वहम

Posted by Prashant Mani Tiwari
November 13, 2017

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मुझे याद है…. हर एक पल जो हमने साथ गुजारे थे।

भले ही वक्त ने आज वहाँ ला कर खड़ा कर दिया है जहाँ हम एक दूसरे से बिलकुल अंजान हैं, फिर भी तुम्हारी मुस्कराहट, सुरीली सी आवाज, वो शर्मो हया, वो मदहोश कर देने वाली नाशीली आँखें…. मानो जैसे आज भी इन तरसती नजरों में कैद हो।

बीते कुछ दिनों से निगाहें ना जाने क्यूँ तुम्हे देख बैठती है। कभी त्रिवेणी के आस पास, कभी लंका की भीड़ में तुम्हें महसूस करना। अचानक से जैसे तुम मेरे सामने से गुजर जाती हो, मेरी बेचैन आँखों से अपनी बेबाक नजरें मिलाती हुई… ये एहसास कराते हुए जैसे मैं गुनाहगार हूं तुम्हारा।
जानता हूं वो सब जो मुझे आज कल दिखाई देता है, वो तुम नही हो… वहम है मेरा, पर क्या करु अगर आंखों से देखा कोई चेहरा दिल में उतर सकता है, तो दिल में बसी धुँधली सी यादें भी आँखों के सामने आ ही जाती हैं कभी न कभी।

लेकिन आज भी जब भी मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सिंह द्वार से गुजरता हूं, जेहन में एक दर्द स्पष्ट महसूस करता हूं… एक बेबस, लाचार, घुटनों पर झुका लड़का दिखाई देता है, जिसकी नम आंखें तुम्हे बार बार रुक जाने को बोल रही थी, और तुम पत्थर सी बेजान खड़ी थी। उस भीड़ में कम से कम तुमसे तो ये उम्मीद कर ही सकता था कि तुम मेरे एहसास को समझती, तुम मुड़ी भी थी लेकिन शायद वो तकलीफ तुमसे भी ना देखी गयी और तुम मेरे जज्बातों को कुचलते हुए सिंह द्वार से बाहर चली गयी और फिर कभी लौट कर नही आयी….

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