बसें भी बिल्कुल तितलियों की तरह होती हैं

Self-Published

ये बसें भी बिल्कुल तितलियों की तरह होती हैं
कितने सारे रंग शामिल होते हैं इनमें भी
जैसे होड़-सी लग जाती एक दूसरे
से आगे निकलने की
कोई दुल्हन सी सजी तो कोई बिना मेकअप के ही चल पड़ती है
हो ना हो लेकिन इन सारी बसों में एक बात एक जैसी रहती है वो कजरारे कजरारे वाला हॉर्न तो याद है ना …।।
चली जाती हैं सड़कों पर दौड़ते जाने कितने सारे पुलों को थरथराते हुए
और वो ड्राइवर के गानों के कॅलेक्शन तो लाज़बाव
कि जैसे इश्क़ ने सारे ग़मों की शुरुआत इसी से की है
अपने ही धुन में मगन बीड़ी पे बीड़ी फूँकते जाने कितने शहरों से ख़ामोशी से निकल जाते हैं
हाँ लेकिन अभी पीछे वाली नीली बस को आगे नहीं आने देता
और वो नीली वाली सफ़ेद वाली को
कभी कभी मोड़ पर तो लगता मानो सामने ही टकरा जायेगी
लेकिन वो ड्राइवर का फुल स्टेरिंग घूमाना अहा !!
ऐसा लगता है जैसे रोलर कॉस्टर में बैठे हों
बहुत कोशिशें की सारी नीली हरी सफ़ेद गुलाबी बसों ने की आगे निकल जायें
लेकिन ड्राइवर साहब क्या बस चला रहे हैं जो कोई भी आगे निकल जायेगा
वो कहने को तो बस है मगर किसी पुष्पक विमान से कम नहीं
जैसे तैसे मंज़िल करीब आ ही रही थी
और आख़िरकार वो लाल वाली बस जीत ही गयी
वही लाल वाली बस जिसमें मैं बैठा था 😉

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