प्रलयकारी बाढ़ का यात्रा-वृत्तांत

Posted by Rajesh Kumar Suman
November 6, 2017

Self-Published

 

यह घटना समय का है,जब मैं अपने काॅलेज का शिक्षा ग्रहण कर रहा था। वर्ष 2007 में लगभग पूरे उतर बिहार को प्रलयकारी बाढ़ अपने आगोश में ले चुका था। उसी समय मैं ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा से रेगुलर मोड में इतिहास से आनर्स कर रहा था। इसी दौरान कुछ मित्रों के कहने पर इग्नू से बीसीए करने का मूड बना लिया था। इस संबंध में माताजी और पिताजी के पास इच्छा जाहिर किया तो उन्होंने कहा कि प्रलयकारी बाढ़ में फसल बर्बाद होने से माली हालात खराब हो चुका है फिर भी अगर तुम्हारा इच्छा है कि बीसीए करेंगे तो मैं तुम्हारे इच्छा के विरूद्ध भी कार्य नहीं करूंगा। पिताजी नें पैसा का इंतजाम करके मुझे बीसीए में नामांकन के लिए बस से अन्य मित्रों के साथ पटना रवाना कर दिये।वहाॅ पहुॅंचकर नामांकन करवाने के बाद ठहरने के ठिकाना खोजने लगा तो ठिकाना मिलने में समय लग रहा था तो उसी दिन शाम में घर लौटने का योजना बनाया तो हम तीनों मित्र पटना से हाजीपुर टैक्सी के सहारे पहंॅुचा और एक मित्र के ठिकाना पर रात्रि किया।अगले दिन जिस मित्र के डेरा पर हमलोग रात्रि विश्राम किये थे, वो अपने पिता के एक मित्र के यहाॅं के आवास पर ले गया। उनके पिता के मित्र पूर्व मध्य काॅलेज सोनपुर में भौतिकी विभाग के अध्यापक हुआ करते थे।वो भी संयोग से हसनपुर, समस्तीपुर के ही निवासी थे। जब हमलोग वहाॅं से घर आने लगे तो अध्यापक महोदय की पत्नी भी घर आने के लिए इच्छा जाहिर करने लगी। फिर हमसभी मित्र उनके साथ रेलगाड़ी और टैक्सी के सहारे देर षाम तक रोसड़ा पहुॅंचे। हमसभी मित्र अपने-अपने घर अर्थात डेरा चले गये और आंटी अपने भाई के यहाॅं रात में रूकी। उसके बाद सुबह-सुबह मुझे फोन करती है कि बेटा हमें घर तक पहुॅंचाने वाला कोई नहीं है,तो आप आकर मुझे घर तक पहुँचा दीजिए। मैं बड़ी असमंजस में था कि वो मेरा कोई संबंधी भी नही है तो फिर क्यों अपना जान जोखिम में डालकर उन्हें पहुॅंचाये। दूसरा नंबर पूरा क्षेत्र प्रलयकारी बाढ़ के चपेट में था जिस रास्ते होकर उनके घर नाव से छोड़ने के लिए जाना था। उसके एक दिन पहले उसी रास्ते में नाव हादसे में कई लोग मारे गये थे। मुझे तैरना भी नहीं आ रहा था। उनके आंखों में एक माॅं को बेटा से इस स्थिति में जो सहायता मिलना चाहिए, वो सहायता के लिए उनके आखों से स्पष्ट रूप से पुकार आ रही थी। फिर मैंने हिम्मत करके उन्हें उनके गणतव्य स्थान तक सकुशल पहुॅंचाने के बादे में दृढ़ प्रतिज्ञा किया कि उनको घर पहुॅंचाकर ही सांसे लूंगा। फिर हम आंटी के साथ रोसड़ा से रेलगाड़ी के सहारे हसनपुर बाजार पहुॅंचे वहाॅं से उनके गांव की दूरी तकरीबन 7 किलोमीटर थी। वहां से पानी ही पानी नजर आ था मानो समुद्र ही है।हमलोग जिस नाव पर सवार हुए थे उस नाव लगभग एक दर्जन और लोग सवार थे। नाविक ने पटवार के सहायता से नाव को धीरे-धीरे गणतव्य स्थान की ओर लेकर चल दिया। कुछ समय चलने के बाद हमलोग वहाॅं से गुजर रहे थे जिस स्थान पर उससे एक दिन पहले दर्दनाक नाव हादसे में कई लोग मारे गये थे। सब लोग डरे-सहमे हुए थे कि उससे एक दिन पहले वाला घटना का पुनरावृति ना हो जाय सब भगवान का नाम ले रहे थे। मैं भी डर गया और मन ही मन सोचने लगा कि अगर नाव डूब जाती है तो फिर मुझे तैरना भी नहीं आ रहा है। फिर भी मैं अपने आपको साहस का परिचय देते हुए अन्य सहयात्रियों से बताया कि देखिए मैं तैरना भी नहीं जानता हूॅं फिर भी इतने बड़े हादसे के एक दिन बाद उनके गणतव्य स्थान तक छोड़ने जा रहा हूँ ।सभी लोगों ने मेरा तारिफ करते हुए कहा कि देखो एक छोटा सा बालक में इतना साहस है कि जो तैरना भी नही जानता है और इनसे कोई जान-पहचान या संबंधी भी नहीं है फिर भी इन्हे छोड़ने के लिए जीवन का बिना प्रवाह किये हुए जा रहा है।लगभग डेढ़ घंटे के सफर के बाद में अपने गणतव्य को पहुॅंचा तो पूरा गांव पानी से डूबा हुआ था। संयोग से आंटी का दरवाजा और आंगन पानी से बचा हुआ था।उन्हें सकुशल पहुॅंचाने के बाद वापस आने के लिए उनसे अनुमति मांगा तो आने की अनुमति नहीं मिली। उन्होंने कही कि कल नाव हादसे हुआ है, मैं आपको अकेले नहीं जाने दूंगी। जब पानी कम होगा तब वापस घर जाने दूंगी। उस समय मेरे पास मोबाईल फोन भी नहीं था। मेरे घर वाले भी परेषान हो रहे थे। किसी तरह पिताजी से टेलीफोन के माध्यम से बात हुआ। मैं वहां तीन दिनों तक रूका और आंटी के हाथों से तरह-तरह के बनाये हुए व्यंजन का खूब लुप्त उठाया। जब मैं घर वापस लौंटने लगा तो आंटी रोने लगी और कहने लगी बेटा अगर तुम नही होते तो आज मैं अपने गांव में नहीं होती। तुम जैसे बेटा भगवान हर माॅं को दे कि तुम दूसरे के माॅं को भी अपने माॅं की तरह समझते हो।वापस घर आया और पिताजी को सारी परिस्थितियों से अवगत कराया तो उन्होंने मेरा पीथ थपथपाते हुए कहा कि तुम्हारे जैसेे बेटा हरेक मां-बाप को होना चाहिए। अंत में यह कहना चाहूँगा कि यह संस्कार अपने माता-पिता से बचपन से मिलता आ रहा है,जिससे मैं समय-समय पर जरूरतमंदो को सहायता करते आ रहा हूँ ।मेरे मा-पिताजी हमेशा कहा करते थे जरूरतमंदो को हमेशा सहायता करना चाहिए।इसी संस्कार का परिणाम है आज मैं सैकड़ो जरूरतमंद बच्चों केा निःशुल्क शिक्षा दे रहा हूँ । अंत में आपलोंगो से भी एक बातें शेयर करना चाहूँगा कि संस्कार जो है वह अच्छे समाज, माता-पिता और गुरू से मिलता है। ये चीजें किताब में नहीं मिलती है।
धन्यवाद।
राजेश कुमार सुमन
संस्थापक,बीएसएस क्लबः-निःशुल्क शैक्षणिक संस्थान,रोसड़ा(समस्तीपुर) बिहार
संपर्क सूत्र-9576036317

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