“मारे जा रहे लोग “

Posted by Aaryan Chandra Prakash
November 10, 2017

Self-Published

 

दोपहर का कोई वक्त रहा होगा और मैंने राजीव चौक से 522 नंबर की बस अम्बेडकर नगर के लिए पकड़ा था।दोपहर में सामान्यतः डीटीसी की बसों में ज्यादा भीड़ नहीं होती।मुझे सीट मिल गयी और थोड़ी ही देर में मैं सो गया।तकरिबन आधे घण्टे बाद मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे जेब में हाथ डाल रहा है।मैं नींद में था तो मुझे यह एक सपना भी लग रहा था पर फिर भी पता नहीं कैसे मेरा हाथ सहज ही अपनी पॉकेट की ओर चला गया जिसमें चोर का हाथ पकड़ आ गया।
 
उस समय बस लोधी कॉलोनी से गुजर रही थी।उधर ट्रैफिक नहीं होती तो बस की गति तेज थी और बस का गेट भी बंद था।चोर पकड़ लिया गया था और बुरी तरह लोगों के द्वारा पिटा गया था।उसके पिटे जाने का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते है कि उसे JLN स्टेडियम के पास धक्के मार कर उतार दिया गया।
 
पिछले साढ़े तीन सालों में चोरी की यह मेरे साथ छठी घटना थी।इसलिए जब वह पिटा जा रहा था मेरा हृदय बेहद मर्मस्पर्शी होते हुए भी मुझे उसे बचाने को उत्सुक नहीं कर पाया।वह पिटता रहा और मैं चुपचाप देखता रहा।उसकी उम्र मेरे से ज्यादा नहीं रही होगी।वही 20-22 वर्ष।
 
आज सुबह जब कॉलेज के लिए आ रहा था तो फिर किसी की जेब से Vivo की फ़ोन गायब कर दी गयी।मैं उस बेचारे के चेहरे की भाव देख रहा था।वह जैसे चिल्लाना चाहता था।पर मायूस चेहरे से सब से कह रहा था कि अभी ज्यादा दिन हुए भी नहीं थे मोबाइल के, एग्यारह हजार में खरीदा था।और लोग चुपचाप उसे सुन रहे थे।कौन इस खेल से परिचित नहीं है।सब अब जानते है कि मोबाइल व पर्स गायब होना आम बात हो गयी है।इतनी आम कि वे अब सांत्वना भी नहीं देते।
 
मेरी एक दोस्त है।वह बता रही थी कि मेट्रो में भी चोरी होती है और यहाँ लड़कियों का कुछ ग्रुप ज्यादा आसानी से इस काम को अंजाम दे देती है।मुझे याद है जब पिछले दफा मेरा पर्स मार लिया गया था तब मैंने निश्चय किया था कि अब बस से नहीं आऊंगा-जाऊंगा।मेट्रो से ही कॉलेज आना-जाना करूँगा।पर जिस तरह मेट्रो का फेयर कमर तोड़ने पे लगी है, एक-दो दिन ही लगातार मेट्रो से आता-जाता हूँ तो बजट गरबर हो जाता है।पहले विश्वविद्यालय के लिए अठारह रुपये चुकाता था और अब दो गुने से भी ज्यादा चुकाता हूँ।तो मेट्रो से सफर कर पाना संभव नहीं हो पाता है।फिर वापस बस की ओर ही आना पड़ता है।
 
अब इसमें कोई दो राय नहीं कि डीटीसी की हालत किसी गाँव की जर्जर पूल की तरह है जिसपे आना-जाना तब तक लोग करते रहते है जब तक कि वह स्वयं ढ़ह न जाये।फिर कुछ लोग मरते है।रोना-धोना होता है।तो डीटीसी की हालात भी ऐसी ही है जो किसी तरह बस लोगों को ढों रही है।बसें कम है, लोग ज्यादा है।इतने ज्यादा कि बस झुक जाती है।चलते-चलते रुक जाती है।ड्राइवर से लोग झगड़ने लगते है।अब इसी भीड़ में चोरी की घटना भी घटती है।सुबह और शाम का वक्त चोरों के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त होता होगा क्योंकि इस समय बसों में सबसे ज्यादा भीड़ होती है।गेट खुला होता है।इसलिए पकड़े जाने का भय भी कम होता है।
 
अब आपको एक और घटना से रु-ब-रु करवाता हूँ।कॉलेज से लौटते हुए मैंने कश्मीरी गेट से बस लिया था।शाम का वक्त था, बस में भीड़ थी।मैं बढ़ता हुआ बस में थोड़ा आगे पहुंच गया।बस ट्रैफिक के कारण धीरे-धीरे चल रही थी।कुछ देर बाद ही महसूस हुआ कि मेरे जेब से कोई मोबाइल निकाल रहा है तो मैं सहज ही बना रहा कि उसे लगे सबकुछ सामान्य है।जैसे-जैसे वह मोबाइल को ऊपर खींच रहा था, मैं महसूस कर रहा था।जब लगा कि अब बोल देना चाहिए तो मैंने बेहद ही सहज भाव मे उसकी ओर मुड़कर कहा ‘भाई, मुझे पता है तू चोरी कर रहा है’। इतना सुनते ही वह घबरा गया।चूँकि भीड़ भी थी तो सीधे वह भाग भी नहीं सकता था।आसपास के लोगों ने भी स्थिति को भांप लिया था पर इस बार किसी ने हाथ उठाने के बजाए बस में लीड लगाए बैठे गार्ड की ओर देखा।तबतक बस में हल्ला होने लगी थी और ड्राइवर ने बस रोक दिया।गार्ड अकपकाया सा बोला ‘चोरी कर रहा था, किया तो नहीं न! जाने दो’। और चोर आराम से उतर गया।
 
मुझे ऐसे अवसर पर व्यवस्था की जो लापरवाही है वह हमेशा ही कुछ करने पर विवश करती रही है और अंततः मैं कलम उठा लेता हूँ।मेरे एक दोस्त है, जब वे घर लौट रहे थे तब बस में उनके बैग से लैपटॉप निकाल लिया गया।दूसरे मित्र है, वे जब दस बजे रात को विश्वविद्यालय कैंपस में फ़ोन पे बात करते हुए आ रहे थे तो पीछे से एक बाइकर आया और मोबाइल छीन कर भाग गया।एक अन्य मित्र का कैमरा बैग से उड़ा ले गया चोर।और इन सारे मौकों पे पुलिस ने क्या किया! पहले तो FIR लिखने से आनाकानी करते रहे और कहते रहे कि ये सब होता रहता है।अब बताइए पुलिस कह रही है कि ये सब होता रहता है।और आपको जानकर आश्चर्य होगा या न भी होगा क्योंकि आम बात है कि ऐसे केस में पुलिस FIR चोरी या स्नैचिंग का न लिख कर गुम होने का लिखती है।और अगर आप जिद्द करे भी तो पुलिस कई तरीकों से आपको डराएगी।
 
चलिए अब कुछ और प्रश्नों की ओर नजर दौड़ाए।मैं लगातार सोचता रहता हूँ कि चोरी की घटना आखिर इतनी आम क्यों हो गयी है? क्यों लोग बदलाव के लिए आवाज नहीं उठा रहे? या जो लोग व्यवस्था में निगरानी के लिए चुने गए है, वे क्या कर रहे है?
 
अब मैं हम इन प्रश्नों पे विचार करें, उससे पहले एक और घटना घटी।अभी मैं कॉलेज से लौटते हुए इस आर्टिकल को पूरा कर रहा था।बस ट्रैफिक में पुरानी दिल्ली में रुकी हुई थी।मैं खिड़की किनारे बैठा लिख रहा था और तभी खिड़की से एक हाथ अंदर आया और तेजी से मेरा मोबाइल खीच ले जाने की प्रयास को अंजाम दे गया।उसने इस हरकत को इतनी जल्दबाजी में अंजाम दिया था कि मेरा मोबाइल टकरा कर फिर अंदर आ गया क्योंकि मोबाइल में मेरा JBL का हेडफोन लगा था।मोबाइल बच गया है पर हेडफोन का पिन जोड़ से खीचने के कारण टूट गया।ये है हालात।जस्ट अभी-अभी हुआ ये।
 
खैर, फिर से मेरा यह मोबाइल बच गया है तो आइये आगे उन प्रश्नों पे विचार करें, इस आर्टिकल को पूरा करे।जरा सोचिए इस चोर के बारे मे जिसने अभी-अभी मेरा मोबाइल झपटने की कोशिश की।या वे सभी चोर जिनसे मेरा या मेरे मित्रों का सामना हुआ वे सभी युवा ही थे।यानि जान जोखिम में डाल कर जो काम ये लोग कर रहे है वे देश के युवा ही है।क्यों है ऐसा? जाहिर तौर पर कारण बेरोजगारी है।और थोड़े से खतरा उठा कर चोरी, छीना-झपटी के केस में फायदा ही है तो ये लोग करते है।सरकार पोस्टर लगाने में व्यस्त है।लोग धर्म पे चर्चा करने में लगे है और ये चंद युवा चोरी, छीना झपटी में।
 
तो अब प्रश्न ये है कि लोग क्यों नहीं कुछ कर रहे।क्यों नहीं आवाज उठा रहे।मैं इस बाबत थोड़ी देर सोचता रहता हूँ।चोरी की व छीना-झपटी की जो ये घटना जिनके साथ हो रही है वे ज्यादातर लोग मध्यमवर्गीय समाज से आते है।जो मन मार कर सुबह उठते है और काम पे जाते है।फिर थके हारे रात को धक्के खाते घर लौटते है।अब जो उनके पास थोड़ा बहुत समय बचता है, उसमें उनके फूहड़ मनोरंजन है और राजनीति पे घिसी पिट्टी वही चर्चा।तो बदलाव की उम्मीद ऐसे वर्ग से बमुश्किल ही की जा सकती है।जो वर्ग खुद की जिंदगी पे मुश्किल से सोचता है वह बदलाव के लिए आगे कैसे आएगा, यह मेरे लिए भी एक प्रश्न है।
 
अब अंतिम व महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन लोगों को हमने निगरानी के लिए चुना है, पुलिस, सरकार ये सभी क्या कर रहे है? एक बात इनके बारे में कहा जाता है कि ये सब मिले हुए है।ये आम धारणा है।तो मैं भी कुछ ऐसा ही मानता हूं।और पुलिस को तो मैं एक असमाजिक संस्था मानता रहा हूँ।एक निरंकुश संस्था।और ऐसा मनाने के पीछे मेरा अपना अनुभव है।
 
तो अब आपने भी स्थिति को जान-समझ लिया है।पढ़कर आप क्या करने वाले है, मैं इस बाबत सोच रहा हूँ।या मैं ये भी सोच रहा हूँ कि मैं लिखकर क्या कर लेने वाला हूँ।चलिए इस प्रश्न पे सोचते रहते है।जब कुछ आपको सूझे तो लिखियेगा।
 
जय हिंद।जय भारतंत्र।

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