राज्य गुजरात 2002 दंगे, अक्षरधाम, गौरव यात्रा और चुनाव (आखरी)

Self-Published

अहमदाबाद का सम्प्रदायिक माहौल हमेशा, बिखरा हुआ ही रहा है मसलन समाज में हमेशा से तनाव मौजूद था एक छोटी सी घटना आग में घी का काम करती थी. 2002 के गुजरात राज्य के स्माप्रदायिक दंगे, बहुत हद तक अलग थे, जिसको समझना बहुत जरूरी है, वास्तव में एक बार मैं भी इस आग की चपेट में आते बच गया था, शायद साल 1985 ही होगा, शाम को खेलते हुये दायीं बाजू टूट गयी, नसीब से पाप घर थे, जैसे तैसे पट्टा बंधवा लिया, लेकिन इस समय शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था ओर दूसरे दिन शहर के पुराने इलाके में ही, एक बड़े डॉक्टर से पट्टा बंधवाना था. लौटते हुये, रिक्शा में मैं, पापा ओर मेरी माँ तीनो मौजूद थे लेकिन रिक्शा चालक, हिंदु था, एक जगह मोड़ पर मुस्लिम समुदाय का टोला खड़ा था, सफेद कुर्ता, पजामा, मुझे आज भी याद है रिक्शा के पीछे थोड़ी जगह थी जँहा से पीछे आने वाले वाहनों को देखा जा सकता है, उसी जगह से मुझे वह भागते हुये हमारी तरफ आते हुये दिखाई दे रहे थे, बस नसीब से बच गये,  लेकिन पापा ने बताया की वह हमारे पीछे नही थे, दरअसल वह रिक्शा चालक के पीछे थे.

ये माना जा सकता है, की अहमदाबाद के इतिहास में धर्म और मजहब के नाम पर, अक्सर हथियार म्यान से बाहर आते रहे है लेकिन एक सीमा तक, अगर पुराने अहमदाबाद की ही बात करे तो शहर में हिंदू, स्वामीनारायण, जैन, सिख गुरुस्वार, मस्जिद, मुस्लिम धार्मिक स्थान, मेरी जानकारी में नही है की कभी धार्मिक हुल्लड़ में इन में से किसी भी धार्मिक स्थान को कभी भी नुकशान पहुचाया गया हो, वही ये हुल्लड़ मार पीट, पथराव तक सीमित था कभी महिला या किसी बच्चा को नुकसान हुआ हो, इसकी भी जानकारी नही है. शहर के बाहर ओर अंदर, एक सीमित हद तक आगजनी होती थी, घात लगाकर नही, मानो दोनों समुदाय में एक आपसी समझौता था की आर्थिक और व्यपारिक प्रतिष्ठानों को अगर नुकशान पहुचाया गया तो अगर मुस्लिम बहु इलाके में हिंदु कारोबारी के संस्थान है तो शहर के बाहर हिंदू इलाके में भी मुस्लिम कारोबारी संस्थान है. शहर बट्टा हुआ था, लेकिन काफी हिंदू मुस्लिम घर एक दूसरे के बहु इलाके में भी थे, दंगो के समय ये, घर खाली कर देते और शांती के माहौल में वापस अपने घर की ओर रुख कर लेते, इस साम्प्रदायिक माहौल में कई ऐसे इंसानियत के उदाहरण मिलते है जब धर्म और मजहब को भूल कर लोगो ने एक दूसरे की मदद की है.

लेकिन 2002 दंगो की तकरीर ओर जमीन दोनों ही अलग थी, अक्सर मोदी जी अपने भाषण में जिक्र करते है की उनके 2003 से शुरु नये कार्यकाल से अब तक शहर में कर्फ्यू नही लगा, दरअसल इसके ओर भी मायने है, 2002 के पहले जब भी दंगे होते थे या आम कोई  ही घटना उग्र स्वरूप ले सकती थी, इसकी आंच भर से कानून व्यवस्था हरकत में आ जाती थी और इत्यान्तन के तौर पर कर्फ्यू लगा दिया जाता था, ये कर्फ्यू ही था जिसके कारण जान माल का नुकशान एक सीमित संख्या तक ही रह जाता था अन्यथा इसके परिणाम बहुत भयावह हो सकते थे, ओर दंगो को या भीड़ को काबू करने के लिये पुलिस के पास जो सबसे महत्व पूर्ण हथियार था वह था आशु गैस के गोले, पिता जी और ताया जी, रोडवेज में बतौर ड्राइवर कार्यरत थे और बिगड़ते समय में अक्सर इनकी सेवा कानून व्यवस्था के अधीन लगा दी जाती थी, कुछ 85-87 का साल होगा शहर में हालात खराब थे और ताया जी कानून बन्दोबस्त में लगे हुये थे, किसी कारण वश वह अपने पुलिस मित्रो के साथ हमारे घर आये थे रात का समय था, तब ताया जी ने हमे वह आशु गैस के गोले दिखाये थे, लाल रंग के, करीबन 0.75 फ़ीट की लंबाई ओर इसके पीछे शायद पीतल का हत्था लगा होता था, कहने का मतलब कानून व्यवस्था तन्दरुस्त ओर चोकनी थी.

लेकिन, साल 2002 के दंगों में सीमित कर्फ्यू था अगर था भी तब भी कोई रोक टोक नही थी, वही आशु गैस के कितने फायर किये गये ? कितने हवाई फायर हुये ? ये सवाल आज भी एक सवाल ही बना हुआ है. लेकिन जिस तर्ज पर इन दंगो को अंजाम दिया गया, वह बहुत भयावह है, मसलन नफरत इतनी थी की गर्भवती महिलाओं को भी नही बख्शा गया. वही मुस्लिम समुदाय को आर्थिक रूप से मदहाल करने के लिये इनके व्यपारिक जगहों को चुन चुन कर निशाना बनाया गया,  हां, कुछ दिनों बाद आर्मी को तैनात कर दिया गया था, पुराने अहमदाबाद में स्थिति एक गुरुद्वारा साहिब में अक्सर उन नोजवानो से मुलाकात हो जाती थी जो यँहा कानून व्यवस्था के अधीन लगाये गये थे, मार्च 2002 के पहले हफ्ते तक, सम्प्रदायिक माहौल बहुत बिगड़ा हुआ था, लेकिन इसके पश्चात भी, रुक रुक कर स्माप्रदायिक आग जनी की खबरे आती रहती थी, खासकर गुजराती मीडिया में इनको बयान करने का अपना एक अलग ही अंदाज था.

इसी साल, सिंतबर 2002 में अहमदाबाद से सटे हुये शहर गांधीनगर, जो की गुजरात प्रांत की राजधानी भी है, यँहा स्थिति स्वामीनारायण आस्था के प्रतीक अक्षरधाम पर आतंकी हमला हो गया, जवाबी मुठभेड़ में आतंकी भी मारे गये लेकिन उस से पहले कई निर्दोष, आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गये थे, धार्मिक आस्था का प्रतीक लहू लुहान हो चुका था, सभी प्रांत वासियो की जान फिर सुख रही थी, की अब गोधरा कांड के बाद, दंगो की आग एक बार फिर ना भड़क जाये लेकिन गनीमत रही, सब ठीक रहा. लेकिन एक फास जो एक गुजराती के गले नही उत्तर रही थी की, अक्षरधाम जिस सड़क पर स्थिति है उसके दूसरी ओर ही मुख्य मंत्री और राज्यपाल का, ओर भी कई वशिष्ठ नेतागण का सरकारी आवास स्थान है, अब सवाल यही था, की हथियार बंद आंतकवादियो ने अक्षरधाम पर ही हमला क्यो किया ? क्योंकि इसी सड़क पर वह दूसरी तरफ हमला करके, अक्षरधाम से बड़ी सनसनी को जन्म दे सकते थे.

इसी बीच गुजरात प्रांत में रुक रुक कर हो रही आगजनी की घटना को समझने के लिये केंद्र की तरफ से श्री के. पी.एस.गिल को नियुक्त किया गया, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा की प्रदेश में शांति बहाल करने के लिये समय से पहले चुनाव करवा देने चाहिये ओर हुआ भी ऐसा ही, समय से पहले प्रांत में विधानसभा चुनाव करवाये गये जँहा मोदी के रूप में भाजपा की जीत हुई, ओर इस चुनाव के बाद गिल का तथ्य सही साबित हुआ, शांति ऐसी बहाल हुई की आज तक कभी स्माप्रदायिक दंगे, गुजरात प्रांत में नही हुये, लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है की गिल को ऐसी क्या जानकारी थी, या उन्हे इस बात का एहसास हो रहा था की चुनाव ही मात्र एक शांति बहाल करने का जरिया है ? ये सवाल आज भी बस एक सवाल है. इसी चुनाव प्रचार के माध्यम गुजरात राज्य में भाजपा का प्रचार करने के लिये, मोदी जी ने गौरव यात्रा का आह्वान किया था जँहा भाषण में शब्द पाकिस्तान, मिया, मिया मुसरफ क्यो शामिल किये जा रहे थे ये भी एक बड़ा सवाल था.

https://m.rediff.com/news/2002/aug/05spec.htm

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