वैकल्पिक राजनीति के नेता योगेन्द्र यादव जी से पाँच प्रश्न

Posted by priyank samagra
November 21, 2017

Self-Published

बीस नवम्बर को दिल्ली के संसद मार्ग पर हमने किसानों का हजारों की संख्या में जो हुजूम देखा, वैसा निकट इतिहास में देखने में नहीं आया है| अन्ना आन्दोलन निश्चित एक देश व्यापी आन्दोलन था लेकिन उसमें एक तरह की अराजकता स्पष्ट थी, नेतृत्व को लेकर, मुद्दों को लेकर और आन्दोलन के परिणामों को लेकर| और प्रश्न यह भी था कि आन्दोलन ख़ुद अपनी नींव पर खड़ा हुआ था या दस साल की कांग्रेस के नेतृत्व में चलाई जा रही यूपीए सरकार से त्रस्त जनता सड़कों पर उतर आई थी| या यह किसी बड़े राजनैतिक समूह की पिछले दरवाज़े से राजनीति वाली कारगुज़ारी थी| खैर समय का चक्र आगे बढ़ चुका है| अब हम २०१७ में हैं, और अन्ना आन्दोलन से लेके अब तक जो भी छोटी-बड़ी राजनीतिक घटनाएँ हुई हैं उनका आंकलन किया ही जा रहा है| यहाँ से पहला प्रश्न निकल कर आता है जिसका उत्तर योगेन्द्र यादव जी से अपेक्षित है| योगेन्द्र जी अन्ना आन्दोलन से भी जुड़े, आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे फिर अलग होकर स्वराज इंडिया नाम से पहले राजनैतिक-सामाजिक संस्था बनाई, फिर राजनैतिक दल बना लिया|

१)      प्रश्न है कि वे जिन भी संघों से जुड़े रहे उनमें क्या समानता उन्होंने पाई जो उनके अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से भी मिलती है?

इस प्रश्न की अनिवार्यता इसलिए है क्यूँकि वर्तमान में किसानों की जिस राजनीति से योगेंद्रजी जुड़े हैं, और जिसे बहुत हद तक उन्होंने एक नया, वैकल्पिक रूप देने का प्रयास किया है, उसमें विचारों और कल्पना की मौलिकता कितनी है और आर्थिक दबावों की मजबूरियाँ कितनी हैं, यह स्पष्ट होना जरूरी है| अतः यह भी जरूरी है की योगेन्द्र जी जिन विचारों को अपनी मौलिक राजनीतिक समझ का हिस्सा मानते हैं उनको वो साझा करें| जिससे निकलकर दूसरा प्रश्न सीधे वर्तमान के किसान आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में उठता है|

२)       वर्तमान का किसान आन्दोलन कितना वैकल्पिक है और कितना आर्थिक दबावों से उत्पन्न हुआ है? यह कैसे वैकल्पिक राजनीति की जो व्यापक सोच है उससे जुड़ता है?

क्यूँकि विचारधारा से बात शुरू हुई है तो एक साधारण प्रश्न सिर्फ़ विचारधारा पर पूछ लेना उचित होगा| प्रायः योगेंद्रजी ने अपने भाषणों में वाम और दक्षिण दोनों ही विचारधारों की आलोचना की है| विचारधारों की आलोचना नया प्रचलन नहीं है किन्तु ऐसे करने वालों के यदि दो बड़े खेमे बनायें जायें तो एक वो खेमा है जो आज के युग को विचारधारों के उपरांत का युग मानता है| और दूसरा खेमा वो है जो एक तरह से पुरानी विचारधारों के नवनिर्माण में लगा हुआ है|

३)      योगेंद्रजी इन दोनों में से किस खेमे में सहभागी हैं? हैं तो क्यों? नहीं हैं तो क्यों नहीं?

प्रजातंत्र में सामाजिक आंदोलनों की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है| किन्तु वर्तमान में दुनिया भर में ऐसे आन्दोलन की शक्ति और प्रभाव में कमी आती हुई दिखी है| नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने हाल ही में मध्य प्रदेश में एक आन्दोलन किया उसको जी तरह की उपेक्षा झेलना पड़ी वह सबके सामने है|

४)      आज का यह किसान आन्दोलन देश की राजनीति को कैसे प्रभावित करेगा? क्या किसान निजी  आर्थिक समृद्धि के विचार से आगे वृहत राजनीतिक चर्चा में भी  हिस्सा लेंगें? यह वही अपेक्षा है जो अक्सर पढ़ी-लिखी शहरी आबादी से की जाती है|

किसानों की आर्थिक सुरक्षा जितना ही बड़ा मुद्दा है, शायद उससे भी बड़ा, शिक्षा और स्वस्थ सेवाओं का| यह जन सरोकार के मुद्दे दशकों से उपेक्षा के शिकार हैं और समाज को खोकला बना रहे हैं| इस संदर्भ में भी राजनैतिक-सामाजिक चेतना को जागृत करने की आवश्यकता है| अगला मुद्दा फिर पर्यावरण का  भी है|

५)      क्या इन मुद्दों पर भी किसान आन्दोलन की तरह ही कोई बड़ा आन्दोलन तैयार किया जा सकता है? इन विषयों का वैकल्पिक राजनीति में क्या स्थान है?

 

मैं आश्वस्त हूँ की मेरे सवाल आप तक पहुँचेंगें और आप उनका समुचित उत्तर भी देंगें| धन्यवाद ! 

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