रानी पद्मिनी, मिथक या सच

Posted by Mukesh Singh
November 14, 2017

भारी मन से लिख रहा हूँ.
मिंकू मुकेश सिंह की कलम से…

”रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना और कौवा मोती खायेगा”…..और ऐसे समय में विवश मन की आग है मेरी लेखनी में……चितौड़, मेवाड़, रतन सिंह, गोरा, बादल, कुम्भलगढ़ ये नाम अपने आप मे रक्त रंजित है और राजस्थान की पराक्रमी वीरगाथा के प्रमाण है, कभी मौका मिले तो अपने गौरवशाली इतिहास के मटमैले पन्नो को पलटे…
रानी पद्मावती क्या थी उनके जीवन मे गोरा और बादल नाम के दो लोगों का क्या महत्व था ये सब जानिए…
फ़िल्म का विरोध अपने जगह है..
हिन्दी सिनेमा की शुरुआत राजा हरीश चंद्र पर 1913 मे बनी मूक फिल्म से हुई थी। शुरुआती दौर मे धार्मिक फिल्मे ही बनी।
उसके बाद आया सामाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों का दौर।
अगला दौर था रोमांटिक फिल्मों का, पर एक बात ध्यान देने वाली है की इन फिल्मों मे भी कुछ न कुछ सामाजिक संदेश जरूर होता था खैर अब तो फिल्मो के नाम पर क्या-क्या परोसा जाता है कुछ पता नही…
पहली बात तो यह कि पद्मिनी की ऐतिहासिकता, उनका महान व्यक्तित्व और पवित्र स्मृति वंश परंपरा से लाखों हिंदुओं के मन में जिंदा है, जिसे ये जाहिल, उजड्ड, असभ्य और अशिष्ट ‘धर्मनिरपेक्ष तबके’ के लोग कभी नहीं समझ सकते, यह उनकी कल्पनाशीलता की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। चित्तौड़ के कण कण में, वहां से सदियों पुराने मंदिरों ,पत्थरो और मिट्टी में रानी पद्मिनी जिंदा है।
आप कब-कब फिल्मो का विरोध करेंगे, रईस का विरोध किये रिलीज हुई, ट्यूबलाइट का विरोध किये रिलीज हुई..ये पीढ़ी स्लीवलेस छोटे कपड़े देख रही है फिर रानी पद्मिनी को क्या समझेगी…
आप ही है जो “द डर्टी पिक्चर,बीए पास,मर्डर2 आदि उत्तेजित फिल्मे देखते है और उनकी कमाई 500 करोड़ के पार पहुचा देते है”

मेवाड़ के राजा रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी,अत्यंत सुंदर थी दिल्ली के गद्दी पर खिलजी बैठा था रानी की सुंदरता के चर्चे सुन उन्हें पाने की ठानी, राजा रतन सिंह को किसी तरह बंधक बनाया अब राजा रतन सिंह को मुक्त कराने की जिम्मेवारी मेवाड़ और रानी पर आ गयी दो वीर योद्धा गोरा और बादल के सहयोग से रानी ने एक चाल चली ,गोरा और बादल ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया राजा को मुक्त करके उन्हें मेवाड़ की सीमा में प्रवेश करा दिया अपने शहीद हो गए अब रानी की इस चाल का पता खिलजी को चल गया था उसने गुस्से में आकर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया राजा रतन सिंह की सेना हार गयी रानी ने ये तय किया कि दुश्मनों के साथ रहने से अच्छा है कि पूरे शहीद विधवाओं के साथ “जौहर” कर लिए जाए अंत मे यही हुआ रानी एक कमरे में अपने जीवित शरीर को जलती आग में जला लिया ,खिलजी विजय होकर भी हार गया उसके हाथ कुछ नही लगा…

संजय लीला भंसाली की फ़िल्म “पद्मावती” का विरोध करिये उससे पहले भारत के अच्छे इतिहासकारों, जानकारों और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों के एक पैनल को फ़िल्म रिलीज होने से पहले एक बार दिखा लीजिये अगर कुछ आपत्तिजनक लगा तो विरोध इस कदर करियेगा की आगे से कोई फिल्मनिर्माता भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से छेड़छाड़ करने लायक ना बचे..

“ये मेरे विचार है किसी को हताहत करना मेरा उद्देश्य नही”

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