‘मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त’

Posted by Chandrakant Shukla
November 26, 2017

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‘मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त’

 

बेख्याली में यूं ही कभी सोचती हो तुम मेरे बारे में ? उन बीते लम्हों के बारे में जो हम दोनों ने एकसाथ बिताए थे, उन ख्वाबों के बारे में जो हम दोनों की साझा आंखों ने देखे थे अपनी ज़िन्दगी को लेकर, वो वादे जो हमने किए थे एक-दूजे से, वो कसमें जो खाई थी हमने, अच्छा… उस वक्त क्या चल रहा था तुम्हारे दिल में जब बड़ी बेरुखी से तुमने कहा था मुझसे अचानक कि- सुनो ! अब हमारा रिश्ता यूं आगे नहीं चल सकता, अब हमारे रास्ते जुदा है.. क्या ये कह देना उतना ही आसान था जितनी आसानी से तुमने कहा था ? पता नहीं क्यों, मुझे ऐसा लगता नहीं कि ये कह पाना तुम्हारे लिए आसान रहा होगा । अपने ख्यालों से, ख्वाबों से, अपनी रूह से, अपनी ज़िन्दगी से तुम उस शख्स को कैसे अलग कर सकती हो जो तुम्हारी ज़िन्दगी के हर ज़र्रे में शामिल था.. जिसको तुम सुबह से लेकर रात तक की हर बात बताती थी कि आज सुबह चाय नहीं पी थी.. आज मम्मी के साथ बाज़ार जाना है, आज छोटी बहन से झगड़ा हुआ था, आज पापा थोड़ा सा गुस्सा थे, मेरा फोन नहीं लग रहा था, आज तुम्हारे फेवरेट रंग का दुपट्टा ना जाने कहां खो गया है, आज तुम्हें कुछ अच्छा नहीं लग रहा है, आज हल्का हल्का बुखार सा है, कुछ खाने का मन नहीं है, आज याद बहुत ज्यादा आ रही है, आज फोन मत रखो.. और भी ना जाने कितनी बातें जो वक्त-बेवक्त तुम मुझसे साझा किया करती थी… उस शख्स से हाथ छुड़ाना क्या इतना आसान था ? यकीनन आज भी तुमको मेरी याद ज़रूर आती होगी, आज भी अपनी छत पर हल्के हल्के अंधेरे में आसमान की तरफ देखते हुए तारों को जोड़कर तुम मेरा चेहरा बनाने की कोशिश करती होगी, आज भी चांद को देखते हुए खो जाने पर तुमको मेरा अक्स नज़र आता होगा, आज भी तुम मेरी बातों को याद करके यूं ही मुस्कुरा पड़ती होगी, उस हल्की सी हंसी के बीच में अचानक कोई आंसू तुम्हारी पलकों से टपक पड़ता होगा… तब तुमको ख्याल आता होगा कि कितना कुछ अंदर ही अंदर टूटा होगा मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त… ना जाने कितने अरमानों का कत्ल हो गया होगा, ना जाने कितनी ख्वाहिशों ने खुदकुशी कर ली होगी, वो सपने जो सिर्फ और सिर्फ हमारे थे वो कैसे बिखर गए होंगे.. जब कभी अकेले बिस्तर पर लेटे हुए तुम करवट लेती होगी और तो एक अजीब सा खालीपन तुम्हें परेशान कर देता होगा, कमरे का सन्नाटा तुम्हारे कानों में किसी शोर की तरह चुभता होगा और तुम तकिए से अपने कानों को दबाकर अजीब सी उलझन से बेचैन होकर झल्लाकर एकदम से उठकर बैठ जाती होगी.. और फिर मुझे कोसते हुए या याद करते हुए फिर मुझे सोचकर पुरानी बातों में खो जाती होगी । फिर तुमको लगता होगा कि वो वक्त कैसा था और ये वक्त कैसा है… ? क्या तुमको कभी लगा कि तुमको मुझसे एक बार बात करनी चाहिए, इन सारी गलतफहमियों को दूर करने की एक कोशिश तो करनी चाहिए.. औरों की, गैरों की बातों में आकर जिस रिश्ते ने दम तोड़ा उस रिश्ते के कत्ल के पीछे की वजह क्या थी, असल गुनहगार कौन था कभी सोचा तुमने ? कभी सोचा कि मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त तुम जिस आजादी को महसूस कर रही थी.. असल में वो उदासी और खालीपन की एक कैद थी हम दोनों के लिए… कभी आया मन में तुम्हारे ये ख्याल कि मैं कैसा हूं ? कहां हूं ? कभी तुम्हारी नज़रों ने कोशिश की इस दुनिया की भीड़ में मुझे ढूंढने की… वैसे ही जैसे स्कूल में प्रेयर हॉल में हमारी निगाहें एक-दूसरे को तलाशा करती थी… कभी सोचा तुमने कि कितना कुछ एक झटके में बदला था…. ‘मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त’
कभी सुकून से बैठना और तसल्ली से सोचना कि आखिर क्या हासिल हुआ तुमको ‘मुझसे हाथ छुड़ाते वक्त’

चन्द्रकान्त शुक्ला, उन्नाव वाले

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