मुक्त विचारधारा के पैरोकार

Posted by Syedstauheed
November 4, 2017

Self-Published

मानव जीवन का मूल्य वक्त के साथ हाशिए पर जाता रहा है। फ़िर चाहे वहआस-पास या पडोस में हुई कोई अनजान मौत हो या जापान के हिरोशीमा अथवा सीरिया में मारे गए हज़ारो बेगुनाह लोग, इनके जीवन की भला क्या उपयोगिता? सरकारी महकमा छोटी सी छोटी सरकारी संपत्ति को लेकर सजग रही है, लेकिनक्या वह आम आदमी की सुरक्षा को लेकर भी संवेदनशील होती है ? सामानांतर सिनेमा ने आम आदमी और हाशिए के सवालों को कई बार शिद्दत से उठाया था ।

सामानांतर इंकलाब यूं तो पार्श्व में चला गया लेकिन उसकी गूंज कभी-कभार सुनने को मिल जाया करती है। कह सकते हैं कि हौसला आज भी सांसे ले रहा है। धुनी कलाकारों-फिल्मकारों ने उस विरासत बदले हुए रूप में जिंदा रखा है। फिल्म महोत्सवों में दिखाई जाने वाली भारतीय फिल्मों को

देखकर आप भी यकीन करेंगे। सामानांतर या नए सिनेमा की विरासत में सईद मिर्जा की शख्सियत का अपना स्थान है । सृजनात्मकता अभिव्यक्ति का महान
मंच है। सईद साहेब का सफर फिल्मों के साथ रूक नहीं गया। लेखन के माध्यम से वो भी अपना संदेश लोगों तक ले गए। आम आदमी की तकलीफों का
समाधान तलाशने खातिर जीवन समर्पित कर दिया ।

कभी-कभी हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त नज़रिया विकसित करने की जरूरत होती है, नया नजरिया इसलिए भी अपना लेना होगा क्योंकि परम्परा के बोझ में खुद
की सोच भी उसी ताबे हो जाती है ।जिन विचारों को पढकर हम बडे हुए,उसे ही हम आखिरी सच मान लेते हैं ।लेकिन सवाल करने की पहल विकसित की जानी चाहिए। पहली की मान्यताओं या विचारों की परख करनी होगी, हू-ब-हू चीजों को कबूल कर लेना गुलामी की निशानी है । सईद की शख्सियत विरासत में ताजा चीजों की तलाश की पैरवी करती है । सईद मिर्जा की किताब ‘अम्मी: लेटर टु अ डेमोक्रेटिक मदर’—कमाल का तेवर लेकर आई थी। इस किताब में सईद के जीवन
अनुभवों पर अच्छी चर्चा मिलती है। बंटवारे की त्रासद हालात से उत्पन्न
हिंसा एवं बदले से उत्पन्न फिजा का संतुलित उल्लेख है। हिंसा बाद परस्पर
सम्मान को उभरते देखकर मिर्जा को इस पर लिखने का मन हुआ। इसे माता-पिता
की कहानी से जोडकर प्रस्तुत करते हैं। इसमें उन घटनाओं की का जिक्र भी
हुआ है, जिससे देश को कठिन हालात का सामना करना पडा था। इस पुस्तक को
साहित्यिक स्थापत्य कहा जा सकता है। पुस्तक फिल्मकार के तेवर को लेखकीय
रूप में रूपायित करने में सक्षम रही थी । यह किताब उनके जज्बातों का अक्स
भी थी। सईद की फिक्रमंद शख्सियत को बयान करने वाला दस्तावेज। जैसा कि नाम
से अंदाजा होगा आपने ने यह नावेल अपनी प्यारी अम्मी को समर्पित की । मां
की मुफ्त सलाह,प्यार,प्रेरणा,ताकत हम सबको ताकत देती है। उसके रुकसत हो
जाने बाद रह-रह कर वह सब याद आता है । एक शहर में रहते हुए भी मां को
पर्याप्त वक्त न दे पाने की पीडा समझी जा सकती है । मां के नि:स्वार्थ
मुहब्बत को याद करते हुए पुस्तक लिखी गई थी । सईद मिर्जा जिस तरह का लेखन
करते हैं, वह साहित्यिक उसूलों में बंधकर नहीं किया जा सकता। लेखन के लिए
किसी फार्मूले पर न चल कर अपनी ही राह बनाई है । इसमें मां -बेटे के
रिश्ते का उदाहरण है,वो रोजमर्रा की जिंदगी जिसमें बच्चे को प्यार से
स्कूल भेजती है । अमर कहानी में इबादत का एक पाठ ।

सईद मिर्जा की दूसरी किताब The monk moor & Moses ‘फकीर,पहाड एवं मूसा’ को आए भी वक्त हो गया ।
इसमें सुधी पाठक के लिए बहुत कुछ है। प्रस्तुत किताब एक भूला दिए गए
‘अतीत’ पर विमर्श है, वह अतीत जिसे हर किसी ने नजरअंदाज किया । अब तक
इतिहास के पन्नों में चयन के भेदभाव कारण फना हो रहा था । कथा में दो
कहानियां सामानांतर चल रही हैं, एक ‘अमेरिकन विश्वविद्यालय’ की घटना को
बयान करती है । यह चार युवा विद्यार्थियों की कथा कहती है, चारों युवक
अनेक स्तरों पर एक दूसरे से अलग हैं । यह सभी इस खोज में निकले हैं कि
धर्म-संस्कृति-मान्यता व विचारधारा की विरासत से उनका मुस्तकबिल किस तरह
प्रभावित हुआ ? आज एवं मुस्तकबिल किस तरह पुरानी चीजों से तय होता है ?
रिसर्च ‘वेसटर्न इपिक्स’ की असलियत को उजागर करने में कारगर रही। तालीबों
ने खोज निकाला कि इन इपिक्स की जड इस्लामिक पांडुलिपियां हैं । मायने यह
कि यह किताबें इस्लामिक किताबों का आधुनिक रूप हैं ।

इस कहानी के सामानांतर दूसरी कहानी ग्यारहवीं शदी की ईरानी युवती रेहाना की है । वह अपने अदीब पति से कुछ सीखने की हमेशा चाहत रखती है। वह विज्ञान, दर्शन एवं कला का जानकार है। वह पति से सब कुछ जान लेना चाहती,जिसके लिए मन में थोडी भी शंका अमूमन रहती थी। रेहाना सवाल करने से नहीं घबराती, किसी सवाल का माकूल जवाब पति से न मिलने पर आस-पास के लोगों से जानने की कोशिश करती थी । संघर्षशील औरतों को रेहाना के किस्से का स्मरण कर लेना चाहिए । किताब पढकर हमें यह भी मालूम होगा कि सभी वाकयों की जानकारी हमें नहीं हो सकती,यह कुछ यूं हुआ करता मानो ज्ञान के समंदर से घिरा होकर भी कोई अनजान रह जाए । किताब मे कुछ ऐसा ही बयान किया गया । यह मजहबी नजरिए से नहीं लिखी गई, इतिहास के अनजान बातों को उजागर करना मकसद था । रचना के जरिए आप असलियत के एक अनजान पहलू को बताते हैं । अनजान पहलुओं को उजागर करने के क्रम में आप युरोपीयन लोगों की सीमित सोंच तक पहुंच जाते है ।

दुनिया को लेकर युरोपीय लोगों की धारणाएं कहां टिकती हैं ? आज की दुनिया को वह किस नजरिए से देखते हैं ? मिसाल के लिए ‘अलजेबरा’ लफ्ज क्या था ? इसका नामकरन असलियत में किस आदमी ने किया? फिर यह कि न्यूटन के पहले रोशनी के बारे में किसे जानकारी रही कि वो जर्रे से बनी है ? इन बातों को जानने की कोशिश नहीं हुई । उस समय में इस्लाम के हरेक पहलू को नजरअंदाज किया गया । विज्ञान व तकनीक में इस्लाम के योगदान को युरोपीयन लोगों ने इज्जत नहीं दी । शक की नज़रों से देखकर नकार दिया । इस्लाम को लेकर अनेक पूर्वाग्रह कायम थे। ।आपकी किताब नयी जमाने की वेस्टर्न सोंच से दो टूक संवाद करती है। वेस्ट का चिंतन अनेक सभ्यताओं की अनदेखी कर रहा है । आधुनिक चिंतन दरअसल सामूहिक कोशिशों का फल है। लेकिन ‘माडर्न’ को खुद से ही जोड कर वेस्ट दुनिया पर राज कर रहा है। बाकी देश उसे मानने को मजबूर हैं । किताब ने आतंकवाद-लोकतंत्र एवं सभ्यता की परिभाषा को नए नजरिए से गढने की मांग की थी । इससे गुजरते हुए हमें एहसाह होता है कि आधुनिकता खास कपडों, शापिंग कांपलेक्स, खान पान से ताल्लुक नहीं रखती । वह इंसानी नजरिए की खास अवस्था है । यह किताब तीसरी दुनिया के मुल्कों की कोशिशों का दस्तावेज तौर पर नजर आती है ।

सईद की परवरिश बहुसंख्यक परिवेश में हुई, वहां हर किस्म के लोग रहते थे फिर भी बहुजन आबादी एवं परिवेश का डर नही बैठा । भाई अजीज मुख्यधारा
बम्बईया सिनेमा में सक्रिय रहे । एक ही परिवार दो भाई लेकिन विचारधारा अलग-अलग । एक ‘न्यू वेव’ सिनेमा का माहिर,तो दूसरा पोपुलर बंबईया फिल्मों
का निर्माता।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.