वापस आओ अपने प्रकृति के आँचल में ।

Posted by Raju Murmu
November 2, 2017

Self-Published

इस पृथ्वी के जल, आकाश और भूमि के सभी प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सबसे विकसित और संगठित सामाजिक समूह में रहने वाला और नए चीजो को सृजन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान बुद्धि , समझ , भावना , प्रेम , क्रोध , घृणा , द्वेष जैसे मानवीय विशेषताओं से भरा हुआ मनुष्य  ‘प्राणी जगत’ में सृजन करने की अदभुत क्षमता के कारण ही ‘मनुष्य’ को  इस पृथ्वी में अनूठा प्राणी बनाता है।

अदभुत मानसिक क्षमताओं से भरा हुआ मानव वास्तव में सृष्टि की सबसे खूबसूरत और बेहतरीन रचना है। इस पृथ्वी के सारे वनस्पति ऐवम जिव जगत इस ‘प्रकृति’ के नियंत्रण में रहती है। ‘प्रकृति’ भी अपने सभी रचनाओं की देखभाल  उचित रीती सी करती है। सूर्य की किरण इस पृथ्वी को नया जीवन दे देता है। वर्षा की बुँदे जैविकता के हर आयाम को नूतन कर देता है। ये प्रकृति इतनी दयालु है की अपने जटिल व्यवस्थाओं द्वारा इस पृथ्वी के सभी जलीय ,स्थलीय एवं आकाशीय जीवो तक अपना नया जीवन प्रदान करती है। ये ‘प्रकृति’ मुरझाई हुई पत्तियो में नया जीवन फुक देता है, पृथ्वी फिर से हरी भरी हो जाती है , सब नया हो जाता है । भोर की ओस की बुँदे जब सूरज की पहली किरण को स्पर्श करती है तो मानो भूमि में मोती बिखर जाती है। ऐसे मनोहर दृश्य को देख कर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है ।

जब मनुष्य ‘प्रकृति’ से जुड़ती है तब जाकर प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले पाता है अन्यथा मनुष्य ‘प्रकृति’ की सुंदरता को देखने और समझने से वंचित रह जाता है ।’प्रकृति’ की ऐसी मनोहरता का रसपान सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है। उंसकी खूबसूरती का बखान सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है। जब प्रकृति अपनी सुंदरता बिखेरती है तब मनुष्य के अंदर का कवि जीवित हो जाता है। जब ‘प्रकृति’ अपने रंगबिरंगे  मेघ-धनुष के रंगों को आकाश में बिखेरती है तो मनुष्य के अंदर का चित्रकार बाहर आकर उन रंगों को अपने ‘केनवस’ में कैद कर लेता है और एक अद्भुत कलाकृति को उकेर कर कोई  शिल्पकार उसको मूर्त रूप देता है।

मनुष्य प्रारम्भ से ही ‘प्रकृति’ के समीप रहने की ख्वाइश रखता था। यही कारण था की कुछ  ‘मानव प्रजातियाँ’   प्रकृति के निकट जैसे बालक अपने माता के आँचल से दूर नहीं हो पाए और उसने ‘प्रकृति’ के सान्निध्य में  रह कर पुरे विश्व में जैसे अफ्रीका , अमेरिका , लेटिन अमेरिका , अलास्का , कैनाडा , ग्रीनलैंड , हंगरी ,न्यूजीलैंड , आस्ट्रेलिया , यूरोप , एशिया , भारत, नेपाल आदि देशों में अपनी सभ्यता विकसित की और ‘प्रकृति’ की भाषा और ‘प्रकृति’ के स्वभाव को आत्मसात किया। लेकिन  सभ्य और ज्ञानवान लोगो ने उन्हें जंगली  कहकर उन  ‘मानव प्रजातियों’ का अपमान किया । लेकिन यही थोड़े से ‘मानव प्रजातियाँ’ जिसे ‘आदिमजाति’ कहते है अपने जीवन दायनी ‘प्रकृति’ की रक्षा करते रहे उसको सम्मान देते रहे , आज भी वह अपने कर्तव्य को पूरा कर प्रकृति प्रदत्त जल , जंगल और जमीन की रक्षा कर रहे है। लेकिन दुखद बात यह है की बुद्धिमान कहे जाने वाले कुछ दम्भी मनुष्य उन ‘आदिमजाति’ को खत्म करना चाहते है। उन्हें ‘प्रकृति’ के गोद से विमुख और विस्थापित करना चाहते है। ताकि प्रकृति के सभी बहुमूल्य संसाधनों  पर अपना अधिकार कर ले।

पहाड़ो को चोटियों को देखकर उन चोटियों पर पहुचने की ख्वाहिस हर कोई रखता है। समुद्र की नीले पानियो के अंदर का नजारा देखने की इच्छा हर कोई करता है। चिड़ियों की तरह आकाश में उड़ने की चाह हर कोई के अंदर होता है। मनुष्य ने जब भी अपनी किसी चीज का निर्माण किया उसकी प्रेरणा हमेशा ‘प्रकृति’ ही रही है । शायद मनुष्य इस बात से इनकार करे लेकिन सत्य यही है। मनुष्य अपने बुद्धि ज्ञान से जिन चीजो का निर्माण किया उसके पीछे ‘प्रकृति’ ही थी। जब मनुष्य ने पानी में चलना चाहा तो मछलियों को देखा और नौका बना कर जल पर कब्ज़ा कर लिया। जब उड़ने की इच्छा हुई तो पक्षियों को देखा और उसने हवा में उड़ने वाले जहाज बना लिए। महत्वकांक्षाओं से भरा हुआ मनुष्य अपनी इच्छा और जिद को पूरा करने के लिए ‘प्रकृति’ पर ही निर्भर था वह ‘प्रकृति’ से भी बड़ा और महान बनने की इच्छा रखता था। उसने अपने लिए नई नई सभ्यताओं की नीव रखी। नगर बसाये , किले बनाये । बड़े बड़े साम्राज्यो की स्थापना किये । युद्ध लड़े , एक दूसरे का बेरहमी से गला रेतते रहे । हत्या करते रहे । ‘प्रकृति’ के इस पवित्र भूमि पर एक दूसरे का रक्त बहाते रहे। किला जीते, विजय महोत्सव मनाये । महत्वकांक्षाओं ने मनुष्य को क्रूर बना दिया ।

यह पूर्ण सत्य है की जो भी ‘प्रकृति’ से सम्बन्ध तोड़ता है उसके अंदर क्रूरता के सभी गुण व्याप्त हो जाते है और फिर वह ‘प्रकृति’ का सम्मान नहीं करता और ना ही ‘प्रकृति’ से कोई मोह रह जाता । वह लोभ लालच में इतना अँधा हो जाता है की ‘प्रकृति’ को अपने हाथो मार डालना चाहता है। प्रारम्भ से ही ऐसा ही होता आया है की कुछ मनुष्य ‘प्रकृति’ के सानिध्य में रहे और कुछ मनुष्य अपने महत्वकाँशाओँ में इतने अंधे हो गए की उन्होंने इस ‘प्रकृति’ को बर्बाद करने की ठान ली । आज उनके परिणाम स्वरुप ‘ प्रकृति’ के हर स्रोत को मनुष्य ने दूषित कर दिया। जब इसकी खात्मे की चरण सीमा पर पहुचे तब बुद्धिजीवी मनुष्य को चिंता सताने लगा और उसने अपने नए अभियान शुरू कर दिए। राष्ट्रिय अंतराष्ट्रीय संगठन बने और विश्व मानव समुदाय को मनुष्य द्वारा ‘प्रकृति’ के विनाश की गाथा सुनाई। ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ की घोषणा की गयी। विषय मानव समुदाय को प्रकृति की रक्षा के उपाय बताये। लेकिन अब भी मनुष्य अपने मनो को कठोर किये हुए है और प्रकृति को नष्ट करने की हर एक प्रयास जारी है। मुर्ख मनुष्य को कौन समझाए की ‘प्रकृति’ की मौत यानी सम्पूर्ण मानव जाति की मौत !

एक मनुष्य की औसत जीवन 70-80 वर्ष की होती है। अब तो दूषित पर्यावण के कारण गंभीर रोगों से बेवक्त मर रहे है। अस्थमा ,त्वचा संबंधी रोग ,केंसर ,नए नए संक्रमण वाले रोग ,मानवजनित रोग जैसे ‘एड्स ‘ हेपटाइटिस , हैजा , तपेदिक कोढ़ , संकरित खाद्य पदार्थो से शारीरिक रोग अवरोधक क्षमता का ह्रास हो रहा है। एक मरता है तो दूसरा पैदा होता है। लेकिन इस जीवन चक्र में मनुष्य आज तक यह नहीं जान पाया है की यह ‘प्रकृति’ ही है जो ना जाने लाखो करोडो वर्षो से अपना अस्तित्व बनाये हुई है।

‘प्रकृति’ ने ही मनुष्य को शारीरिक रूप से मजबूत बनाया था लेकिन मनुष्य ने जीवन के स्रोत को ही बर्बाद करने की ठान ली , मुर्ख मानव !  मनुष्य तो उस विकास चक्र के आखरी पायदान में सबसे छोटा है लेकिन दम्भ इतना की अपने आप को सबसे श्रेष्ट बनाने की कोशिश करता रहता है और आखिर में भूमि की मिटटी में मिल जाता है !

मरनहार मनुष्य का दम्भ मुझे आज तक समझ में नहीं आया ! किस बात का इतना दम्भ ? किस बात का इतना रौष ?  किस बात का इतना अकड़ ? एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को मारता है ? एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अपना दास बनाता है ?  मनुष्य दूसरे मनुष्य पर अत्याचार करता है ।एक मनुष्य दूसरे मनुष्य पर अपना अधिकार करने की कोशिश करता है । इतनी महत्वकांक्षाये क्यों है मनुष्य के जीवन में ?

कब तक ? एक दिन मृत्यु आती है और सब कुछ मिटटी में मिल जाता है ! सारे घमंड ,अहंकार ,दम्भ , बाहुबलता , क्रूरता , और स्वार्थ का अंत ‘मृत्यु’ ही तो है , ये मुर्ख मनुष्य, क्यों नहीं समझते !

जरा ‘प्रकति’ को देखो तुम्हारे कृत्यों ने उसका स्वरुप ही बदल दिया है इस सुन्दर पृथ्वी के स्वरुप को जिसने ‘प्रकृति’ ने सजाया था, लेकिन फिर भी निश्छल और शांत रहती है। कोई शिकायत नहीं करती है और तुम मनुष्य अपने क्रोध और आवेश को अपने वश में नहीं कर सकते। अपने ज्ञान पर तुम इतराते हो ! लेकिन अभी भी तुम्हारा ज्ञान अधूरा ही है। ‘प्रकृति’ की गहराई और उसकी विशालता को तुम कभी नहीं समझ पाओगे। प्रकृति तुम्हारे लिए सिर्फ एक पहेली है। लेकिन प्रकृति की सहनशीलता चरमसीमा पर है। उसका कारण तुम मनुष्य ही हो। भूगर्भ से लेकर समुद्र तक तुमने दूषित कर दिया। वन प्रदेशो को तुमने अपने ही लाभ के लिए उजाड़ दिया। चंद सोने चाँदी के लालच में तुमने पहाड़ो और पठारो को खुदेड़ कर उसे समतल बना दिया।

जो जलस्रोत जैसे नदी , तालाब आदि तुम्हारे लिए जीवनदायी था उसे तुमने अपने मूर्खतापूर्ण कृत्य से दूषित और मैला कर दिया , मुर्ख हो तुम। अगर प्रकृति से जुड़े होते तो मालूम होता की तुमने क्या खोया है। तुमने अपने माता (प्रकृति ) के आँचल छोड़ कर अपने ज्ञान, बुद्धि और अपनी मह्त्वकांशाओ को स्थान दिया है यही तुम्हारे विनाश का कारण है।

वापस आओ अपने प्रकृति के आँचल में ।

वही सुरक्षा है, वही जीवन है।

वही तुम्हारा अस्तिव है।

एक प्रयास करो , अपनी मूर्खता पूर्ण कार्य बंद करो। प्रकृति को दूषित मत करो ,जल स्रोतों को साफ़ करो। जंगलो को मत काटो , प्रकृति के रक्षको ‘आदिवासी’ को  प्रकृति के निकट रहने दो। उसे विस्थापित मत करो । पहाड़ो को ना काटो। तभी प्रकृति तुम्हें माफ़ करेगी । वर्ना सुनामी , बाढ़ , महामारी , आकाशीय तड़ित की बौछार तुम्हारे दम्भ को तोड़ डालेगी। भूमि की कंपन तुम्हारे ह्रदय गति को बढ़ा देगी। और तुम्हारे विशालकाय गगनचुंबी इमारतों को पलभर में मलवे में बदल देगी। तुम्हारे आकांक्षाओं को पल भर में मिटटी में मिला देगी। तुम्हारे बनाये कागज के टुकड़े (रूपये) तुम्हें बचा नहीं पायेगा ,तुम्हारा दम्भ पल में टूट जायेगा। चारो तरफ रुदन नाद सुनाई पड़ेगी ।

क्या फिर तुम जीने की इच्छा रखोगे ? फूलों की सुगंध के बदले मानव मांस की सड़ाहट की गंध तुम्हें जीने नहीं देगी। प्रकृति से प्यार करो , वापस आओ अपने प्रकृति के आँचल में ।

– राजू मुर्मू

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