भोगेन्द्र का अंत मधुबनी में कॉमरेड युग का अंत

Posted by Durganath Jha
November 26, 2017

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साल 1976 मधुबनी लोकसभा में नया परसीमन लागू किया गया । 1976 में ही पूर्वी लोकसभा को झंझारपुर नाम दिया गया और जिसको जयनगर लोकसभा कहा जाता था वो अब मधुबनी लोकसभा हो गया । इस परसीमन के लागू होने से झंझारपुर में सीपीआई कमजोर हो गयी।
इमर्जेंसीय के दौर बाद हुए चुनाव में आज के निवर्तमान सांसद जनता दल के टिकट पर लुटियन दिल्ली पहुँचे उस चुनाव में कॉमरेड भोगेन्द्र झा दूसरे नंबर पर आए ।
दौर आया 1980 का जनता दल टूट गयी थी । इंदिरा नए तेवर में फिर से सत्ता पर काबिज हुई । लेकिन मधुबनी में होनी को कुछ और ही मंजूर था ।
मात्र चार महीने में तत्कालीन सांसद सफीकुल्लाह अंसारी स्वर्गीय हो गए । इस के बाद आता है मधुबनी में सीपीआई युग या कहे तो भोगी भगवान (भोगेन्द्र झा) युग । स्व झा 1980 से 1996 तक मधुबनी लोकसभा के केंद्रबिंदु में रहे । 1984 में श्रीमती गांधी के हत्या के बाद हुए चुनाव में फिर एक बार हार का सामना करना पड़ा । लेकिन उसके बाद हुए दो चुनाव 1989 और 1991 में वो मधुबनी का रण जीत लुटियन्स दिल्ली पहुँचे ।
भोगेन्द्र झा अपने बहोत सारे कामो के लिए जाने जाते है । लेकिन एक काम कि इतनी भारी किमत चुकानी पड़ेगी ये शायद कॉमरेड भोगेन्द्र को भी शायद आभास नहीं था ।
साल 1996 बिहार में चारा घोटाले कि चर्चा जोड़ो पर थी । कॉमरेड संसद परिसर में ही लालू यादव के चारा घोटाले के खिलाफ धरने पर बैठ गए । जिसकी किमत उनको अगले चुनाव में चुकानी पड़ी । बिहार में राजद और सीपीआई में गठबंधन हुआ और टिकट बंटबारे में लालू ने भोगेन्द्र झा का नाम काट दिया । मधुबनी को एक और नया नेता मिलने वाला था ।स्व भोगेन्द्र झा के राजनीतिक शिष्य या कहे तो भोगेन्द्र झा के मार्गदर्शन में चलने वाले चतुरानंद मिश्र को टिकट दिया गया ।
अब मधुबनी लोकसभा में कॉमरेड भोगेन्द्र युग समाप्त हो गया था । इस के साथ ही समाप्त हो रहा था सीपीआई युग 1996 में सीपीआई तो चुनाव जीत गयी लेकिन उसके बाद सीपीआई आज तक मधुबनी लोकसभा के केंद्रबिंदु में भी अपनी जगह नहीं बना पाई है।
आज कल के नेता के तरह भोगेन्द्र झा ने पार्टी नहीं बदली उसके बाद भी वो पार्टी के लिए हमेसा एक सच्चे सिपाही के तरह काम करते रहे ।
साल 2009 तारीख 21 जनवरी कॉमरेड भोगेन्द्र झा हमेसा के लिए चीर निंद्रा में सो गए । किसान अपना एक मसीहा खो चुका था।

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