भेद- भाव का खिलना

Posted by Jyoti Mishra
November 21, 2017

Self-Published

किचन सेट … कल शाम मैं  मालवीय नगर मार्किट के गिफ्ट स्टोर पे थी की तभी मेरी नज़र एक प्यारी सी बच्ची पे गयी जिसके पिता उसे और उसके २ या ३ साल बड़े भाई को खिलौने दिलाने लाये थे।  दोनों को उन्होंने अपनी मर्ज़ी से खिलौने चुन्ने की इज़ाज़त देदी।  भाई ने सुपर मैन चुना और बहन ने  गुड़िया लेकिन, बच्ची और खिलौने देखती  उसके पहले उसके  पिता ने  दुलार से कहा आपके पास तो बहुत सी डॉल है न आप  ये देखोकिचनसेट ये छोटा चूल्हा ,ये कुकर जिसमे मेरी सोना खाना पकाएगी। वही उसके भाई ने झट से कहा तू रोटी बांयेगी तो मुझे और मेरे सुपर मैन को खिलाएगी ?  बच्ची तो ख़ुश हो गयी लेकिन  मेरे  मन में लड़कियों  के लिए भेद भाव की कुछ सवाल छोड़ गयी। क्या आज भी हमारे देश में खाना बनाना औरतों का काम है? जबकि इस देश के सबसे अच्छे शेफ पुरुष है ।आज भी हमारा देश पुरुष प्रधान देश है ये कहना गलत नहीं होगा और कहीं न कहीं फेमिनिज़्म को बढ़ावा देने वाली वो औरते भी मानती  है ।  यदि ऐसा नहीं होता तो फेमिनिज़्म की हवा चलती ही नहीं क्यों , ये हक़ हमें पहले से मिला होता तो औरतें मर्दो के बराबर हैं ये बात बार बार याद नहीं दिलानी पढ़ती। जब हम औरतें  पुरुषों के साथ कन्धा मिला कर चल रही है तो फिर क्यों हमें 7या उससे भी ज़ायदा घंटों की जॉब के बाद घर काम करना पड़ता है और पुरुषों को घर आकर आराम से टीवी देखने की इज़ाज़त होती है  …..क्यों आज जब महिलाएं अंतरिक्ष तक पहुंच गयी है तभी हमारे देश में टीवी में आने वाले प्रचार महिलाओं को आगे बढ़ने की सीख देते है या फिर महिलों का हाथ बटने को कहते है और वही कानूनी तौर पे तो महिलाओं को  बराबरी का हक़ पिता की प्रॉपर्टी में दिया गया है पर क्या पिता के दिल से इसका हक़ मिल पाया है ? क्यों आज भी लड़की के ज़ादा बोलने पर माँ कहती है  लड़की हो लड़की तरह रहो ? 25 की उम्र में अगर मैं मैगी बनाना नहीं जानती तो ये मेरे लिए शर्मिंदगी और किसी लड़के के लिए गर्व की बात होती है ? क्यों आज भी कई घरों में मर्दो को खाना दे कर  ही महिलाएं खाना खाती है।  क्यों सोसिटी में  रह रही अकेले लड़की सबकी नज़र रहती है , और अगर लड़की का डिवोर्सी है तो दोष लड़की का ही क्यों दिया जाता है भले ही कारण कोई दूसरा हो ? मेरे ये सवाल हर उस लड़की की तरफ से है जो इस समाज में हो रही इस भेद भाव की भावना को दूर करना चाहती है जो इस समाज में खुल कर अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी जीना चाहती है निर्भरता ,आत्मविस्वास नयी कहनी लिखना चाहती है और उस बच्ची की तरफ से भी जो आज तो अपने किचन सेट के साथ खेल कर खुश हो रही होगी  पर आगे  वो सिर्फ अपने मर्ज़ी से कोई काम करे किसी दवाव में नहीं।  ।

 

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