर दी।।
रास्ते भर आम नौकरी चाकरी की बातें होती रही। 45 मिनट की ड्राइव के बाद दोनों किसी सुनसान सड़क पर पहुँच गये थे। मजाक के लिए अर्पित ने कह दिया , किडनैप करने का इरादा है क्या?
किडनैप ही करना होता तो चंडीगढ़ से ही उठवा लेते यहाँ अपने शहर क्यों बुलाते जनाब- अनुष्का ने भी पलटवार किया।

सारा दिन हनुमान गढ़ी, स्नो पॉइंट, भीमताल, सातताल, इन सबमे ही निकल गया। कब दोपहर से शाम हो गयी पता ही नही चला। 
शाम को वापस अर्पित को ड्राप करने के लिए अनुष्का मॉल रोड पर आ गयी। शाम 5 बजे के बाद मॉल रोड पर नो एंट्री हो जाता है इसलिए गाड़ी को नैना देवी मंदिर के पास ही छोड़कर अनुष्का अर्पित के साथ पैदल ही चल दी। रात के समय जब सारा शहर जो झील के लगभग एक तरफ ही बसा हुआ है रोशनी से जगमगा उठता है। और जब उसका प्रतिबिम्ब झील में दिखाई देता है तो प्रकृति और विज्ञान का एक अनूठा दृश्य दिखाई देता है। शाम के समय झील के किनारे बने मॉल रोड पर भीड़ भी ज्यादा हो जाती है और ठंड भी। द
दोनों बातें करते करते होटल की तरफ जा रहे थे। पहाड़ी इलाकों में एक बात होती है कि वहां पर घर या होटल देखने में तो बड़े नजदीक लगते हैं पर जब चढ़ाई चढो तो बड़ा दूर का सफर हो जाता है। चढ़ाई चढ़ते चढते दोनों की सांसें काफी तेज हो गयी।
अनुष्का जो अब तक अपने आपको सम्भाले हुए थी उसकी खुद की सांसो पर ही काबू नही था। होटल पहुँचते ही निढाल होकर सोफे पर गिर गयी। अर्पित वाशरूम होकर आया तो देखा अनुष्का आँखे बंद करके लेटी हुई थी। पास में ही बैठ गया और उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। अनुष्का भी ठंड के मारे थोड़ा करीब हो गयी। 
दोनों कब एक दूसरे के सुर्ख होठों के करीब पहुँच गये पता ही नहीं चला। बात होंठों तक रहती तो भी ठीक पर कब एक यौवना एक यौवन में खो गयी ना अर्पित को पता चला और ना ही शायद अनुष्का को। अर्पित जो कभी लड़कियों से बात तक करने में शर्माता था अब एक पुरुष होने का अहसास कर रहा था। दोनों ने घड़ी की तरफ देखा तो 10 बज चुके थे। अनुष्का ने कहा अब मैं चलती हूँ। कल मिलते हैं। अर्पित उसको गाडी तक छोड़के आ गया और वापस आकर ख्याली दुनिया में खोकर कब नींद आ गयी पता ही नही चला।

सुबह अर्पित 9 बजे उठा। उठकर बिस्तर से ही अनुष्का को कॉल किया तो उसने कॉल नही उठाया। सोचा कि शायद स्कूल में व्यस्त होगी, पर फिर अचानक याद आया कि आज तो रविवार है। दोबारा कॉल किया तो नम्बर बन्द मिला। व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर भी मेसज किया पर कोई जवाब नहीं मिला। दोपहर होते होते अर्पित की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। शाम 7 बजे की बस से वापस भी जाना था, हर सम्भव कोशिस की बात करने की पर बात नही हो पाई। 
शाम की बस से वापस चलना ही था। सारे रास्ते ना नींद आयी ना चैन मिला, सोचता रहा क्या गलती से ये सब हुआ है मुझसे, क्या अनुष्का इसी वजह से ये सब कर रही है। 
सुबह 5 बजे दिल्ली पहुंचा , कॉल किया तब भी नम्बर बन्द मिला। चंडीगढ़ पहुंचते पहुंचते हालत खराब हो गयी थी अर्पित की। अगले दिन जॉब पर भी जाना था। काम में भी मन नही लगा। शाम तक कॉल ट्राई करता रहा पर फोन बंद ही आ रहा था।

रात को 8 बजे कॉल लगा। 
उठाते ही अर्पित चिल्ला उठा, 
क्या है अनुष्का ये, मैं दो दिन से पागल हो रखा हूँ, क्या हुआ अचानक तुमको, अगर मुझसे गलती हुई है तो बता देती, 
जो हुआ उसके लिए मैं जिम्मेवारी लेता हूँ। 
मैं माँ से भी बात कर लूँगा। मैं शादी के लिए भी तैयार हूँ। तुम जैसा कहोगी वैसा ही होगा। ऐसे सजा मत दो। कहते कहते अर्पित की आँखों में आंसू आ गए।

अनुष्का ने उसी पुराने अंदाज में कहा- अर्पित तुम पागल हो गए हो क्या, तुमसे मिलके आने के बाद मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ अल्मोड़ा चली गयी थी। वहां नेटवर्क नही रहता रिलायंस का ,इसलिए फोन बंद था। और जो कुछ भी हमारे बीच हुआ वो सब नेचुरल था यार, वैसे भी मैंने अगले दिन सुबह, अनवांटेड 72 ले ली थी, कुछ नही होगा। और वैसे भी हम दोनों सिर्फ अच्छे दोस्त हैं। ओके। कहाँ शादी तक पहुँच गये तुम एक मुलाकात में, सच्ची तुम बहुत बच्चे हो अभी। मै बाद में बात करती हूँ अभी घर पहुंची हूँ मैं। औऱ हाँ अगली बार नैनीताल आओ तो प्लान करके आना ताकि 2-3 दिन आराम से एन्जॉय कर सकें, और एक बात अपना स्टैमिना थोड़ा बढ़ाओ, खिलखिलाते हूर अनुष्का ने फोन काट दिया।

अर्पित खामोश , निःशब्द सोचे जा रहा था। ना कोई कहानी थी उसकी ना कोई मुकाम था। क्यों समझदारी खो बैठा वो…………….
क्यों उस दिन उसने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी। क्यूँ होता है ये सब।

फेसबुक को एक मेल जरूर किया उसने—
-People You May Know…. का ऑप्शन हटा दीजिये। ये बड़ा कष्टदायक हो जाता है कई लोगों के लिए।

™ सन्दीप दुल्हेड़ा ©®

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