मुलाक़ात

Posted by Pramod Singh
November 21, 2017

Self-Published

‘तुमने न…. बहुत वक़्त लगाया यार’
‘हा…. कभी जरूरत ही नही लगी न’
‘इतना ज्यादा टाइम कौन लेता है यार….वैसे भी जरूरत हो ….ये तो जरूरी नही है न….’

कुछ कहानियां ऐसी होती है जैसे काले अंगूर के जूस के टाइप, दो तीन दिन के बाद पियो तो एकदम मदमस्त कर पाताललोक से स्वर्गलोक का दर्शन करा आये…..पर अगर थोड़ा सा और सुस्त हो जाए तो तन बदन भन्ना जाए…….
तुमसे कभी अच्छे से मिल ही नही पाया..मतलब के कभी ज़बान थरथरा गयी तो कभी माहौल ही क़त्ल वाला हो गया….पर जब सालो बाद ये मौका-ए-दस्तूर बना भी तो ऐसा बना की सबकुछ डांवाडोल हो गया…..एकदमै से भूकम्प आ गया हो जैसे…..सारी दुनिया डोल रही हो और महादेव का तांडव बस शुरू ही होने वाला था……कि कही से एक हवा आयी……धीरे धीरे से चक्रवात बना के सब कुछ उड़ा ले गई…..हमने तो साला ये बवंडर की कल्पना भी नही किये थे बे…….जैसे धान के हरियरी खेत को बंजर कर दिया.

#सागर

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