बचपन बचाइए साहब

Posted by Somu Anand
November 15, 2017

Self-Published

मुझे अपने बच्चे होने पर बहुत गुस्सा आता था और मैं जल्द से जल्द बड़ा हो जाना चाहता था. क्योंकि बड़े हो जाने के बाद मुझे चाचा के हाथों मार नहीं पड़ती. मुझे तेरह, सतरह और उन्नीस के पहाड़े अच्छे से याद हो जाते और क्लास में मुझे मुर्गा बनने की सजा नहीं मिलती. हर दोपहर घर से निकलने से पहले चाचा मुझे ढेर सारा टास्क देकर जाते थे और रात में मेरी कॉपी देखते, अक्सर मैं टास्क पूरा नहीं कर पाता और मुझे दोनों हथेलियों पर 4-4 छड़ी खानी पड़ती थी. इन बुरी यादों को मैं झेल नहीं पाता अगर मेरे घर के पास वो छोटा सा मैदान नहीं होता. बचपन की तमाम पाबंदियों के बावजूद घर के पास वाले फील्ड पर खेलने की आज़ादी थी. क्योंकि वहां से हमारी माँएं कभी भी हमें आवाज लगा कर बुला सकती थी. उस मैदान पर हम क्रिकेट, कब्बड्डी, गुड़िया कबड्डी, साईकल कबड्डी और न जाने क्या क्या खेलते थे. बतकही का भी सबसे बड़ा अड्डा फील्ड ही था वहीं हम बड़े गर्व से दूसरों को बताते कि पेंसिल के छिलके से मैंने रबड़ बनाया, कॉपी के बीच मोर के पंख को रखकर खल्ली खिलाया तो उसने बच्चा दे दिया और वो सिक्का जो मिट्ठू ने ट्रेन के पहियों के नीचे डाला वो चुम्बक बन गया. मुहल्ले के सभी छोटे-बड़े सामारोह भी उसी फील्ड पर ही होते थे और इसीलिए वह फील्ड हमें सबसे प्यारा था.

आज वो सारे फील्ड कहीं गुम हो गए हैं, शाम के समय बच्चों का कोलाहल सुनाई नहीं देता, गेंद अब किसी के घर में नहीं जाती, सारी सुविधाएं चहारदीवारी के अंदर कैद हो गयी हैं. उनके साथ-साथ बचपन भी कैद हो गया है.

फील्ड की भीड़ चौराहों पर आ गयी है. हाथों में बल्लों की जगह हॉकी स्टिक दिखाई देते हैं. बतकही अब गालियों में तब्दील हो गयी है. मिलने-जुलने की प्रवृत्ति समाप्त हो रही और अकेलापन हावी हो रहा है. सामारोह अब होटल,रिसॉर्ट में होने लगे हैं और अपनापन बस एक शब्द बनकर रह गया है. स्कूल के असाइनमेंट,बस्ते के बोझ से बचपन समाप्त हुआ जा रहा है.

आज बाल दिवस है, हमारे यादों के खजाने में साझा करने को बहुत कुछ है. लेकिन स्थितियां जिस प्रकार बदल रही उससे हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए मैदान और ये सारी बातें बस नानी की कहानियों में रह जाएंगी.

जिन्हें अपने पड़ोसियों का पता नहीं होता, टीम का महत्व मालूम नहीं होता, लोगों से मिलने-जुलने की आदत नहीं होती. वो कल के कैसे नागरिक होंगे ? सोचिए और बस सोचिए मत, अपनी जिम्मेवारी भी तय कीजिये.

बेहतर कल के लिए अपने आज को बेहतर बनाएं… बचपन बचाएं….

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